सांस्कृतिक विघटन की परिभाषा

सांस्कृतिक विघटन की परिभाषा 

सांस्कृतिक विघटन के अभूतपूर्व संकट से आज पूरी दुनिया गुजर रही है। आज से बहुत पहले ओसवाल्ड, स्पेंगलर, श्वट्जर, टॉयनबी सौरोकिन तथी अरविन्द जैसे अध्येताओं ने नैतिक तथा सामाजिक मूल्यों के हास से उत्पन्न होने वाले खतरों का अनुभव कर लिया था। स्पेंग्लर ने कहा था, “पश्चिम में यांत्रिक प्रौद्योगिकी का इतिहास नेज गति से अपने अनिवार्य अन्न की ओर जा रहा है। प्रत्येक संस्कृति के महान् स्वरूपों के समान यह स्थिति भी स्वयं ही अपने आपको समाप्त कर देगी कब और किस प्रकार, यह हम नहीं जानते। इसी प्रकार श्वट्जर ने सांस्कृतिक विघटन से आच्छादित भौतिक प्रगति से निराश होते हुए लिखा था कि अन्धकार के समय में हमने एक अंधेरी यात्रा को आरम्भ किया है। आज मनुष्य का सम्पूर्ण ज्ञान वैज्ञानिक प्रयोगों में सिमटकर रह गया है। मानव के ये प्रयोग अपने अन्तिम लक्ष्य ‘मानवता’ में वृद्धि करने के लिए नहीं बल्कि अपने नैतिक पतन, संत्रास, स्वार्थ, अहंकार और संकीर्णता पर पर्दा डालने के लिए ही हैं। श्री अरविन्द के शब्दों में, मनुष्य ने एक ऐसी सभ्यता का निर्माण कर लिया है जो उसकी सीमित क्षमता तथा बुद्धि से कहीं अधिक बड़ी है। इसे उसकी सीमित, नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति न तो सही उपयोग में ला सकती है और न ही व्यवस्थित कर सकती है। यह (सभ्यता) उसके अहंकार और वासनाओं का एक खतरनाक साधन है।” 

सांस्कृतिक विघटन की अवधारणा – साधारणतया सांस्कृतिक विघटन का तात्पर्य सांस्कृतिक व्यवस्था में असन्तुलन उत्पन्न होना है। सांस्कृतिक विघटन की अवधारणा को समझने से पहले संस्कृति का अर्थ जानना आवश्यक है। संस्कृति का तात्पर्य उन सभी व्यवहारों की समग्रता से है जिनका लक्ष्य व्यक्तित्व का परिष्कार करना तथा व्यक्ति के सामने जीवन के अन्तिम लक्ष्य को स्पष्ट करना होता है। संस्कृति के क्षेत्र को स्पष्ट करते हुए टायलर ने लिखा है कि संस्कृति वह जटिल सम्पूर्णता हैं जिसमें ज्ञान, विश्वास, आचार कानून, प्रथा तथा इसी प्रकार की उन सभी क्षमताओं का समावेश होता है जिन्हें मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है। लुण्डबर्ग के शब्दों में, ‘संस्कृति को एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें हम सामाजिक रूप से प्राप्त तथा आगामी पीढ़ियों के लिए संचरित कर दिये जाने वाले निर्णयों, विश्वासों, आचरण के तरीकों तथा व्यवहार के परम्परागत प्रतिमानों से उत्पन्न होने वाले प्रतीकात्मक तथा भौतिक तत्वों को सम्मिलित करते हैं। इस परिभाषा से भी यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति को एक नैतिक-सामाजिक प्राणी बनाने में जितने भी सत्वों का योगदान होता है, उन्हीं की सम्पूर्णता का नाम संस्कृति है। इसका तात्पर्य है। कि यदि ज्ञान, विश्वासों, नैतिकता, कला, आचरण के तरीकों तथा व्यक्ति को सामाजिक प्राणी बनाने वाली इसी प्रकार की दूसरी क्षमताओं का प्रभाव समाप्त हो जाय अथवा इनकी विवेचना व्यक्तिगवू स्वार्थों की पृष्ठभूमि में की जाने लगे तब इसी स्थिति को हम सांस्कृतिक विघटन की दशा कहते हैं। 

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पारिभाषिक रूप से संस्कृति में मनुष्य द्वारा निर्मित भौतिक तथा अभौतिक सभी प्रकार के तत्वों का समावेश होता है लेकिन सांस्कृतिक विपटन का सम्बन्ध मुख्य रूप से परम्परा द्वारा स्वीकृत संस्कृति के अभौतिक पक्ष में उत्पन्न होने वाले असन्तुलन से ही है। कुछ प्रमुख विचारों के द्वारा सांस्कृतिक विघटन की इस अवधारणा को निम्नांकित रूप से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। 

