सृजनात्मक तथा व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन में अन्तर

 सृजनात्मक तथा व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन में अन्तर 

सृजनात्मक तथा व्याधिकीय व्यक्तित्व की विशेषताओं से स्पष्ट हो जाता है कि इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों से सम्बन्धित वैयक्तिक विघटन की प्रकृति परस्पर सम्बन्धित होते हुए भी एक-दूसरे से काफी भिन्न है। इस भिन्नता को निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है – 

(1) सृजनात्मक वैयक्तिक विघटन तथा व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन के प्रति सामाजिक अस्वीकृति (social disapproval ) की मात्रा भी भिन्न-भिन्न होती है। पहली स्थिति में सामाजिक अस्वीकृति केवल विरोध के रूप में देखने को मिलती है जबकि व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन की स्थिति में विरोध के साथ दण्ड के प्रयत्नों का भी समावेश होता है। इस दृष्टिकोण से भी सृजनात्मक तथा व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन की प्रकृति एक-दूसरे से भिन्न हैं। 

(2) दोनों में एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि सृजनात्मक वैयक्तिक विघटन निष्क्रिय (negative) होता है जबकि व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन सक्रिय (positive)। इस तात्पर्य हैं कि सृजनात्मक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति जब सामाजिक मूल्यों में नये परिवर्तन लाने में सफल नहीं होता तो उसमें सामाजिक व्यवस्था के प्रति परित्याग (Abandonment) की भावना उत्पन्न होती है। साधारणतया वह समाज के लिए कोई बड़ा खतरा उत्पन्न नहीं करता। इसके विपरीत, व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन इसलिए सक्रिय है कि इस स्थिति में विघटित व्यक्ति तरह-तरह के अपराध करके सामाजिक व्यवस्था के लिए गम्भीर खतरा उत्पन्न कर देता है। 

(3) सृजनात्मक वैयक्तिक विघटन का कारण व्यक्ति में संवेदनशीलता तथा ‘अहम्’ का अधिक प्रभावपूर्ण होना है जबकि व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन में ‘अहम्’ अथवा संवेदनशीलता का स्तर बहुत निम्न होता है। व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन साधारणतया ‘हीनगा की भावना का परिणाम होता है। 

(4) सृजनात्मक वैयक्तिक विघटन अनेक बाह्य दशाओं का परिणाम है। एक संवेदनशील व्यक्ति स्वयं में विघटित नहीं होता लेकिन जब व्यवहार के नये ढंगों को लागू करने में उसे समूह की स्वीकृति नहीं मिलती, तभी उसकी संवेदनशीलता उसके व्यक्तित्व को विघटित करने लगती हैं। इसके विपरीत न्याधिकीय वैयक्तिक विघटन का कारण स्वर्य एक व्यक्ति के शारीरिक दोष अथवा मानसिक और स्नायुविक दुर्बलताएँ होती है। इसका तात्पर्य है कि व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन कछ आन्तरिक जैविकीय दिशाओं का परिणाम होता है। 

(5) सृजनात्मक क्षेत्र में वैयक्तिक विघटन की केबल सम्भावना की जा सकती है, यह सदैव होना आवश्यक नहीं होता। इसका तात्पर्य यह है कि सामाजिक व्यवस्था अथवा व्यवहार के परम्परागत तरीकों का विरोध करने वाले सभी व्यक्तियों का वैयक्तिक विघटन होना आवश्यक नहीं होता। कुछ विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न हो जाने पर ही ऐसे व्यक्ति का वैयक्तिक विघटन होता है। दूसरी ओर शारीरिक अथवा मानसिक दोषों के विद्यमान होने पर व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन हो जाने की सम्भावना कहीं अधिक रहती हैं। उपर्युक्त स्वरूपों द्वारा मारर ने वैयक्तिक विघटन के एक व्यापक क्षेत्र को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। लेकिन इस वर्गीकरण को पूर्ण नहीं माना जा सकता। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विघटित व्यक्तित्व के अनेक ऐसे भी लोग देखने को मिलते हैं जिन्हें न तो सृजनात्मक वैयक्तिक विघटन के अन्तर्गत रखा जा सकता है और न ही व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन के अन्तर्गत ये व्यक्ति वे हैं जो अपनी सामाजिक दशाओं तथा सामाजिक मूल्यों से पूरा अभियोजन करने का प्रयत्न करते हैं लेकिन फिर भी सामाजिक संरचना अथवा सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण उनका व्यक्तित्व साधारणतया विघटित ही रहता है। उदहारण के लिए, अत्यधिक निर्धन व्यक्ति, विधवाएँ, शोषित स्वियाँ, वृद्ध व्यक्ति, बेरोजगार तथा बन्धक अमिक आदि इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं। इस दृष्टिकोण से वैयक्तिक विघटन के स्वरूणे का कोई वर्गीकरण न करके इसके सामान्य स्वरूपों को समझना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

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