विज्ञान के क्षेत्र में बेबिलोनियन के योगदान

 विज्ञान के क्षेत्र में बेबिलोनियन के योगदान 

 बेबिलोनियनों ने विज्ञान में अच्छी प्रगति की थी। इस दिशा में गणित, ज्योतिष, खगोलशास्त्र, मानचित्र-निर्माण एवं औषधिशास्र में इनकी उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। इसमें कहीं-कहीं तो इन्होने सुमेरियनों को भी मात कर दिया था। यहाँ पुरोहितों को ही न्यायाधीश, प्रशासक, कृषि एवं उद्योग के संचालक, वैद्य तथा ज्योतिषी इत्यादि के कार्य सम्पन्न करने पड़ते थे। इसके फलस्वरूप इन्होंने बहुत-सी ऐसी वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त कर ली थी जिसके आधार पर बाद में यूनानियों ने बहुत से वैज्ञानिक सिद्धांतों का आविष्कार किया। 

गणित- सुमेरियनों की भाँति बेबिलोनियन अंक-पद्धति भी द्विव्वाशमिक (Duodecimal ) एवं काष्ठिक (Sexagesimal ) विधि पर आधारित थी। एक लिखने के लिए जो चिन्ह बनाया जाता था उसी को संख्या के अनुसार लिख कर नौ तक की संख्याएँ प्राप्त करते थे। जैसे छः लिखने के लिए एक ही चिन्ह की छः बार लिख दिया जाता था। दश के लिए पृथक् चिन्ह था। इसे ही दो, तीन अथवा चार बार लिख कर क्रमशः बीस तीस एवं चालीस की संख्याएँ प्राप्त करते थे साठ के लिए पृथक चिन्ह था जिसकी सहायता से साठ, एक सौ बीस, एक सौ अस्सी इत्यादि संख्याएँ लिखी जाती थीं। इन्हीं चिन्हों की सहायता से वे दशमलव विधि द्वारा सभी अभीष्ट संख्याएँ लिखते थे । 

ज्योतिष – ज्योतिष में उनकी रूचि विशे: थी। आकाश के ग्रह देवतुल्य थे और उनके भाग्य विधायक थे जिसका अनुमान वे उनकी स्थिति के आधार पर करने थे। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि का तादात्म्य उन्होंने क्रमशः शमश, सिन, नर्गत नेव, मार्दुक, इश्टर तथा निनिव से किया था। प्रत्येक ग्रहों की गतिविधियों के विषय में उनके पास सूचनाएं रहती थी। इनकी प्रत्येक गतिविधि को वे किसी न किसी भावी घटना से सम्बद्ध मानते थे। यदि चन्द्र नीचे होता था तो वे अनुमान लगाते थे कि कोई दूर का देश आत्म-समर्पण करने वाला है। अर्द्धचन्द्र शासक द्वारा शत्रु-विजय घोषित करता था। इन्हीं भविष्यवाणियों के आधार पर बेबिलोनियन पुरोहित प्रचुर धन संग्रहीत करने में सफल हुए थे तथा समाज में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त किये थे। पुरोहित सदा इस विद्या को रहस्य बनाये रखते थे। इसकी जानकारी प्राप्त करना सरल नहीं था। इसे सीखने के लिए साधक को कठिन परिश्रम करना पड़ता था। सम्यक ज्ञान प्राप्त किये बिना जो व्यक्ति इस व्यवसाय को अपना कर भविष्यवाणियां करता था उसे अत्यन्त निद्य माना जाता था। 

