रोमन धर्म की विवेचना

 रोमन धर्म की विवेचना 

धर्म – रोम-साम्राज्य एक ऐसा विशाल भू-खण्ड था, जिसमें विविध भाषा-भाषी एवं नाना जातियों के लोग रहते थे। सामान्य विशेषता केवल एक ही थी-बह थी रोम के प्रति राज्यभक्ति। उल्लेखनीय बात यह है कि इतने विशाल साम्राज्य में राष्ट्र तथा जाति के प्रश्न को लेकर कोई भी झगड़ा नहीं था। अमुक देश केवल अमुक जाति के लिए ही है, ऐसा कोई भी विवाद उस समय नहीं था। इसी प्रकार भाषा के प्रश्न को भी लेकर कोई संघर्ष नहीं था। पश्चिमी साम्राज्य की भाषा लैटिन तथा पूर्वी साम्राज्य की भाषा प्रीक थी। इसी प्रकार प्रारम्भ में धार्मिक झगड़े के प्रमाण भी वहाँ नहीं दृष्टिगोचर होते। कुछ सामान्य बातों में प्राय: सभी विश्वास करते थे, उदाहरणार्थ, विश्व का कल्याण देवताओं की कृपा के द्वारा ही सम्भव है। रोम-गणतन्त्र का विनाश उनके अभिशाप के फलस्वरूप हुआ तथा आगस्टस के साम्राज्य की स्थापना उसके वरदान के कारण हुई। सम्राट की पूजा होती थी। इससे साम्राज्य का लाभ था। जनता की राजभक्ति इससे स्वाभाविक रूप में उपलब्ध हो जाती थी। जूपिटर तथा मार्स प्रधान देवता थे। उनके मन्दिर भी उस समय मौजूद थे। उनके पुजारियों को राज्य की ओर से प्रचुर सुविधाएं उपलब्ध थीं। ज्योतिष में भी लोग विश्वास करते थे। फर्मिकस मैटनस ने लिखा है कि यह ‘देवविद्या’ है। टालमी ने भी अपने विवरण में मनुष्य के जीवन पर नक्षत्रों के प्रभाव को स्वीकार किया है; उदाहरणार्थ-सूर्य का प्रभाव मस्तिष्क, नेत्र, हृदय एवं स्नायुओं पर, मार्स का प्रभाव कान, गुर्दे तथा शिराओं पर; चन्द्र का प्रभाव जिह्वा, उदर एवं स्त्री प्रजननेन्द्रिय पर, जूपिटर का प्रभाव फेफड़े एवं पुरुषेन्द्रिय पर। 

लोगों के धार्मिक जीवन में अन्धविश्वास और रूपों में भी अधिक था। लोग जादूमन्त्र के द्वारा रोगों का निदान करते थे डिओस्कोराइद्स ने नग एवं मणियों के निदानशक्ति का उल्लेख किया है। साँप काटे मनुष्य का उपचार लोग अनुष्ठानों के द्वारा करते। अरिस्टाइड्स ने इसका वर्णन किया है। वह कहता था कि मनुष्य का स्वास्थ्य नक्षत्रों एवं उसके शरीर की अनुरूपता से सम्बन्धित हुआ करता है। पुजारी झाड़-फूंक के द्वारा काफी आमदनी किया करते थे। जूलियस सीजर प्रस्थान के समय तीन बार मन्त्रविशेष का उच्चारण करता था। द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व से रोमवासियों के इस धार्मिक जीवन में परिवर्तन होने लगे। पूर्वी देशों, मिस, पैलेन्तीन तथा ईरान आदि के धर्मों ने रोम में प्रवेश किया। इन धर्मों का विवरण कुछ निम्न ढंग से किया जा सकता है 

आइसिस की पूजा -इस मातृदेवी की पूजा रोम में 100 ई.पू. में मिस्र से आई थी। इसका प्रचार विशेषतः महिलाओं में हुआ। सुख-दुख को इसके वरदान एवं अभिशाप से सम्बन्धित किया गया। डोमिशियन के समय में इस देवी की पूजा काफी लोकप्रिय थी। रोम की मुद्राओं के ऊपर भी इन देवी की आकृति उत्कीर्ण मिलती है। 

