बेबीलोनिया की सामाजिक और आर्थिक दशा

बेबीलोनिया की सामाजिक और आर्थिक दशा 

समाज-व्यवस्था – हम्मूराबी की विधि संहिता में समाज के तीन प्रधान वर्ग का उल्लेख -उच्चवर्ग (अविलुम), सामान्य जन (मुस्केनुम) और दास (वर्दुम)। उच्च वर्ग में राजकीय अधिकारी, पुरोहित, सैनिक और भूस्वामी सम्मिलित थे। ये लोग समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग थे और ऊँची हैसियत रखते थे। शेष लोग सामान्य जन-किसान मजदूर थे जो हस्ताकौशल, शिल्पकार्य, उद्योग, व्यापार, कृषि और अन्य उत्पादन कार्यों में संलग्न थे। दासों के कठोर श्रम करना पड़ता था। दास स्वामी मनमाना व्यवहार और अत्याचारी शोषण करते थे। दासों को उनके मालिक बेंचने, गिरवी रखने तथा जंजीरों में जकड़ कर रखने के अधिकारी थे। दासों के हाथों पर उनके स्वामी का नाम गोद दिया जाता या। मजदूर एक फोरमैन के नियंत्रण-निर्देशन में सामूहिक कार्यों में लगाये जाते थे। उनके ऊपर भी एक राजकीय पर्यवेक्षक (वकील अमुरी) रहता था जो सैनिक अधिकारी भी था। 

ऐसा लगता है कि उद्योग-धन्धों में लगे मजदूरों के बारे में यह सत्य है। समाज में सम्पति का महत्व बढ़ने से गरीबों को अमानुषिक व्यवहार का अधिक शिकार होना पड़ा। ‘धर्म ने परीवों के अधिकारों के लिये कभी आवाज नहीं उठाई अथवा धनिकों और सामर्थ्यवान लोगों के विरुद्ध गरीबों के हितों को कभी उजागर नहीं किया। ‘जबकि या वृहद् दासवर्ग नींव के पत्थर की भांति उस समाज की व्यवस्था को संभाले हये था।”

उच्च पुजारिन के रूप में नियुक्त महिला (एन्तुम) नगर- शासिका के तुल्य होती थी इस पद पर कभी-कभी राजकुमारियां भी नियुक्त की जाती थीं। महिला पुजारिनों (नदिनुम) का दूसरा वर्ग सामान्य परिवारों का था वे सांसारिक जीवन बिताने को भी स्वतंत्र थीं लेकिन ये मन्दिरशोभिती के रूप एक तरह की वेश्यायें होती थीं। आम तौर पर कुलीन महिलाओं का पारिवारिक जीवन सम्मान का था लेकिन उन्हें रखैलों से विशेष सावधान रहना पड़ता था। अनुबन्ध के रूप में मान्यता प्राप्त वैवाहिक जीवन का महत्व धा। दहेज, औरत के पिता को मिलता था और वह तथा उसका पति विवाहोपलक्ष में कन्या को कुछ उपहार देते थे जिस पर तलाक होने पर भी औरत का ही अधिकार रहता था। सन्तानहीनता पीड़ादायक थी और पुत्र जन्म विशेष खुशी का अवसर था। गोद लेने की प्रथा थी। यदि पति, धोखाधड़ी करके तलाक दे दे तो उस पर केवल जुरमाना किया जाता था लेकिन यही अपराध यदि औरत करें तो उसे ऊँचे स्थान से धकेल कर नदी में डुबा दिया जाता था। समाज में वर्गों की हैसियत के आधार पर दण्ड व्यवस्था असमानता मूलक थी अतः स्पष्ट रूप से उच्चवर्गीय कुलीन लोग बेहतर स्थिति में थे। 

आर्थिक व्यवस्था – बेबीलोनियन अर्थव्यवस्था में कृषि का अत्यधिक महत्व था। शासन, सिंचाई की व्यवस्था का ध्यान रखता था। प्रधान भूस्वामी वर्ग इस्सक्कुम था जो भूमिकर देता था। अधिकांश लोग सेवाकार्य के बदले में भूमि का स्वामित्वाधिकार प्राप्त करते थे। इनमें से भी कुछ लोग कर चुकाते थे। इस तरह के अधिकांश लोग सैनिक सेवा, शिल्प तथा श्रमिक संगठनों के भूस्वामी थे। उन्हें भूमि के साथ प्रमाणपत्र भी दिया जाता था इस भूमि को वे लोग बेंत नहीं सकते थे लेकिन सेवा की निरन्तरता की शर्त पर उस भूमि का वंशानुगत उत्तराधिकार माना जाता था। हम्मूराबी ने अपनी आर्थिक नीतियों द्वारा अभिजातवर्गीय अधिकारी तंत्र और साधारण दासस्वामी समुदाय के बीच संतुलन कायम करने का प्रयास किया था। विल ड्यूरां के मतानुसार, “भूस्वामी अभिजात वर्ग, जिसे व्यापारी वर्ग धीरे-धीरे कमजोर करता जा रहा था जनता और राज्य के बीच कड़ी का काम करता था और सामाजिक नियंत्रण बनाये रखने में सहायक रहता था।”

मन्दिर भी भूसम्पत्ति और पूंजी के केन्द्र बने हुए थे। मन्दिर की ओर से साहूकारी का धंधा भी किया जाता था। इस काल में मन्दिरों से प्राप्त लाभों पर व्यक्तिगत स्वामित्व की विलक्षण परम्परा का उदय हुआ। ईश्वर की प्रार्थना के ये केन्द्र प्रसद्धि व्यापारिक केन्द्र और बाजार हो गये थे। व्यापारियों का वर्ग काफी शक्तिशाली था। राज्य भी व्यापार करके लाभ कमाता था। कृषि और पशुपालन से उत्पादित अनाज, हस्तनिर्मित वस्तुओं और यस्त्रों का निर्यात करके ये खनिजों का आयात करते थे बेबीलोन के व्यापारी तुर्की से चांदी, ताम्बा, असीरिया से टिन, सीरिया से बांस और उळपरी फरात घाटी से दास लाते थे। 

व्यापारियों को डाकुओं तथा चुंगी के अधिकारियों से खतरा रहता था। राजसत्ता के सहयोग से व्यक्तिगत व्यापार और व्यक्तिगत सम्पत्ति का महत्व बढ़ता गया तो बदले में राजनीतिक व्यवस्था के केन्द्रीकरण में व्यापार ने भी सहयोग किया और साम्राज्य निर्माण को प्रोत्साहन दिया। व्याज की दर 20 प्रतिशत थी। राजकीय साहूकार तमकारू थे। शासन, व्यापारिक काफिलों और जलमार्गों की सुरक्षा करता था। मत्स्यपालन पर एमोराइटों का पूर्ण एकाधिकार था। ऊने, सब्जी, छुहारा, पशु, चरवाहे, व्यक्तिगत व्यापार और कृषि की उपज पर कराधान किया गया था। शासन, राजस्व संग्रह पर कड़ी निगाह रखता था। सामान्यतः आर्थिक जीवन पर राजसत्ता का नियन्त्रण बढ़ा लेकिन दासता और सूदखोरी की वास्तविकता ने प्रायः उत्पादक शक्तियों को कमजोर बनाये रखने में सहयोग दिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *