रोमन साम्राज्य कला पर प्रकाश

 रोमन साम्राज्य कला पर प्रकाश 

 कला – आगस्टस युग की कला के क्षेत्र में स्वर्णयुग के नाम से पुकारा जाता इस युग में वास्तुकला, तक्षण कला और चित्रकला का विकास हुआ। विभिन्न कलाओं के विकास की चर्चा नीचे की जा रही है। 

वास्तुकला – रोमन साम्राज्य की सुव्यवस्था के फलस्वरूप रोम में वास्तुकला की विशेष उन्नति हुई। आगस्टस ने रोम को विश्व के सुन्दरतम नगरों में अग्रणी बनाने का प्रयास किया था। उसने रोम में अनेक भवनों का निर्माण करवाया। बत्कालीन भवन निर्माण में संगमरमर का प्रयोग अधिक मात्रा में होता था। रोम के अतिरिक्त आगस्टस ने ट्यूरिन तथा आगस्टोहनम नामक नगरों को भी सुन्दर बनाने का प्रयास किया। इस युग मे राजमार्ग बनाने की एक नवीन प्रणाली को अपनाया गया था। 

इस काल में रोम के नागरिकों की साम्राज्य-भक्ति, स्वाभिमान तथा दृष्टिकोण एवं आगस्टस-कालीन सुख एवं ऐश्वर्य के रूप का प्रतिबिम्ब मिलता है। इस काल के रोम के कलाकार स्वदेशी थे न कि विदेशी। उदाहरणार्थ यहाँ पर बिदुवियस विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसने ‘ऑन दि आर्किटेक्चर’ नामक ग्रन्थ में वास्तुकला के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया। इसमें भवन के प्रकार, निर्माण के उपकरण तथा गृह-निर्माण-सम्बन्धी सिद्धान्तों का विवेचन सुन्दर ढंग से मिलता है। इस ग्रंथ की उत्कृष्टता से पुनर्जागृति काल के सुप्रसिद्ध कलाकार लियोनादों माईकलैंजिल प्रभावित थे। आगस्टस नवनिर्माण के द्वारा रोम को कलात्मक स्वरूप प्रदान करना चाहता था। उसने वास्तुकला के विकास में पर्याप्त अभिरुचि ली थी। उसने भवन निर्माण में संगमरमर का प्रचुर प्रयोग कराया। आगस्टस ने इसी कारण कहा था कि मैंने रोम की ईंटां का नगर पाया, पर उसे संगमरमर का नगर बना दिया।” उसने राजमार्गों के विन्यास का एक नवीन पद्धति को जन्म दिया जिसका अनुकरण अफ्रीका में भी किया गया था। 

आगस्टस के काल में मन्दिरों का निर्माण भी प्रचुर संख्या में किया गया। इस समय प्राचीन मन्दिर का जीर्णोद्धार भी हुआ। यही कारण है कि लिवी ने आगस्टस को ‘रोम के देवालयों का निर्माता एवं पुनरुद्धारक कहा है। आगस्टसकालीन मन्दिरों में कादकाड, सैटर्न, कैस्टर डिजाइन जूलियस जेनस, जूपिटर कैपिटोलिनस तथा मार्स अल्टोर के मन्दिर उल्लेखनीय है। 28 ई. पू. में उसने एपोलो के मन्दिर का निर्माण किया। यह मन्दिर संगमरमर का बना हुआ था। इसमें एक पुस्तकालय भी था, जिसमें धार्मिक ग्रंथ रखे गये थे। आगस्टस-कालीन मन्दिरों में मार्स के मन्दिर की भी गणना की जाती है। इसका निर्माण एक अंचे चबूतरे पर किया गया था। इस मन्दिर में खम्भों का निर्माण कोरिन्थ शैली में किया गया था। आगस्टस ने कतिपय प्रेक्षागृहों का निर्माण कराया। यहां पर बेलवस का नाट्यगृह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसका निर्माण 13 ई. पू. में हुआ था। इसमें 7.700 दर्शक बैठ सकते थे। उसने पाम्पी के द्वारा बनवाये हुए नाट्यगृह का जीर्णोद्धार किया। इसमें 17.500 व्यक्ति बैठ सकते थे। इसी समय में मासेलस में एक प्रेक्षागृह का निर्माण कराया गया। इसमें 20,500 व्यक्तियों के बैठने की व्यवस्था की गई थी। इसमें सम्मानित दर्शकों के बैठने के लिए विशेष प्रबन्ध किया गया था। इसके समय में स्थान-स्थान पर जनता-स्नानगृह, सार्वजनिक गृह तथा व्यायामगृह बनवाए गए। आगस्टस का अपना राजप्रासाद बहुत ही सुन्दर था। ओविड ने इसकी बहुत ही प्रशंसा की है। उसका कहना है कि अपने विलक्षण सौन्दर्य के कारण यह भवन देवता के निवास के योग्य सुन्दर था। 

मूर्तिकला – आगस्टस-काल में मूर्तिकला का नवीन विकास हुआ। इस काल की मूर्तियों का वर्गीकरण दो भागों में किया जा सकता है – (1) पहले भाग में वे मूर्तियाँ आती हैं, जो कि विशेष का प्रतिनिधित्व मात्र करती हैं अथवा पीटेचर। (2) दूसरे वर्ग की मूर्तियाँ – घटना विशेष के स्मारक के रूप में बनवाई गई यथा मानुमेन्टल रिलीफ। प्रथम वर्ग की कई मूर्तियाँ उपलब्ध हुई है। इसमें सबसे प्रसिद्ध प्राइमा पोट्टा स्टेच ऑफ आगस्टस नामक है। यह बैटिकन के संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें आगस्टस अपने सैनिक वेष में प्रदर्शित किया गया है। द्वितीय वर्ग की मूर्तियों में ‘आल्टर ऑफ दी आगस्टस पीस’ (एरा पेसीज) सबसे प्रसिद्ध है। इसका निर्माण 9 ई.पू. में हुआ था। इसमें आगस्टस अपनी विजय-यात्ा के उपरान्त गाल तथा जर्मनी से लौटता हुआ अंकित किया गया है इसमें वेदी के चतुर्दिक एक चौकोर संगमरमर की दीवाल का निर्माण किया गया था आगस्टस की मूर्ति के अतिरिक्त उसमें एक तरुणी की मूर्ति भी अंकित की गई है, जो कि अपने दोनों हाथों में से शिशुओं को लिये हुए हैं। इसमें बलिदान के लिए जाते हुये एक जलूस का दृश्य भी अंकित किया गया है। इस जलूस में आगस्टस, उसके पुरोहित, राजकुल के सदस्य तथा सभासद आदि सम्मिलित हैं। यूनानी प्रभाव के होते हुये भी इसमें मौलिकता पर्याप्त मात्रा में दृष्टिगोचर होती है। 

चित्रकला – आगस्टस-काल में चित्रकला का कोई विशेष विकास नहीं हुआ। इस समय के कुछ ही चित्रों के उदाहरण उपलब्ध हुये हैं, जिनके ऊपर यूनानी प्रभाव परिलक्षित होता है। भित्तिचित्र के उदाहरण पाम्पी तथा प्राइमा पोर्टी से उपलब्ध हुए हैं। अन्य कलाओं की भाति चित्रकला का भी विकास राजकीय संरक्षण में ही सम्पन्न हुआ था।

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