खगोल-शास्त्र –स्वार्थवश ही सही, बेबिलोनियन ज्योतिषियों ने खगोल शस्वीय अध्ययन के लिए मार्ग प्रशस्त किया। शनैः शनैः वे इसमें निपुण हो गये। ग्रह-पय एवं गतियों का उन्होंने इतना सूक्ष्म अध्ययन किया कि द्वितीय सहस्राब्दी ई.पू. के पूर्वाद्ध में ही उन्होंने शुक्र के उदय एवं अस्त के विषय में जानकारी प्राप्त कर ली। विभिन्न ग्रहों की आकाशीय स्थिति से वे परिचित थे। ग्रह-मण्डल के चित्र निर्माण में भी वे निपुण थे। उन्होंने वर्ष को बारह चन्द्र मासों में विभाजित किया था। इनमें छः मास तीस दिन तथा छः मास उन्तीस दिन के थे। इस प्रकार कुल एक वर्ष में तीन सी चौवन दिन थे। लेकिन चन्द्र वर्ष एवं सौर-वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रति चौथे या पाँचवें वर्ष इसमें एक अतिरिक्त मास जोड़ दिया जाता था। किन्तु, इस अतिरिक्त अधिमास की कोई स्वीकृत व्यवस्था नहीं थी। यह शासक की इच्छा पर निर्भर था कि वह इसे कब जोड़े किन्तु यह कार्य वह ज्योतिषियों की राय से करता था। प्रत्येक मास में चार सप्ताह, एक दिन में बारह घंटे, तथा प्रति घंटे में तीस मिनट होते थे। इस प्रकार उनका एक घंटा हमारे दो घंटों तथा एक मिनट हमारे चार मिनटों के बराबर होता था। बेबिलोनियन घंटे को बिरू (Biru) कहा जाता था। बारह की संख्या वर्ष के बारह महीनों से ली गयी थीं। औषधि-शास्त्र-बेबिलोनियन विज्ञान धर्माश्रित था। इसका प्रभाव खगोल शास्त्र से 

अधिक औषधि –शास्व पर पड़ा धार्मिक अधीनता के फलस्वरूप इनके चिकित्सा शास्त्र में एक प्रकार की स्थिरता आ गयी। पुरोहितों के रहस्यमय व्यवहार तथा अंधविश्वास के प्रचार प्रसार ने इसकी प्रगति को और मन्द बना दिया। लेकिन इन कठिनाइयों के बावजूद भी इसकी दिशा में इन्होंने कुछ महत्वपूर्ण प्रगति की। हम्मूरावी के समय से ही चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में कुछ-कुछ उन्नति प्रारम्भ हो गयी थी और पुरोहितों का प्रभाव घटने लगा था। हम्मृरावी औषधि-शास्त्र को वैज्ञानिक विकास का एक आवश्यक अंग मानता था इसीलिए इसके नियन्त्रण के लिए उसकी विधि-संहिता में कुछ कठोर नियम बनाये गये थे। अब तक व्यवसायिक चिकित्सकों का वर्ग अस्तित्व में आ चूका था। यह ऐसा वर्ग था जो सशुल्क चिकित्सा करता था।

 चिकित्सा के लिए शुल्क तथा दण्ड दोनों का निर्णय विधि-संहिता के अनुसार किया जाता था। औषधि-चिकित्सा तथा शल्य-चिकित्सा के लिए अलग-अलग शुल्क निश्चित थे। रोग-मुक्ति के लिए पूजा-पाठ, तन्त्र-मन्त्र एवं अनेक प्रकार की अभिचारिक क्रियाओं का अवलम्बन लिया जाता था। दवा का प्रयोग भी रोग-निवारण के लिए नहीं, अपितु प्रेत-बाधा के निवारण-निमित्त किया जाता था। औषधियाँ जो बनती भी थीं उन पर अभिचार की गहरी छाप थी, जिससे वे अत्यन्त विचित्र एवं घृणित थी।

 औषधियों के मिश्रण में प्रायः कच्चे मांस, सॉप के मांस, मदिरा तथा तेल, खाने की सड़ी-गली चीजें, हड्डियों के चूर्ण, चर्बी, धूल तथा पशुओं एवं मनुष्यों के मल-मूत्र रहते थे। कभी-कभी भूत-प्रेतादि को प्रसन्न करने के लिए रोगी को कुछ उत्तम पदार्थ भी दिये जाते थे उनका विश्वास था कि ये पदार्थ रोगी के माध्यम से भूत-प्रेती को प्राप्त होंगे जिन्हें पाकर वे शीघ्रता से रोगी को मुक्त करेंगे। यदि सभी प्रयत्नों के बाद भी रोग मुक्ति नहीं मिलती तो रोगी को सार्वजनिक स्थानों में लाया जाता था। यहाँ सभी अनुभवी बूढ़े ओझा-वैद्य इक्टूठे होते थे और उस विषय पर अपने-अपने अनुभव के अनुसार परामर्श देते थे बेबिलोनियन औषधि शास्त्र से सम्बन्धित मिट्टी की पाटियों पर जो लेख मिले हैं वे अपर्याप्त हैं, अतएव उनके औषधि शास्त्र से पूर्णतया परिचित होना कठिन है। वर्तमान समय में यह भी कहना कठिन है कि रोग के कारण रूप में प्रेत-बाधा सम्बन्धित उनका विश्वास किस सीमा तक बुद्धि एवं तर्कहीन था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *