यूनान के प्रमुख दार्शनिकों का वर्णन

यूनान के प्रमुख दार्शनिकों का वर्णन  

धर्म :-पेरिक्लीज युग के एथेन्स की धार्मिक व्यवस्था एक प्रकार से परम्परागत पूर्व प्रचलित धार्मिक व्यवस्था ही थी। जन-जीविन पर धर्म का पूर्ण प्रभाव था। यूनानी अपने प्रत्येक कार्य का प्रारम्भ देव-वन्दना से करते थे। उनके देवता, प्राकृतिक शक्तियाँ तथा मानवीय प्रवृतियाँ तथा काम-क्रोध, लोभ, घृणा आदि के प्रतीक थे। देवताओं का मानवीयकरण प्रचलित था। पेरिक्लीज युगीन धार्मिक व्यवस्था की सर्वप्रमुख विशेषता यह भी कि इस युग में अन्ध-विश्वास तथा इसी प्रकार की अन्य धार्मिक कुरीतियों का अन्त करने का प्रयास किया गया था।

मन्दिर तथा पुरोहित धार्मिक संस्थाओं के प्रमुख अंग होते थे परन्तु यूनान में धर्म के प्रतीक न कोई मन्दिर थे और न किसी प्रकार का मत ही प्रचलित था। पुरोहितों का दायित्व मात्र धार्मिक क्रियाओं तक ही सीमित होता था। वे धर्म को राज्य में कोई विशेष गौरव नहीं प्रदान कर सकते थे। केवल धार्मिक क्रियाएँ कराने का ही पुराहितों का अधिकार या। यूनानियों ने देवी-देवताओं के रूप में काम, क्रोध, लोभ घृणा इत्यादि मनोवृत्तियों को भी प्रतिष्ठित किया, जिसके फलस्वरूप यूनान में देवी-देवताओं को बाढ़ सी आ गई। शनैः-शनैः यूनान में अन्ध-विश्वास की भावना बढ़ती गई तथा भविष्यवाणियों एवं अपशकुनों में जनता विश्वास करने लगी। एथेन्सवासी देवी-देवताओं को सन्तुष्ट करने के लिय पशुओं की बलि चढ़ाते थे। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए वे धार्मिक उत्सव भी मनाते थे। 

इन उत्सवों में नृत्य, संगीत, राग-रंग, कला-प्रदर्शन तथा आमोद-प्रमोद का विशेष रूप से आयोजन किया जाता था। कालान्तर में कुछ स्थानों पर देव-मन्दिरों का भी का प्रयत्न करते थे। पेरिक्लीज़ युग के धार्मिक कार्यों के विराध में एथेन्स में आन्दोलन प्रारम्भ हुये सर्वप्रथम अन्धविश्वासों का विरोध में पिण्डर ने साहित्य रचना करके जनता का ध्यान आकृष्ट किया । इसी प्रकार से धार्मिक कथाओं में उल्लिखित देवताओं के न्याय की अराजकता के विरुद्ध क्षाभ प्रकट करने के लिये यूरीपिडीज ने नाटक की रचना की यूनान में बहुदेववाद पर एस्कोइलस तथा सोफोक्लिज ने प्रहार किया तथा एकेश्वरवाद का प्रतिपादन किया। उन्हेंने जियस को देवताओ के प्रधान के रूप में प्रतिष्ठित किया। 

दर्शन – पेरिक्लीज युग में दर्शन के विकास को अनुकूल अवसर मिला। 500 ई.पू. आगुवादियों ने दर्शन के क्षेत्र में प्रचलित अनित्यवादी तथा नित्यवादी दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं का समन्वय करने का प्रयास किया था किन्तु वे असफल रहे थे। इसी समय एकेश्वरवाद का प्रवर्तन तथा बहुदेववाद का खण्डन करने वाली विचारधाराओं का भी प्रवर्तन हुआ। 

सोफिस्ट विचारधारा का महत्व -इस युग की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि सोफिस्ट विचार धारा है। एथेन्स के बौद्धिक वातावरण में 500 ई.पू. के मध्य में बढ़ा परिवर्तन हुआ। इस समय में बहुदेववाद का विरोध तथा एकेश्वरवाद का प्रतिपादन किये जाने के कारण एक नई तर्क-सम्मत विचारधारा का जन्म हुआ। यह सोफिस्ट विचारधारा थी। एस में नये-नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन अनेक विदेशी विचारक आकर करने लगे। इन्ही विचारकों को यूनानी ‘सोफिस्ट’ कहते थे। सोफिस्ट वर्ग में धनी एवं शिक्षित लोग थे और आराम तलब थे। इस शब्द का मूल अर्थ ‘मेधावी था। सम्पूर्ण देश में सोफिस्ट भ्रमण करते वे तथा जो वाद-विवाद द्वारा शिक्षा लेना चाहता था उसे ये तर्क शक्ति प्रदान करते थे। इसके लिये पारिश्रमिक भी ग्रहण करते थे। कालान्तर में वे अपनी तर्कशक्ति का उपयोग सत्य की शोध के स्थान पर खोखले वाद-विवाद में विजय प्राप्त करने के लिए करने लगे। ये प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कस कर ही सही का निर्णय करते थे। इसी से इन्हें सोफिस्ट कहते थे क्योंकि सोफिस्ट का अर्थ है-बुद्धिमान। इसका परिणाम यह हुआ कि वे सम्पूर्ण यूनान में सत्य को असत्य और असत्य को सत्य सिद्ध करने वाले तथा यूनानी संस्कृति के मूलभूत आदर्शों पर कुठाराघात करने वाले माने जाने लगे। तत्कालीन प्रमुख सोफिस्ट विचारक निम्नलिखित थे – 