इलिएट और मैरिल ने सांस्कृतिक विघटन की व्याख्या सांस्कृतिक परिवर्तन के सन्दर्भ में की है। आपका विचार है कि सांस्कृतिक परिवर्तन के कारण बहुत-से नवीन विचारों, आदशों तथा मूल्यों का हमारे सांस्कृतिक जीवन में समावेश हो जाता है। इसके फलस्वरूप न केवल व्यक्ति की आदतें बदलती है बल्कि उसका जीवन-क्रम भी बदल जाता है इस दशा में पुराने आदर्श-नियमों, विचारों और मूल्यों से नये विचारों तथा आदर्शों का संघर्ष आरम्भ होता हैं। इस संघर्ष के फलस्वरूप सांस्कृतिक जीवन में पैदा होने वाले असन्तुलन को ही हम सांस्कृतिक विघटन कहते हैं। इस दृष्टिकोण से बिघटन की अन्य प्रक्रियाओं के समान सांस्कृतिक विघटन भी एक प्रक्रिया है जो अनेक दशाओं के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होती है। 

ऑगबर्न ने सांस्कृतिक विघटन की दशा को सांस्कृतिक विलम्बना आधार पर स्पष्ट किया है। ऑगबर्न का कथन है कि संस्कृति के दो पक्ष होते हैं एक भौतिक तथा दूसरा अभौतिक। संस्कृति के दोनों पक्षों में जब तक सन्तुलन बना रहता है अथवा वै एक दूसरे से संगत बने रहते हैं, समाज में सांस्कृतिक संगठन बना रहता है लेकिन कभी-कभी इनमें से एक पक्ष दूसरे पक्ष से पीछे रह जाता है। इसके फलस्वरूप सांस्कृतिक परिवर्तन एक ऐसा रूप ग्रहण कर लेता है जिसमें संस्कृति के विभिन्न तत्व अर्थात् धर्म, नैतिकता कला, व्यवहार प्रतिमान तथा प्रौद्योगिकी आदि परस्पर विरोधी और अमपूर्ण बन जाते है। यह स्थिति “सांस्कृतिक विलम्बना अथवा ‘सांस्कृतिक पिछड़ की स्थिति है जो संस्कृति को अमंतुलित बनाकर सांस्कृतिक विघटन को जन्म देती है इस प्रकार संक्षेप में, संस्कृतिक विलम्बना की दशा के आधार पर ही सांस्कृतिक विघटन को समझा जा सकता है। 

पितरिम सॉरोकिन के विचार से सांस्कृतिक विघटन वह स्थिति है जिसमें ललित कलाओं, धर्म, दर्शन तथा नैतिकता पर भोगवादी लिप्सा (इन्द्रियपरकता) का प्रभुत्व हो जाता है। इसका तात्पर्य हैं कि जब इन्द्रियपरक इच्छाएँ विचारात्मक संस्कृति (ideational culture) से अधिक प्रभावपूर्ण बन जाती हैं तथा इसके परिणामस्वरूप हमारा मानसिक व्यक्तित्व दृषित हो जाता है, तब इसी स्थिति को हम सांस्कृतिक विघटन कहते हैं। 

आगामी विवेचन में हम सारोकिन के विचारों की विस्तार से समीक्षा करके यह जानने का प्रयत्न करेंगे कि सांस्कृतिक विघटन की प्रकृति क्या है तथा यह किन दशाओं के प्रभाव से उत्पन्न होता है? प्रस्तुत विवेचन में सर्वप्रथम उन विशेषताओं को समझ लेना आवश्यक है जो सांस्कृतिक विघटन की अवधारणा से सम्बद्ध हैं। 

(1) सांस्कृतिक विघटन का तात्पर्य संस्कृति के अभौतिक पक्ष में उत्पन्न होने वाले असन्तुलन से है। 

(2) संस्कृति के सभी अभौतिक तत्वों में उत्पन्न होने वाले असन्तुलन को सांस्कृतिक विघटन नहीं कहा जा सकता। केवल परम्पराओं तथा सांस्कृतिक मूल्यों द्वारा स्वीकृत तत्यों में जो असन्तुलन पैदा होता है, उसी को सांस्कृतिक विघटन कहा जाता है। 

(3) सांस्कृतिक विघटन स्वतः चलित नही होता। व्यक्ति और समूह जब संस्कृति के एक पक्ष की अपेक्षा दूसरे को अधिक महत्व देने लगते हैं, तभी सांस्कृतिके त्रिघटन की दशा उत्पन्न होती है। 

(4) सांस्कृतिक विघटन का मुख्य कारण भौतिकवादी मनोवृत्तियों में वृद्धि होना तथा परम्पराओं के प्रति निष्ठा में कमी होना है।

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