सामाजिक विघटन के कारण

 सामाजिक विघटन के कारण

सामाजिक विघटन के कारण (General Causes of Social Disorganization)- समाजशास्वियों ने सामाजिक विघटन के विशिष्ट कारणों की चर्चा की है। चूंकि सामाजिक विघटन एक प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया को संचालित करने में अनेक कारणों और परिस्थितियों का महत्वपूर्ण स्थान है। अतः सामाजिक विघटन के सामान्य कारणों को अग्रलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है – 

(1) सामाजिक परिवर्तन (Social Change)-समाज में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं। ये निरन्तर सामाजिक परिवर्तन समाज में विघटन को उत्पन्न करते हैं। इलियट और मैरिल ने तो सामाजिक परिवर्तनों को सामाजिक विघटन का महत्वपूर्ण अंग माना है। इन विद्वानों ने लिखा है कि, ‘सामाजिक विघटन तो उस कीमत का एक अग है. जो सामाजिक परिवर्तन के लिए समाज की चुकानी पड़ती है।” इलियट और मेरिल ने सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक विघटन के सम्बन्धों को इस प्रकार समझाया है 

(1). सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तन को जन्म देते हैं, इसका कारण यह है कि व्यक्ति नए सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाता जाता है। 

(2). नए सांस्कृतिक मूल्यों के आ जाने से व्यक्ति की आदतों, रहन सहन के दंग और उसकी भविष्यगत योजनाओं में परिवर्तन आ जाता है। 

(3). इससे प्राचीन मूल्य और मान्यताओं में परिवर्तन होता है।

(4). परिवर्तन की यह स्थिति सामाजिक विघटन को जन्म देती हैं । 

आर्गबर्न और निमकॉफ का विचार है कि सांस्कृतिक परिवर्तन (Cultural Change) सामाजिक विघटन का आधार हैं। उन्होंने इस तथ्य को सिद्ध करने के लिए सांस्कृतिक विलम्बना (Cultural Lag) सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है उनका कहना है कि सामाजिक परिवर्तन के कारण संस्कृति में परिवर्तन होता है। संस्कृति दो प्रकार की होती है –

(1) भौतिक (Material) तथा (2) अभौतिकी (Non-material)। 

आर्गबर्न और निमकॉफ का विचार है कि सामाजिक परिवर्तन के कारण संस्कृति का भौतिक पक्ष शीध्र परिवर्तित हो जाता है, जबकि अभौतिक संस्कृति में परिवर्तन तुलनात्मक रूप से विलम्ब से होता है। इसका परिणाम यह होता है कि सांस्कृतिक विलम्ब की स्थिति का जन्म और विकास होता है। सांस्कृतिक विलम्ब की यह स्थिति सामाजिक विघटन को जन्म देती हैं। 

मावरर का भी विचार है कि सामाजिक परिवर्तन स्वभावतः सामाजिक विघटन को जन्म देता है। उसने लिखा है कि सामाजिक विघटन इसलिए सामाजिक परिवर्तन का स्वाभाविक परिणाम है। 

(2) धार्मिक दशाएँ (Religious Conditions) -धार्मिक दशा भी सामाजिक विघटन को प्रोत्साहित करती है। धर्म दो प्रकार रो सामाजिक विण्टन को प्रोत्साहित करता है –

1॰ धर्म पुरानी मान्यताओं को प्रोत्साहित करता है तथा नई विचारधारा और मूल्यों की अवहेलना करता है इसका परिणाम यह होता है कि समाज में नवीनता और प्राचीनता की स्थिति निर्मित हो जाती है जो संघर्ष को प्रोत्साहित करती है और इस प्रकार सामाजिक विघटन का जन्म होता है।

2॰ धर्म समाज को परिवर्तित करने में भी महत्वपूर्ण कार्य करता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स बेबर ने संसार के छ: प्रमों का अध्ययन किया था और यह निष्कर्ष निकाला था कि समाज को परिवर्तित करने में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बेबर का विचार है कि यूरोप में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाने में प्रोटेस्टेण्ट धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। 

इस प्रकार धर्म सामाजिक परिवर्तन को प्रोत्साहित करता है। यह सामाजिक परिवर्तन विघटन के लिए उत्तरदायी होता है।

(3) आर्थिक कारण – निम्नलिखित आर्थिक कारण सामाजिक विघटन को प्रोत्साहित करते हैं – 

(i) औद्योगीकरण – औद्योगीकरण ने आर्थिक दशाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये हैं। औद्योगीकरण ने जहां एक ओर बड़े पैमाने पर उत्पादन को बढ़ाया है, वहीं दूसरी ओर सामुदायिक भावना में ह्रास को भी प्रोत्साहित किया है। इसके साथ ही व्यक्तिवादी आदर्शों का विकास हुआ है। औद्योगीकरण ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया है इन समस्याओं में से कुछ प्रमुख इस प्रकार है नगरीकरण, आवास समस्या तथा गन्दी बस्तियों का विकास, पारिवारिक विघटन, स्त्रियों द्वारा नौकरी तथा उनकी आर्थिक निर्भरता, पूंजीवाद का विकास, प्रामीण उद्योगों का नाश, अपराध, मद्यपान, जुआ, भ्रष्टाचार, आदि। इन समस्याओं के कारण भी सामाजिक विघटन को प्रोत्साहन मिलता है। 

(ii) औद्योगिक बीमारियाँ – औद्योगिक क्षेत्रों ने अनेक बीमारियों को जन्म दिया है। इन बीमारियों में दमा, यक्ष्मा, तपेदिक, दिल की बीमारी, आदि प्रमुख हैं। मशीनीकरण और व्यस्त जीवन ने अनेक मानसिक बीमारियों को प्रोत्साहित किया हैं। जिससे व्यक्तिगत विघटन फिर पारिवारिक विघटन और फिर सामाजिक विघटन को बल मिलता है। 

(iii) व्यापारिक मनोरंजन-औद्योगीकरण ने व्यापारिक मनोरंजन को प्रोत्साहित किया है। व्यापारिक मनोरंजन में सिनेमा, क्लब, नाटक आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। व्यापारिक मनोरंजन के साधन उत्तेजक परिस्थितियों पैदा करते हैं, जिससे व्यक्तियों के मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह प्रतिकूल प्रभाव भी सामाजिक विघटन को प्रोत्साहित करता है। 

(iv) बेरोजगारी – औद्योगीकरण ने बेरोजगारी को बढ़ावा दिया है। वास्तव में बेरोजगारी संसार की सबसे बड़ी बर्बादी हैं। बेरोजगारी से जहाँ आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है, वहीं दूसरी ओर व्यक्ति अपनी मौलिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति नहीं कर पाता है। ये परिस्थितियों सामाजिक विघटन को प्रोत्साहित करती हैं। 

(v) निर्धनता – निर्धनता व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधा उत्पन्न करती है। आर्थिक अभाव व्यक्ति में मानसिक असन्तुलन को जन्म देता है। यह मानसिक असन्तुलन अनेक सामाजिक समस्याओं का कारण होता है, जिससे सामाजिक विघटन को प्रोत्साहन मिलता है। 

(4) भावात्मक कारण – वर्तमान सामाजिक जीवन में व्यक्तियों के बीच भावात्मक एकता समाप्त होती जा रही है। भावात्मक एकता के समाप्त होने के कारण भावात्मक संघर्षों को प्रोत्साहन मिलता है तथा अनेक समस्याओं का जन्म होता है इन समस्याओं में क्षेत्रवाद, संस्कृतिवाद, सम्प्रदायवाद, भाषावाद आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार की समस्याएं संघर्षों को जन्म देती हैं। यह संघर्ष भी सामाजिक विघटन का कारण बनता।

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