1. प्रोटेगोरास -प्रोटेगोरास 480-411 ई.पू. में पहला सोफिस्ट विचारक था। यद्यपि वह अब्देरा का रहने वाला था, लेकिन उसने अपने उपदेश एथेन्स में दिये। उसने सभी वस्तुओं का मापदण्ड मनुष्य को ही माना था उसकी मान्यतानुसार मनुष्य की आवश्यकताओं तथा हितों पर ही सत्य, न्याय, सदाचार एवं सौन्दर्य निर्भर होते हैं। लेकिन देश तथा देश काल के अनुसार मनुष्य की अवश्यकतायें एवं हित भी परिवर्तित होते रहते हैं इसलिए आदर्शो की परिभाषा में भी इनके साथ परिवर्तन होता रहता है। यह ईश्वर विषयक धारणा पर मौन साध लेता था कि वह है अथवा नहीं है इसमें से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। 

2. जोर्जियस -जोर्जियस ने 420 ई.पू. में प्रोटोगोरास के शब्दवाद को नया मोड़ दिया। उसका मत था कि पहले तो किसी वस्तु का अस्तित्व है ही नहीं इसलिये ज्ञान की प्राप्ति करना सर्वथा असम्भव है। अगर है भी तो मनुष्य उसे जान नहीं सकता और यदि किसी प्रकार से मनुष्य जान भी जाय, फिर भी वह अज्ञात रहेगी क्योंकि उस ज्ञान का प्रकाशन मनुष्य की शक्ति के बाहर है। 

3. सीमेकस -प्रोटगोरास के मत में निहित व्यक्तिवाद को सीमेकस ने निष्ठुर शक्तिवाद में परिवर्तित किया। उसका कहना था कि अपने स्वार्थ के लिये शक्तिमानों द्वारा हर प्रकार के – नियम निर्मित होत हैं। इस विश्व में कहीं पर भी न्याय नहीं है अतः शक्तिपूर्वक, अन्याय द्वारा जो भी अपना स्वार्थ-साधन करता रहता है, वही च्यक्ति बुद्धिमान है। 

सुकरात -सुकरात एथेन्स की महानता और उसके पतन का साक्षी था। पेरिक्लीज के হ্ासक होने से लेकर पेलोपोनेसस युद्ध तक वह जीवित रहा। उसने उक्त युद्ध में भाग भी लिया था। उसका जन्म 469 ई.पू. में एथेन्स में निम्न श्रेणी के परिवार में हुआ था उसके पिता मूर्तिकार और माँ दाई थी। उसकी शिक्षा कैसे हुई जात नहीं है किन्तु वह प्रभूत अध्ययननादि से पूर्व ही विचारों से अवगत था। सुकरात की कोई दार्शनिक कृति नहीं है। वह अन्य महान शिक्षकों की तरह पाप और पुण्य का पाठ पढ़ाता था। वह प्रतिदिन बाजार में जाकर लोगों के प्रश्नों का उत्तर देता और उनकी शंकाओं का समाधान करता था। वह निरन्तर प्रश्न पूछता रहता था। वह सदा यह समझता था कि वह ईश्वरीय आज्ञा का सम्पादन कर रहा है और सत्य, शिव और सुन्दर से सम्बन्धित कार्य ईश्वर से सम्बन्धित हैं। सुकरात स्थायी और व्यापक ज्ञान में विश्वास करता था. जिसे मनुष्य सही मार्ग पर चलकर प्राप्त है । सकता है। अपने राजनीतिक विचारों में वर कुलीन तत्र का समर्थक था। प्लेटो ने सुकरात को संसार का सर्वाधिक बुद्धिमान व्यक्ति कहा है। उसने अपने विचारों को छोड़ने के बदले विष पीकर प्राण दे दिये। नगर छोड़कर जाने का प्रस्ताव को उसने कायरता एवं देशक्ति के विरूद्ध समझ पहले ही अस्वीकृत कर दिया था।

इसके दर्शन की प्रमुख विशेषताएँ हैं: आचार प्रमुख है। परस्पर विरोधी बातों में नहीं उलझना चाहिए। सत्य को आत्मा से पहचाना जा सकता है- ऐसा वह मानता था। नियम का बंधन इसके लिए कम महत्व का था। 

प्लेटो – सुकरात के विचारों का पोषक उसका शिष्य प्लेटो था। उसका जीवनकाल पेलोपोनेसस युद्ध के भयानक वर्षों में व्यतीत हुआ उसने एथेन्स का पतन, कुलीन-तन्त्मक क्रान्ति नया चौथी शती का निराशाजनक अन्तर्राजयीय सम्बन्ध और मृत्यु के समय मेंसीडन के अभ्युदय से समस्त राजनीति की संकटापन्न स्थिति देखी थी। इन समस्त परिस्थितियों का उसके विचारों पर गहरा प्रभाव पड़ा। जनतन्त्रात्मक सरकार ने उसके समक्ष ही उसके गुरू को मृत्यु दण्ड दिया था। अतः वह जनतन्त्र का विराधी था। उसने तत्कालीन सरकार को सामाजिक मूलबों के संरक्षण में असमर्थ पाया इससे उळवकर दर्शन की शरण ली और समाज की मुख्य समस्याओं के समाधान की ओर ध्यान दिया।

प्लेटो का जन्म 427 ई.पू. में एथेन्स कुलीन परिवार में हुआ। उसका वास्तविक नाम आरिस्टोक्लीज था, किन्तु उसके किसी शिक्षक ने उसके गुणों से प्रभावित होकर उसका नाम प्लेटो रखा। जब वह 20 वर्ष का था तभी सुकरात की शिक्षाओं का अनुयायी बन गया। वैसे तो प्लेटो पर अपने समय की सभी विचारधाराओं का प्रभाव पड़ा।

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