असीरियन सभ्यता के आर्थिक संगठन पर प्रकाश

असीरियन सभ्यता के आर्थिक संगठन पर प्रकाश 

आर्थिक संगठन-

आर्थिक दृष्टि से असीरियनों को भी लगभग वही सुविधाएँ मिली थीं जो सुमेरियनों तथा बेबिलोनियनों को। दजला के दोनों ओर स्थित उर्वर मैदान कृषि के लिए उपयुक्त थे। यहाँ गेहूँ, जौ, बाजरा तथा तिल की खेती मुख्य रूप से की जाती थी। बेबिलोनियनों की भाँति बाँध बना कर नहरों की सहायता से नदी के जल का उपयोग किया जाता था। खेतों तक जल पहुंचाने के लिए मिस्र की भांति यहाँ भी शडूफ (ढेकुली) की सहायता ली जाती थी। 

यहां भूमि के स्वामी उच्च वर्ग के सदस्य ही थे। वास्तव में यहाँ भू- स्वामी तथा कृषक दोनों अलग-अलग थे। कृषक स्वयं भूमिधर थे अथवा इन्हीं भू-स्वामियों को लगान देकर भूमि प्राप्त करते थे, ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है। लेकिन इतना हम जानते है कि जो भूमि लगान पर ली जाती थीं उसकी शर्ते बड़ी कड़ी होती थीं। कृषिकर्म की महत्ता के कारण कृषकों की स्थिति यहाँ अच्छी थी। असीरिया में कृषिकर्म को वही स्थान प्राप्त था जो बेबिलोनिया में व्यापार को असीरियन व्यापारी होने की अपेक्षा भू-स्वामी होना अधिक पसन्द करते थे।

उद्योग-धन्धे :- कृषिकर्म के बाद असीरियनों के आर्थिक संगठन का मुख्य आधार उद्योगधन्धा था। यद्यपि असीरियनों की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वहाँ उद्योगधन्धे तथा व्यापार दोनी अधिक विकसित नहीं हो सकते थे क्योंकि निनिय तथा अन्य महत्वपूर्ण नगर काफी उत्तर में थे। लेकिन विभिन्न प्रान्त एवं प्रदेशों से लूट-पाट द्वारा जो धन यहाँ इकट्ठा हो रहा था उससे उद्योग-धन्धों के विकास का मौका मिला। मुख्यतः धातु-उद्योग प्रचलित थे। धातुएं या तो खदानों से प्राप्त की जाती थीं या उनका आयात किया जाता था स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य एवं लोहे से अनेक प्रकार के उपकरण बनाये जाते थे।

 धातुओं को द्वालने तथा शीशा गलाने की कला से वे परिचित थे । धात उद्योग के अतिरिक्त भाण्ड उद्योग तथा वस्त्रोद्योग भी अत्यधिक प्रचलित थे। सेनैकेरिख के एक लेख में पेड़ों से उत्पन्न होने वाली एक उळन का उल्लेख मिलता है। यह निस्सन्देह कपास का उल्लेख है तथा पश्चिम एशिया में इसका प्राचीनतम उदाहरण है। ब्रेस्टेड के अनुसार इसका ज्ञान भारत से आया था। उद्योग-धन्धे प्रायाशः वंशानुगत थे। 

व्यापार एवं वाणिज्य :- व्यक्तिगत रूप से असीरियन श्रीमन्त व्यापार को घृणा की दृष्टि से देखते थे। उनकी दृष्टि में कम दाम पर सामान खरीद कर उसे अधिक दाम में बेचना निंद्य कार्य था। श्रीमन्त वर्ग की व्यापारिक उदासीनता का लाभ विदेशी एरेमियनों को मिला और धीरे-धीरे सम्पूर्ण असीरियन व्यापार एवं वाणिज्य उनके अधिकार में आ गया। विदेशी व्यापार काफिलों की सहायता से किया जाता था यहां बाल तैयार करने वाले तथा उसे बाहर ले जोने वाले अलग-अलग वर्ग थे। व्यापारी और साहूकार पूंजी लगा कर माल बनाते थे तथा सौदागर उसे बाहर ले जाते थे। व्यापारियों को सौदागरों से पूँजी पर पचीस प्रतिशत व्याज मिल जाता था। उससे हम सौदागरों के लाभ की अधिकता का अनुमान लगा सकते हैं। मुद्रा-प्रणाली अभी तक विकसिन नहीं थी।

 विनिमय में सोने, चाँदी तथा ताँबे के टुकड़े प्रयुक्त किये जाते थे। सेन शिव के एक लेख में चाँदी के एक अर्द्ध शेकेल के ट्कड़े का उल्लेख मिलता है। व्यापार का संचालन राजधानी असुर से किया जाता था व्यापारिक वस्तुओं की कीमत एक-सी नहीं रहती थी। मांग एवं पूर्ति के अनुसार वस्तुओं के मूल्य घटते-बढ़ते रहते थे। अशुरवनिपाल के समय में उळंटों के बाम 1.50 शेकेल कम हो गये थे। क्योंकि दूसरे देशों से लाये जाने के कारण उनकी संख्या बढ़ गई थी। यहाँ व्यापार वाणिज्य से सम्बन्धित बहुत से नियम बनाये गये थे।

 इनका उल्लंघन करने वाले को कठोर दण्ड दिया जाता था। इनके व्यापारिक सम्बन्ध सीरिया, पेलेस्टाइन, साइप्रस तथा ईजियन द्वीप समूह से थे। मेसोपोटामिया का व्यापारिक मार्ग सीरिया से होकर जाता था अतः उसका योगदान विशेष था। यह एक सुविदित तथ्य है कि सीरियनों के दूसरों से संघर्ष प्रायशः व्यापारिक मार्गों के प्रश्न को लेकर होते थे। टायर, उरतुं एवं सीरिया के साथ हुए संघर्ष इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *