सुमेरियन वास्तुकला अथवा जिगुरत क्या है

 सुमेरियन वास्तुकला अथवा जिगुरत क्या है

 वास्तुकला –सुमेरियन सभ्यता में लोग वास्तु कला से भी परिचित थे। यहाँ नरकलों को गाड़कर विभिन्न प्रकार की झोपड़ियां बनायी जाती थी। दीवारों के शीर्ष भाग गुम्बद के आकार का बना होता था। निरपुर से 5 हजार ई.पू. की मेहराबदार नाली मिली है। समाधियों और दरवाजों में मेहराब का प्रयोग किया जाता था। यहां के भवनी के बीच एक आंगन होता था। दीवारों के रंग बिरंगे चित्रों से सजाया जाता था भवन दो मंजिले होते थे। इनमें लगभग एक दर्जन कमरे होते थे। भवन की ईटों से बनाकर प्लास्टर कर दिया जाता था। इनमें स्वागत कक्ष, रसोई घर, स्नानघर और पूजा घर अलग-अलग होते थे। नौकरों का भी कमरा होता था। फर्श एवं दीवार चटाइयों चमड़ी एवं ऊँनी कपड़ों से की जाती थी। घर में ही मृतकों की कत्र होती थी। मंदिर राजाओं द्वारा बनवाये जाते थे। यहाँ के रामहल भी वास्तुकला का नमूना पेश करते है जिनका विवरण निम्नलिखित है 

राजमहल –प्रारम्भिक राजवंशों द्वारा संस्मरण में बनवाये गये भवनों से राजमहलों का परिचय मिलता है। 2500 ई.पू. का किश का राजा प्रसाद वास्तुकला का एक आदर्श है। इसकी निर्माण योजना, सीढ़ियाँ, सुन्दर दीवारें, ईटों के स्तम्भ तथा दीवारों पर पशु-पक्षियों के चित्र आदि बहुत ही अच्छे हैं। यह स्तम्भ पंक्तियों से सुशोभित है। इसके बनाने में इरेक (Erech) के स्तम्भ युक्त मन्दिर से प्रेरणा ली गई है। किन्तु वास्तुकला की दृष्टि से यह उससे भी उत्कृष्ट है तथा इसे दुर्ग की संज्ञा दी जा सकती है।

मन्दिर निर्माण कला-उर में स्थिर नान्नार का मन्दिर सम्पूर्ण मेसोपोटामिया में आदर्श माना जाता था। इसमें नीली पालिशदार ईट जड़ी थीं, दीवालों में दुर्लभ वृक्षों की लकड़ी और पट्टी लगी हुई थी तथा संगमरमर आदि कीमती पत्थर एवं सोने का भी प्रयोग किया गया था। एरिडू में प्रारम्भिक मन्दिर बहुत अधिक द्रव्य लगाकर बनाये गये थे। ये उबेद के मन्दिरों से ऊंचे और बड़े चबूतरों पर बनाये गये थे। वहाँ का प्राचीन मन्दिर 76 मीटर लम्बे और 30 मीटर चौड़े क्षेत्र पर बना था। बाद में यह अधिक सुन्दर स्तम्भ-मन्दिर (Pollar temple) बना। यह कच्चे ईंटों के चबूतरे पर खड़ा था और स्पष्टतः इसमें स्वतंत्र रूप से मिट्टी के चार खड़े स्तम्भ थे जिन पर प्लस्तर चढ़ाकर चित्रांकन किया गया था। इरेक में ही अनु (आकाश) देवता के सम्मान में कालक्रम से सात मन्दिर बने थे। ये ऊंचे चबूतरे पर बने थे। दूसरे मन्दिर की दीवारे सफेद हैं। अतः यह सफेद मन्दिर (White temple) था। यह योजना की दृष्टि से उत्तरवर्ती उरूक काल का है। पार्श्ववर्ती दो कोठरियों से निकलने वाली सीढ़ियाँ दूसरे तल्ले पर पहुँचाती थीं।

मन्दिरों के निर्माण व पुनर्निर्माण का कार्य प्रारम्भिक राजवंशों में बड़े उत्साह के साथ किया जाता था। खफाजे का चन्द्र-मन्दिर (Sin temple) कम से कम दस बार पुननिर्मित किया गया। इनमें पाँच प्रारम्भिक वंशीय ओर शेष जम्देत नस्र काल के हैं। यद्यपि मन्दिर निर्माण कार्य अबाधित गति से होता रहा और क्रिया-कलाप में निरन्तर विस्तार होता रहा फिर भी धर्म-निरपेक्ष शासकों ने उस पूँजी के कुछ अंश का उपयोग अधिक उत्पादक उद्देश्यों के लिये भी किया होगा। 

जिगुरत (Ziggurat या Ziqqurat)

निर्माण के उद्देश्य – जिगुरत उळॅचे चबूतरों पर बनाया जाता था जिनके वाहर के चारों ओर सीढ़ियाँ होती थी इस तरह उळॅचाई पर मन्दिर बनाने का निम्नलिखित कारण बताया जाता है।

(1) आध्यात्मिक एवं भौतिक दुर्ग-जस्ट्रोवऋ बूली और मैस्पेरो के अनुसार ऊंचाई पर बनी यह इमारत देवों के रहने के लिए या आक्रमण या विद्रोह के दिनों में सरकार के लिये अतः यह आध्यात्मिक तथा भौतिक दुर्ग था। 

