भारतीय शिक्षा पर पश्चिमी प्रभाव

भारतीय शिक्षा पर पश्चिमी प्रभाव  अठारहवीं शताब्दी में भारत में हिन्दू-मुस्लिम शिक्षा केन्द्र प्रायः लुप्त हो गये थे। इसका कारण राजनीतिक उथल-पुथल थी। 784 ई० में हेस्टिंगस ने बोर्ड आफ डारेक्टर्स का ध्यान इस ओर खींचा। प्रारम्भ में तो अंग्रेजों इंग्लैण्ड की परम्पर के अनुसार शिक्षा का भारत निजी हाथों में रहने दिया। कुछ समय […]

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक आंदोलन

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन (धार्मिक पुनर्जागरण) के लिए कोई एक तत्त्व उत्तरदायी नहीं थे, वरन् कई तत्वों को मिलकर इस पुनर्जागरण को जन्म दिया। भारतीय धर्म तथा समाज में अंधविश्वास तथा कुप्रयाओं का बोलवाला था। भारत में ब्रिटिश शासन के प्रभाव के कारण तथा स्वयं अंग्रेजों के संस्कृति […]

ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्य, अधिकार, भूमिका

ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्य, अधिकार, भूमिका ब्रिटिश शासन प्रणाली प्रधानमंत्री का पद केन्द्रबिन्दु है। शासन की समस्त रत्तित्यां उसी के इर्द-गिर्द घूमती है। वास्तव में प्रधानमंत्री ही सर्वोच्च कार्यकारिणी का अध्यक्ष होता है और इस रूप में रेम्जेम्योर के अनुसार यह अमेरिका के शासनाच्यक्ष राष्ट्राध्यक्ष से भी अधिक शक्तिशाली होता है। डॉक्टर के शब्दों में […]

लार्ड सभा के कार्य एवं अधिकार

 लार्ड सभा के कार्य एवं अधिकार   ब्रिटिश संसद सम्राट लोक सदन और लार्ड सभा का सम्मिलित रूप है। लोक सदन ब्रिटेन की संसद का प्रथम और दूसरा सदन लार्ड सभा है। ब्रिटिश के संवैधानिक इतिहास का अवलोकन करें तो ज्ञात होता है लोकसभा दोनों सदनों प्राचीन सदन है। लार्ड सभा की इंग्लैण्ड की लोकतन्त्रात्मक प्रणाली में […]

अमेरिकी संविधान की प्रमुख विशेषता

अमेरिकी संविधान की प्रमुख विशेषता संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय प्रणाली विश्व प्रसिद्ध है। विश्व के समस्त संविधानों में अमेरिका का संविधान सबसे प्राचीन एवं सर्वाधिक सफल संघीय संविधान माना जाता है। इसकी सफलता का प्रमाण यह है जब सन् 1787 में “अमेरिका का संयुक्त राज्य” नाम से इस संघ की स्थापना की गई तब […]

प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल में आधुनिक भारत के सामाजिक एवं बौद्धिक जीवन पर पश्चिम के प्रभावों की विवेचना

प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल में आधुनिक भारत के सामाजिक एवं बौद्धिक जीवन पर पश्चिम के प्रभावों की विवेचना  प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल अर्थात् ब्रिटिश कालीन शिक्षा का युग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रयासों से ही प्रारम्भ हुआ। इस काल से पूर्व भारतीय शिक्षा की दिशा अनिश्चित एवं अव्यवस्थित थी। पाठशालाओं में संस्कृत, हिन्दी, बंगला, फारसी अरबी तथा […]

इंग्लैण्ड में राजतंत्र जीवित रहने के कारण

इंग्लैण्ड में राजतंत्र जीवित रहने के कारण संसदीय शासन प्रणाली होने के कारण इंग्लैण्ड में जो संवैधानिक सत्य है,वह राजनीतिक असत्य है। अर्थात् इस शासन प्रणाली में सिद्धान्त एवं व्यवहार में भेद है। वह सबसे अधिक सम्राट अथवा साम्राज्ञी अधिकारों एवं उसकी स्थिति में पाया जाता है। संवैधानिक दृष्टि से वह राष्ट्राध्यक्ष के साथ-साथ शासनाध्यक्ष […]

अभिसमयों क्या हैं ब्रिटिश संविधान में इसका महत्व

अभिसमयों क्या हैं ब्रिटिश संविधान में इसका महत्व  अभिसमय ब्रिटिश संविधान के अभिन्न अंग हैं शासन का संगठन उनकी बुनियादों पर इतनी दृढ़ता से टिका हुआ है उसके बिना संविधान यदि पंगु नहीं तो पूर्णत: अव्यावहारिक अवश्य हो जाता है। आधुनिक काल में ब्रिटिश संविधान का विकास संवैधानिक विधियों के रूप में ही रहा है; जो […]

माओ के राजनीतिक विचार

माओ के राजनीतिक विचार माओवादी राजनीतिक चिंतन के सन्दर्भ में विद्वानों में दो मत है। प्रथम मत के अनुसार माओवाद में मार्स, लेनिन और स्टालिन के विचारों का मिश्रण हैं जयकि दूसरे मत के अनुसार माओवाद का का अस्तित्त्व एक स्वतंत्र और मौलिक विचारधारा है राष्ट्रीयता का संवेग ठसके व्यक्तित्व अभिन्न अंग बना रहा। उसके […]

साम्राज्यवाद, क्रांति और राज्य के विषय में लेनिन के विचार

साम्राज्यवाद, क्रांति और राज्य के विषय में लेनिन के विचार साम्राज्यवाद सम्बन्धी विचार- मार्क्सवाद पर किये जाने वाले आक्षेपों से मार्क्सवाद की रक्षा करने के लिए लेनिन ने सन् 1916 में “साम्राज्यवाद पूँजीवाद की चरम अवस्था पुस्तक लिखी इस पुस्तक में उसने यह सिद्ध करने का प्रयास किया साम्राज्यवाद पूंजीवाद की उच्चतम व्यवस्था है। लेनिन […]