हखामनी/सखामनीय युग में ईरान के कला एवं साहित्य के विकास

हखामनी/सखामनीय युग में ईरान के कला एवं साहित्य के विकास 

हखामनी अथवा साखामनीष वंश द्वारा ईरान को एक विशाल साम्राज्य का रूप प्राप्त हुआ। इस प्रक्रिया द्वारा ईरान में विभिन्न संस्कृतियों का मेल हुआ तथा ईरान को सांस्कृतिक विकास करने का अवसर मिला। इस युग के सांस्कृतिक विकास का वर्ण निम्नलिखित हैं – 

(1) कला – ईरान के इतिहास में साखामनीय कला अपने वास्तुकलात्मक वैभव के लिए उल्लेखनीय है। यह बात सूसा, पासरगादे और पर्सेपोलिस नगरी के अति विशाल स्मारक भवनों को देखकर कही जा सकती हैं। जरथुस्त्र धर्म एक सादगी वाला धर्म था। उसे बड़े-बड़े मन्दिरों या पूजागृहों की जरूरत न थी, इसलिए अधिकांश वास्तु कला लौकिक (Secular) लक्षणों है। सम्राटों के महल बड़ी सावधानी से बनाये गये हैं और उनको बनाते समय इस बात का ध्यान रखा गया है कि वे चमक दमक और टीमटाम से दर्शकों को चकाचधि कर दें। साखामनीष साम्राज्य बड़ा विशाल और शक्तिशाली था और उसकी यह विशषता उन सम्राटों के महलों में दिखाई पड़ती है जो अपने को स्माटों का सम्राट कहलवाना पसन्द करते थे। महलों को बनाने के लिए कारीगर और साजो-सामान साम्राज्य के प्रत्येक कोने से ढूंढ निकाले जाते थे और इसी से इन भवनों में विभिन्न जनगणों की कलात्मक परम्पराओं के दर्शन होते हैं। 

महान् सम्राट् दारा प्रथम का एक अभिलेख उसे मसा के महल से प्राप्त हुआ है, जिससे पता चलता है कि महल किस प्रकार बनवाया गया था और इस बात का भी आभास मिल जाता है कि यह वास्तुकला कितनी सुन्दर थी। अभिलेख में लिखा है-“इस स्थान की खुदाई का काम बजरी बिछाने का काम और धूप में सूखी इंट बनाने का काम बाबुलवासियों ने किया, लेबनान से देवदार की लकड़ी लाने का काम असीरियाई, कैरीअन और आयोनिअन लोगों ने किया, बलूत की लकड़ी गांधार और आर्मेनिया से लाई गई, सोना सार्डिस और बैक्ट्रिया से लाया गया माणिक्य सोदिआना से लाया गया और चांदी तथा आबनुस मिस्र से लाया गया, दीवालों की सजावट आयोजिनया से आये सामान से की गई, हाथी दांत इथियोपिया, मिस्र और आरकोसिया से लाया गया, खम्भों के लिए पत्थर अफ्रेदीसिया से आया, पत्थरकट लोग आयोनिया और सांर्डिया से आये, सुनार मीडिया और मिस्र के थे, ईंट बनाने वाले आयोनिया और बाबुल के थे, दीवाल सजाने वाले मीडिया और मिस्र के थे।” 

देवदार की लकड़ी की बनी महलों की छतें वीसियों खम्भों पर टिकी थीं और हर खम्भा बीस मीटर उळंचा था। दीवाल का बाहरी भाग और सीढ़ियों की बगल का भाग स्थापत्य कला से सजा हुआ था। वहां पर देवताओं, अमीरों और साम्राज्य के अलग-अलग भागों से सम्राट के लिए सौगात लाने वाले लोगों को दिखाने वाली मूर्तियां बनी हुई थीं। महल के दरवाजे और लकड़ी के अन्य सामान सोने की पट्टियों से मढ़े हुए थे, जिन पर पशुओं और कल्पनात्मक जीवों को दर्शाया गया था। साखामनीष युग के सिक्को, गहनों और हथियारों पर जो हस्तकला के नमूने मिलते हैं उनसे पता चलता है कि प्राचीन ईरान के कलाकार अपनी कला में कितने सम्पन्न थे। साखामनीष वास्तुशिल्प के वैभव का सानी उस युग की किसी भी संस्कृति के वास्तुशिल्प में नहीं मिलती। दुर्भाग्य से इस कला की अनेक उपलब्धियों को सिकन्दर के हमले के समय नष्ट कर डाला गया। 

(2 ) भाषा और साहित्य – ईरान में प्राचीन काल में भाषाओं और साहित्य ने बड़ी उन्नति की। साखामनीष साम्राज्य के दौरान राजकाल की भाषा अरैमाइक थी। पुरानी फारसी भाषा भी अधिकतर प्रयोग में आती थी। अरेमाइक एशिया के एक बड़े भूभाग में व्यवहत होती थी और इसकी लिपि ने अनेक एशियाई लिपियों को प्रभावित किया। पुरानी फारसी भी अरैमाइक लिपि में ही लिखी जाती थी। 

ईरान का सर्वाधिक प्रसिद्धि वाला प्राचीन साहित्य ‘अवेस्ता’ है, जिसमें जरथुश्त्र का लेखन मिलता है। इस काल में ईरानियों ने साहित्य के क्षेत्र में बड़ी प्रगति की थी। उनका एक बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भारतीय शास्त्रों के दर्शन, चिकित्सा और ज्योतिष जैसे विषयों पर मिलने वाले महत्वपूर्ण अन्थों का फारसी भाषा में अनुवाद कराया। प्राचीन भारत के अनेक महाग्रन्थ ईरान से ही विश्व के अनेक दूसरे भागों में पहुँचे। ऐसा माना जाता है कि ईरानियों ने इसी युग में भारत से शतरंज का खेल सीखा। ईरान के शासकों की विशाल सहृदयता और उदारता का परिणाम यह हुआ कि उनकी संस्कृति बड़ी फूली-फली और उनके यहां सांस्कृतिक पुनर्जागण का युग आया। ईरान की सांस्कृतिक परम्पराओं को अरबवासियों ने भी प्राप्त किया जब वे सातवीं शताब्दी में ईरान के शासक बने। साथ ही अरबों ने प्राचीन ईरान की इस सांस्कृतिक उपलब्धियों को विश्व के अन्य भागों में भी फैलाया। 

(3 ) विज्ञान – वैज्ञानिक क्षेत्र में साखामनीष युग में कोई विशेष उन्नति नहीं हुई। लोग बहुत अधिक अन्धविश्वासी थे। उनका कहना था कि दानवीय शक्तियों के द्वारा 9999 रोग उत्पन्न होते थे जिनका निदान जन्तर मन्तर के द्वारा ही किया जा सकता है और यह जन्तर मन्तर पुरोहित वर्ग ही कर सकता है परन्तु धीरे-धीरे चिकित्साशास्त्र का विकास हुआ। आर्ट जेरीज द्वितीय के समय तक चिकित्साशास्त्र का पर्याप्त विकास हो चुका था। 

(4) धर्म – साखामनीष (अखामनी) शासक जसथुश्त्र धर्म के अनुयायी थे। जरथुश्त्र धर्म की स्थापना दारा महान् ने कई सदियों पहले हुई थी। इस काल में अहुरमज्दा देवता थे तथा अन्य देवताओं के अस्तित्व को भी स्वीकृत किया गया था। विशेषतः अमेशस्पेन्तों को पूर्ण देवताओं के रूप में पूजा जाने लगा था। इस काल में अहरमज्दा, मिस्र और अनहित त्रिदेवों की पूजा लोकप्रिय हो गई थी। मिश्रवाद में सूर्य को देवताओ का प्रमुख सहायक माना गया। कालान्तर में सूर्यदेव की उपासना को महत्व दिया गया और 25 दिसम्बर प्रमुख पर्व का दिन माना गया। इसी काल में अहुरमज्दा की विरोधी शक्ति अगमैन्यु (अहिरमन) की कल्पना अधिक स्पष्ट हो गई। इस प्रकार यह एकेश्वरवादी के साथ द्वैतवादी भी माना जाता है। 

(5 ) निष्कर्ष-उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि साखामनीष वंश के युग में, विज्ञान तथा साहित्य के क्षेत्रों में प्राचीन ईरान में कोई स्मरणीय कार्य नहीं किया गया। उनकी मुख्य कृतियाँ, शासन-कौशल, शासित के प्रति उदार नीति एवं सदाचार-पोषक एकेश्वरवादमूलक धर्म के क्षेत्रों में भी मानी जाती है। बृहत्तर साम्राज्य के शासन की काल में संभवतः रोम राम्राज्य के अतिरिक्त कोई भी देश ईरान का अतिक्रमण नही कर पाया। इस ओर उसने जो पथ-प्रदर्शन किया उससे रोम ने भी लाभ उठाया। उसके संगठन का अनुकरण सदियों तक वहां होता रहा। साखामनीष वंश के लिए यह कम गौरव की बात नहीं है।

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