(2) वेधशाला-किन्तु यह एक वैज्ञानिक वेधशाला का भी काम करता था। इसके शिखर पर जाकर ज्योतिषी और खगोल-शास्त्री ग्रहों तथा नक्षत्रों की गतिविधियों का अध्ययन करता था। विल डूरेन्ट के अनुसार इसके निर्माण का उद्देश्य कुछ तो धार्मिक है और कुछ ज्योतिष सम्बन्धी है।1 इसी प्रकार मेसोपोटामिया के प्रारम्भिक पुरातत्वशास्त्री साधारणतया यह विचार करते थे कि जिगूरत कैल्दियन नक्षत्र शास्त्रियों के वेधशाला थे या वे ऐसे बुर्ज थे जिस पर गर्मी या मच्छरों से बचने के लिये वेवीलोन के पुरोहित रात बिताते थे किन्तु स्पष्ट रूप से इससे कोई अर्थ नहीं निकलता।

(3) पिरामिड की नकल-इसके निर्माण की प्रेरणा मिस्र से मिली थी सुमेरियन वास्तुकला पर मिस्र के प्रभाव को एकदम से नकारा नहीं जा सकता। किन्तु पिरामिड के समान जिगूरत में समाधियाँ या कोठरियाँ नहीं होती थी। ये प्रारम्भिक राजवंशी के काल में बने सादे वास्तुओं पर निर्मित थे। प्रारम्भिक एक मंजिले और छोटे जिगूरत उबैद और उरूक आदि मन्दिरों के चबूतरों से प्रेरित होकर भी बनाये गये थे। इस प्रकार के भी विचार सामान्य रूप से स्वीकृत किये जाते हैं। उरनम्मू के विकसित जिगर भी इनके धार्मिक होने के प्रमाण नहीं देते। इसके बुर्ज और चबूतरे किस लिये थे?

(4 ) शाब्दिक अर्थ-पर्वत-निवास-इस पर भाषा-विज्ञान से भी प्रकाश नहीं पड़ता। जिगूरत की कभी-कभी जिक्कूरत (Ziqqurat of Zikkurat) भी लिखा जाता था। यह ‘जक्करु’ (Zaqqaru) धातु से बना है जिसका अर्थ होता है ऊंचा बनाना। इसके आधार पर कुछ बातें इस प्रकार कही जाती हैं। पैरट महोदय ने लिखा है कि इसके शाब्दिक अर्थ से कई कल्पनायें की गई हैं कुछ ने इस आधार पर माना है कि सुमेरियन पहले एलम के उळंचे पर्वतीय प्रदेशों में रहते थे तथा अपने एनलिल देव को पर्वत की चोटी पर पूजते थे। अतः उसी भावना के अन्तर्गत सुमेरियन मैदानी भाग में आकर बसने के बाद कृत्रिम पहाड़ बनाये।

अन्य विद्वानों ने उक्त मत को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मन्दिर के चबूतरे का उद्देश्य नगर के प्रमुख देवता को अन्य देवताओं से उळेचा स्थान देना तथा जन-सामान्य को उनके पहुँच के बाहर रखना था।

(5) देव मानव मिलन-स्थल-क्रेमर आदि कुछ विद्वानों के अनुसार जिगूरत की लम्बी सीढ़ियाँ (Staircase) नीचे के मन्दिरों के पुल का काम करती थी। नीचे के मन्दिर में देवों की पूजा के दैनिक विधियों का सम्पादन किया जाता था। और स्वर्ग तथा पृथ्वी के बीच में स्थित उळपर का पवित्र स्थान कुछ निश्चित अवसरों पर मनुष्य और देव के मिलने के लिए था। यह मत उचित जान पड़ता है।

( 6) बाइबिल का मत-सब विचारों को पढ़ने के बाद बाइबिल (Genesis XI, 4) की परिभाषा सबसे अधिक उचित है। ‘बेबिलोन के जिगुरत (Tower of Babel) का अर्थ “स्वर्ग तक पहुँचना (To reach upto heaven) है। सुमेरियनों की धार्मिक भावना के अनुसार ये ईंटों के भजन थे जैसे गोथिक गिर्जाघर पत्थरों के भजन (Prayer of Stone) थे। वे जिगूरतों के द्वारा देवों को शाश्वत निमन्त्रण दे चुके थे कि देवगण पृथ्वी पर आवें यह मनुष्यों को देवों से सम्पर्क स्थापित करने का सबसे बड़ा साधन था।

मेहराब और गुम्बज-सुमेरियन लोगों ने मकानों में मेहराब प्रणाली अपनायी यह उसकी देन है। तब ये शुद्ध गोलाकार नहीं होता था। मेहराब का प्रयोग समाधियों के निर्माण में अधिक हुआ। प्राग्वंशीय समाधि में मेहराबदार एक प्रकोष्ठ प्राप्त हुआ है। उर की राजकीय समाधि में तीन कोठरियाँ थीं जिनमें प्रत्येक की घोड़ियादार पीपे के आकार की मेहराबी छत थी जिस पर मूलतः पलस्तर की परत लगी थी एक अन्य छोटी समाधि वास्तविक गुम्बज से आच्छादित थी। यह भी चूना-पत्थर के टुकड़ों से बनी थी कहीं-कहीं ईंटों का प्रयोग किया गया था ओर छत मेहराब के बीच के पत्थर पर टिकी थी। जो वास्तविक मेहराव की प्रणाली का सूचक था।

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