सरसिप की पूजा – इसका भी प्रचार रोम में लगभग प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में ही हुआ था। जिस समय क्लिओपात्रा रोम पहुंची, जूलियस सीजर ने इसे सहिश्ुता प्रदान की थी। कालिगुला के समय में इसकी आराधना के लिये पूजा एवं अनुष्ठान आदि होते थे। यहूदी धर्म-यहूदी रोम में सबसे पहले द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में आये, पर इस 

समय ये यहाँ से भगा दिये गये थे। उनका यहाँ आना शीघ्र ही पुनः प्रारम्भ हो गया। जूलियस सीजर के समय में वे यहाँ बहुसंख्या में वर्तमान थे। ईसा की प्रथम शताब्दी में रोम साम्राज्य के प्रत्येक प्रमुख नगर में उनकी सामूहिक पूजा हुआ बारती थी। इस धर्म के एकेश्वरवाद का लोगों ने स्वागत किया। रोम के कुछ विशिष्ट लोग इस धर्म में अभिरुवि रखते थे। कतिपय लेखकों के अनुसार नीरो तथा उसकी प्रेयसी पोपिया भी इस धर्म के प्रति श्रद्धा रखती थी। 

मिथ्र धर्म – इसकी गणना जरथुस्ट्र धर्म के एक महत्वपूर्ण शाखा के रूप में की जाती है। रोम-साम्राज्य में इस धर्म का व्यापक प्रचार कई कारणों से सम्पन्न हो सका था रोम के सिपाहियों का पश्चिमी एशिया में इस धर्म के साथ परिचय हुआ। वे इससे प्रभावित हुए और अपने साथ इसे रोम ले आये। रोम-सेना के एशियाई सैनिकों में अधिकांश इस धर्म को 1 मानने वाले थे। इनके माध्यम से इसका प्रचार रोम में सम्भव हुआ। एशिया माइनर से, जो इस धर्म का एक विशिष्ट केन्द्र था, दास-पकड़ कर रोम लाये गये। ये कुलीनों एवं धनी मानी व्यक्तियों के घर में गृहदास के रूप में कार्य करते थे । मिट्र धर्म को इनके द्वारा रोम में पहुंचने का एक साधन उपलब्ध हो गया। यही कार्य साइलेसियन डाकुओं के द्वारा भी सम्पन्न किया गया, जो पाम्पी के समय में पकड़ कर रोम लाये गये थे। पूर्वी देशों के व्यापारियों के माध्यम से भी इस धर्म का रोम में प्रचार हुआ। 

रोम के लोगों को यह धर्म अच्छा लगा। मिन देवता रक्षक तथा प्रकाश का दाता था। अन्धकार एवं बुराइयों (चाहे वे शारीरिक हों या नैतिक) के विरुद्ध लड़ने की उसमें विलक्षण शक्ति होती है, ऐसा समझा जाता था। अतएव विशेष रूप से रोम के सेनानायकों एवं वीरवर सैनिकों ने इसे अपना लिया। रोम-साम्राज्य के विभिन्न भागों में यह शीघ्रतापूर्यक फैलने लगा। फ्रांस, स्पेन, इंग्लैण्ड, यूनान, उत्तरी अफ्रीका का समुद्रतटीय भाग एवं डेन्यूब घाटी के चतुर्दिक यह पर्याप्त रूप में ग्रहण कर लिया गया| यही कारण है कि जहाँ कहीं भी रोम का अधिकार था, वहाँ इस देवता के स्मारक मौजूद थे। यह ईसाई धर्म का सवल प्रतिद्वन्दी सिद्ध हुआ था। उगते हुए पौधे, पके गेहूँ की बाल, सूर्य एवं वृषभ इस धर्म के प्रतीक माने जाते थे। मिश्र धर्म से सम्बन्धित अधिकांश स्मारकों में इस देवता के द्वारा चृष्रभ, हनन दृश्य प्रदर्शित किया गया है। अवेस्ता में वर्णन मिलता है कि अहुरमज्द ने वृषभ की सृष्टि की, जिसकी मृत्यु के फलस्वरूप पशुओं एवं वनस्पतियों का जन्म हुआ। लगता है कि वृषभ-हमन दृश्य के द्वारा इस देवता को सृष्टि के रचयिता के रूप में अंकित किया गया है। रोम में मिश्र पूजा के प्रचार की लोकप्रियता का अनुमान हम इससे लगा सकते है कि वहाँ से इस देवता से सम्बन्धित पचहत्तर मूर्तियाँ तथा लगभग एक सौ उत्कीर्ण लेख उपलव्य हुए है। 

