सामाजिक विघटन

 सामाजिक विघटन 

“सामाजिक विघटन एक जटिल प्रक्रिया है। प्रक्रिया का अर्थ परिवर्तन और निरन्तरता से हैं। पूर्ण संगठन या पूर्ण विघटन जैसी किसी चीज का कोई अर्थ नहीं होता। हर समाज हर समय किसी न किसी अंश में संगठित होता है और किसी न किसी अंश में विघटित भी। यह पूर्णता सामाजिक संगठन की ही भांति एक सामान्य प्रक्रिया (Normal Process) है। सामाजिक परिवर्तन (Social Change) निरन्तर प्रक्रिया है और सामाजिक विघटन परिवर्तन की ही देन है। अतः सामाजिक विघटन भी एक निरन्तर प्रक्रिया है। जब संस्थाए व्यक्ति के व्यवहार पर नियंत्रण रख पाने में असमर्थ होती हैं तो परिणामस्वरूप, सामाजिक विघटन जन्म लेता है। उदाहरण के लिए, यदि परिवार की संस्था अपने सदस्यों के व्यवहारों को उचित दिशा में निर्देशित करने के लिए उन पर नियंत्रण नहीं रख पाती तो सामाजिक विघटन स्वतः ही गति प्राप्त करेगा। 

सामाजिक विघटन एक दशा (Condition) ही नहीं अपितु एक प्रक्रिया भी है। समाज कभी भी स्थिर नहीं रहता, सदैव उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन होते रहते हैं, घटनाओं का क्रम बंधा रहता है। सामाजिक संगठन तथा सामाजिक विघटन वास्तव में एक सापेक्षिक (Relative) विषय है और यह पूर्ण (Absolute) नहीं है। सभी समाज किसी न किसी मात्रा में संगठित और विघटित रहते हैं, चाहे वह समाज कितना ही संगठित हो, कन्दराओं में रहता हो, सारे आधुनिक परिवर्तनों से परे हो, उस पर भी उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन होता रहता है और अति परिवर्तनशील समाज में भी कुछ न कुछ संगठन होता है। घटनाओं का क्रम बंधा रहता है और उनमें संघर्ष होता रहता है अत्यधिक स्पर्धा, सामाजिक विभेद (Social differentiation) और विवारण (Disruption) तथा पृथक् करने वाली (Centrifugal) आदि उप-प्रतिक्रियाएँ सामाजिक स्थिति में कार्यरत रहती हैं। जब परिवर्तन बहुत तीव्र गति से होता है तो सामाजिक दाँचा (Social Structure) विदीर्ण हो जाता है और सामाजिक मूल्य बदलते जाते हैं तथा संगठन विघटन में परिवर्तित हो जाता है। 

भारतवर्ष में संयुक्त परिवार (Joint Family का मूल्य (Value) परिवर्तन के साथ साथ बदलता जा रहा है। यही नहीं, आज के परिवार में पंद (Status) और कार्य (Role) के बारे में अति तीव्र परिवर्तन हुआ। है। सारे पुराने मूल्य नष्ट हो गए हैं। आज की पनी गृहस्वामिनी ही नहीं रह गई, केवल बच्चों की देख-रेख की दासी (Maid) ही नहीं रह गईं, बरन आज वह समाज में बराबर हिस्सा पाने वाली बन गई है। एकमत (Consensus) धीरे धीरे नष्ट होता रहता है और इस प्रकार सामाजिक विघटन धीरे-धीरे होता रहता है। विघटन के साथ ही साथ संगठन भी होता रहता है। संयुक्त परिवार के स्थान पर आज का नया परिवार, जो व्यक्तिगत विचारधारा का पोषक है, स्थान ले रहा है, पर संगठन का निखरा रूए आने में देर लगती है और जबकि परिवर्तन अति तीव्र गति से होता है तो संगठन का होना अति कठिन हो जाता है। धामस और जेनिकी ने लिखा है – “सामाजिक विघटन कोई एक असामान्य घटना नहीं है जो किन्हीं कालों या समाजों तक सीमित हो। इसमें से कुछ तो हमेशा और हर जगह पाया जाता है; क्योंकि हर जगह सामाजिक नियम भंग करने की व्यक्तिगत घटनाएं होती हैं, जो सामाजिक संस्थाओं पर विघटन करने वाला प्रभाव डालती हैं। यदि उनका प्रतिकार न किया जाय तो बढ़ सकती है और सामाजिक समस्याओं का पूर्ण नाश कर सकती है।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *