सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा और विशेषताएँ

सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा और विशेषताएँ

समाजिक परिवर्तन से आशय – सामाजिक परिवर्तन से तात्पर्य सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन से हैं। अतः मैकाइवर और पेज ने भी माना है कि उस परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन कहा जायेगा जो सामाजिक सम्बन्धों में मनुष्य समाज की इकाई है। अत. उसमें होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। दूसरे शब्दों में मानव जीवन में होने वाले परिवर्तन समाज में भी परिवर्तन लाते हैं। इस कारण ही आज जो समाज का रूप है युगों पूर्व उसका यह रूप नही था। संक्षेप में परिवर्तन एक सर्वव्यापी नियम है। मानव समाज का कोई ऐसा अंग नहीं जिसमें सदा कुछ न कुछ परिवर्तन न होता रहता हो। कोई भी समाज जड़ या स्थिर नहीं कहा जा सकता है। इतना अवश्य है कि किसी समाज में यह परिवर्तन बड़ी तीव्रता के साथ होता है तो किसी समाज में मन्द गति से। हम किसी भी ऐसे समाज की कल्पना नहीं कर सकते जिसमें न तो कोई परिवर्तन होता हो और न ही उनमें कोई गतिशीलता हो। वास्तव में संसार की प्रकृति परिवर्तनशील है। समाज का जो ढाँचा सी वर्ष पहले था वह आज नही है और जो आज है वह कल नही होगा दूसरे शब्दों में, समाज में सभी संस्थाएँ संस्कृति, सभ्यता, परम्पराएँ, रूढ़ियाँ समीतियाँ आदि परिवर्तन की प्रक्रिया से प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए भारत की वैदिक कालीन सामाजिक व्यवस्था और आज की व्यव में पर्याप्त अन्तर मिलेगा। सामाजिक परिवर्तन की परिभाषाएँ- इसकी प्रमुख परिभाषाएं निम्नलिखित है – 

गिलिन एवं गिलिन के अनुसार – “सामाजिक परिवर्तन जीवन के स्वीकृत प्रतिमानों में परिवर्तन है।” 

किंग्सले एवं डेविस की परिभाषा – “सामाजिक परिवर्तन उन विकल्पों से सम्बन्धित है, जो सामाजिक संगठन में होते हैं अर्थात समाज की संरचना एवं कार्यों में होने वाले परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन कहलाते हैं।” 

स्पेन्सर की परिभाषा – “सामाजिक परिवर्तन सामाजिक उद्विकास हैं।” 

मैकाइवर एवं पेज के अनुसार- “ऐसे परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन मानेंगे जो कि सामाजिक सम्बन्धों में हो।” 

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ सामाजिक परिवर्तन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है – 

1. सामाजिक परिवर्तन एक आवश्यक घटना है। यह परिवर्तन प्रत्येक समाज में होता रहा है और होता रहेगा। 

2. सामाजिक परिवर्तन का प्रभाव सम्पूर्ण समाज पर पड़ता है केवल किसी व्यक्ति या समूह पर नही। 

3. सामाजिक परिवर्तन की गति असमान होती है। किसी समाज में इस परिवर्तन की गति बहुत तीव्र और किसी में मंद होती है। 

4. सामाजिक परिवर्तन एक जटिल तथ्य है और इसकी माप नहीं की जा सकती है। 

5. सामाजिक परिवर्तन की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है और न ही इसके स्वरूप को निर्धारित किया जा सकता है। 

6. सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक घटना है। यह सम्पूर्ण संसार में चलती रहती है। इसका सम्बन्ध किसी स्थान अथवा देश से नही होता है। 

7. सामाजिक परिवर्तन कभी-कभी किन्ह घटनाओं जैसे- बाढ़, भूकम्प, विद्रोह अथवा क्रान्ति आदि से भी प्रभावित होते हैं।

सामाजिक परिवर्तन हेतु शिक्षा का महत्व – 

शिक्षा को समाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम माना गया है समाज ने शिक्षा की व्यवस्था को इसलिए सुदृढ बनाया है ताकि अपेक्षित परिवर्तन लाये जा सकें इन परिवर्तनों हेतु शिक्षा के कई उपाय अग्रलिखित रूप में प्रयोग किये जाते हैं – 

(1) शिक्षा मानव के व्यवहार, जीवन शैली, विचार तथा आदतों से एवं चिन्तन शक्ति में परिवर्तन लाती है एवं उन्हें वांछित दिशा में मोड़कर सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है। 

(2) शिक्षा समाज की संस्कृति का हस्तान्तरण, परिवर्तन तथा चयन करके सांस्कृतिक परिवर्तन लाती है। सांस्कृतिक परिवर्तन के फलस्वरूप ही सामाजिक परिवर्तन होता है। 

(3) शिक्षा समाज में व्याप्त बुराइयों तथा कुरीतियों के बारे में जन साधारण को अवगत कराकर उनके विरुद्ध जनमत का निर्माण करती है। उस जनमत के द्वारा ही व्याप्त कुरीतियों तथा बुराइयाँ दूर होती है। 

(4) शिक्षा व्यक्तियों के दृष्टिकोणों को व्यापक एवं उदार बनाती है ताकि वे नवीनताओं को निःसंकोच स्वीकार कर सकें। 

(5) अन्धविश्वासों तथा धार्मिक रूढ़ियों का अन्धानुशरण करने से शिक्षा बचाती हैं। उसे सही दिशा में सोचने एवं वैज्ञानिक ढंग से चिन्तन व विश्लेषण करने हेतु प्रेरित करती है। 

(6) शिक्षा द्वारा वैज्ञानिक प्रगति होती है। नये आविष्कार होते हैं, फलस्वरूप सामाजिक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। 

(7) शिक्षा समाज की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है। इस आर्थिक प्रगति के फलस्वरूप सामाजिक परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। 

(8) सामाजिक परिवर्तन के मार्ग में जो बाधाएं है शिक्षा उन बाधाओं को दूर कर परिवर्तन की गति को तीव्रता प्रदान करती है। 

(9) सामाजिक परिवर्तनों हेतु सामाजिक कार्यकर्ताओं का निर्माण कर सामाजिक नव चेतना, समाज सेवा एवं जन जागरण का उत्तरदायित्व सौंपती है। 

(10) शिक्षा द्वारा जन मानव का दृष्टिकोण ज्ञान भण्डार द्वारा विकसित होता है तथा आचार-विचार बदलते हैं। 

(11) शिक्षा द्वारा व्यक्तियों की संकीर्ण भावनाएं दूर होती है। वे परस्पर सहयोग की भावना से रहना सीखते हैं तथा व्यापक राष्ट्रीय व सामाजिक कल्याण की भावना को दृष्टिगत रखते हुए कार्य करते हैं। उदाहरणार्थ जातिवाद, प्रान्तीयता तथा क्षेत्रीयता या विवाद के सम्बन्ध में राष्ट्रीय एकता का पाठ पढ़ाया जा सकता है। 

(12) शिक्षा समाज के शाश्वत मूल्यों की रक्षा कर समाज को अवनति के पक्ष पर जाने से रोकती है। 

(13) शिक्षा समाज में हो रहे परिवर्तनों की समीक्षा मूल्यांकन तथा समालोचना कर परिवर्तनों की गति को तीव्र करती है तथा इन्हें अपेक्षित दिशा प्रदान करती है। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि परिवर्तन लाने के लिए शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना पड़ेगा ताकि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तीव्र गति से हो सके।

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