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि जरथुस्ट धर्म की काफी प्रथाएँ मिश्र धर्म में प्राप्य थी – (1) मिश्र धर्म के अनुयायी भी अग्नि को पवित्र मानते थे और इसे बराबर जलाते थे। मंत्र पढ़ने वाला व्यक्ति सूर्याभिमुख हुआ करता था। रात्रि में जलते हुए प्रकाश की ओर देखता रहता था। (2) मिन-धर्मानुयायी भी आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे। ये इस बात को स्वीकार करते थे कि मनुष्य के अच्छे-बुरे कार्यों का प्रभाव उसके लोकोतर जीवन में अवश्य पड़ता है। अतएव आचरण की पवित्रता तथा मन एवं वाणी की शुद्धता अनिवार्य है। भक्ति, सच्चाई, सत्यति जीवन तथा बन्धुत्व की भावना को इस धर्म में महत्व प्रदान किया गया। (3) मिन धर्म ने भी सर्वशक्तिमान् देवता का संदेश दिया। रोम में एकेश्वरवाद के प्रचार का इसे बहुत कुछ श्रेय था। यहाँ पर उल्लेखनीय है कि पाश्चात्य सभ्यताओं में मित्र धर्म की कतिपय परंपराएं अब भी विद्यमान हैं, उदाहरणार्थ-नक्षत्रों के नाम पर दिन का नाम रखना तथा 25 दिसम्बर को रक्षक-देवता की जन्म-तिथि स्वीकार करना। 

ग्नास्टिक धर्म – यह धर्म उस समय की नाना धार्मिक एवं दार्शनिक विचारधाराओं के सम्मिश्रण से निकला था। इसकी कई शाखायें एवं उपशाखायें विद्यमान थीं, जिनमें लगभग नीस के नाम ज्ञात हैं। इस धर्म का उद्गम द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ। द्वितीय शताब्दी ईसवी में यह काफी विकास पर था। इसका सबसे प्रधान केन्द्र पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र था यहाँ पश्चिमी एवं पूर्वी धर्मों तथा विचारों का संघर्ष विशेष रूप से हो सका था। इसके प्रवर्तकों का यह दावा था कि उन्हें देवी प्रेरणा उपलब्ध थी। इस धर्म की विभिन्न शाखाओं में कतिपय विशेषताएं उपलब्ध थीं – (1) मुक्ति में ये सभी विश्वास करते थे। (2) वे आत्मा को अजर-अमर मानते थे। उनके अनुसार पिंजड़े में बन्द पली की भाँति यह मानव शरीर में कैद रहती है। लौकिक जीवन सराहनीय तथा विषयों में आसक्ति दुःखमूलक है। (3) उन्होंने अपने सिद्धान्तों को लेखबद्ध किया। उनके अनुसार उनके ग्रंथ ईश्वरीय इच्छा के अनुसार लिखे गये थे। (4) स्वर्ग एवं नरक में उनका विश्वास था। इस धर्म के प्रमुख आचार्यों में क्लेन्टियस (135 ई.- 160 ई.) उल्लेखनीय है। उसके मत में उपर्युक्त विशेषतायें उपलब्ध थीं।

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