संगम साहित्यों पर प्रकाश

संगम साहित्यों पर प्रकाश 

संगम साहित्य मुख्य रूप से तमिल भाषा में लिखे गए है संगम साहित्य के ग्रंथ आज के समय में “साउथ इण्डिया शैव सिद्धांत पब्लिशिंग सोसायटी तिन्नवेल्ली” द्वारा प्रकाशित किए गए हैं। तमिल काव्य में आगम वर्ष की कविता मुख्यतया प्रेम सम्बन्धी है। प्रमुख संगम ग्रंथ निम्नलिखित हैं – 

1 तोलकाण्पियमू -यह द्वितीय संगम का उपलब्ध एक मात्र प्राचीनतम ग्रंथ है। इसके लेखक तोलकाण्पियर हैं। यह एक व्याकरण ग्रंथ है। इसकी रचना सूत्र शैली में की गई है। व्याकरण के साथ-साथ धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की नियमावली भी इस ग्रंथ में है। 

2. एतत्तौके अथवा अष्ट संग्रह -यह एक संग्रह ग्रंथ है जिसमें तीसरे संगम के आठ ग्रंथों का संग्रह है। ये आठ ग्रन्थ निम्नलिखित हैं –

(i)नपिणनै -इसमें पंच तिणैयों का उल्लेख हुआ है। ये पाँच तिणी मुलै, मरूचम, पले, नीथल तथा कुरिजि थे। ये क्रमशः अरण्य भूमि, कृषि के लिए जोती गई भूमि, निर्जल स्थल, समुद्र तट तथा पर्वत प्रदेश के संकेतक थे। इसके अतिरिक्त इसमें प्रणय गीतों (प्रेम गीत) का विशेष उल्लेख है।

(ii) कुरुन्थोकै -इसका भी वर्ण्य विषय प्रेम ( प्रणय) है।

(iii) एनकुरुनूर -इसमें भी वपन विषय प्रेम है।

(iv) पदित्रप्पत्तु -इसमें 8 चेर शासकों का शौर्य वर्णन है इस संग्रह से स्रियों तथा सैनिकों के गार एवं मृतकों के संस्कार विधि का ज्ञान सुलभ होता है। 

(v) परिपादल-यह तमिल साहित्य का प्रथम संगीत संग्रह है। इसमें विभिन्न देवताओं की प्रशंसा में छंद गाए गए हैं। इसी संग्रह में इन्द्र द्वारा गौतम ऋषि की पत्नी के साथ किए गए दुर्व्यवहार एवं भक्त प्रहलाद का वर्णन है। एक गीत में मयूर नृत्य का स्वाभाविक वर्णन मिलता है। (vi) कलिथीके -इसकी रचना का श्रेय कपिलर तथा अन्य चार व्यक्तियों को दिया गया है, इसमें संगम युग के विवाह की प्रथाओं का उल्लेख है। 

(vii) अहनानरू -मदुरा निवासी रुद्रशर्मन ने पाण्ड्य शासक उग्रपेरूअणुदि के संरक्षण में इसका संग्रह किया था। इसकी विषय-वस्तु भी प्रेम प्रसंग है। 

(viii) पुरुनानरू -इसे पुरम् नाम से भी जाना जाता है।

3. पत्तुप्पातु अथवा दशगीत- तृतीय संगम का यह दूसरा संग्रह ग्रंथ है। ये चेर राजाओं की कहानी कहते हैं।

(i) तिरूमुरूकात्रुप्पदै-इसकी रचना नक्कीरर ने की थी । इसमें तमिल देकता मुरूगन (कार्तिकेय अथवा सुब्रह्मण्यम) से सम्बन्धित गीत हैं। 

(ii) नेडनलवाडै-यह भी नक्कीरर की रचना है। इसमें युद्ध तथा पति वियोग का मार्मिक चित्रण किया गया है।

(iii) पेरूम्पनत्रुप्पदै-इसकी रचना रूद्रनकलनार ने की थी इसमें कांची के शासक तोण्डैमान इलण्डिरैयन का वर्णन तथा दक्षिण भारत के राजनीतिक भूगोल की जानकारी प्राप्त होती है।

(iv) पत्तिनप्पाले-इसकी रचना भी रूद्रनकन्ननार ने की । इस ग्रंथ में प्रेमगीत संगृहीत है। इसमें चोल बन्दरगाह पुहार (कावेरीपत्तनम्) तथा तमिल क्षेत्रों के साथ विदेशी व्यापारिक सम्बन्धों का वर्णन है।

इसमें कवि ने योद्धा के समरभूमि में जाने की इच्छा तथा प्रेयसी के आकर्षण के अन्त्दंद्र का अत्यन्त स्वाभाविक वर्णन किया है। इसकी कहानी अभ्यास के बुद्धचरित से मिलती है। इस कृति से प्रभावित होकर चोल शासक करिकाल ने लेखक को 16 लाख स्वर्ण मुद्राएं ईनाम में दी।

(v) पोरुनरात्रुप्पदै-इसकी रचना कन्नियार कवि ने की थी। इसमें चोल शासक करिकाल के प्रशंसा के साथ-साथ चोल राज्य की समृद्धि एवं गुणवत्ता की चर्चा की गई है। 

(vi) मदुरैकांचि-इसकी रचना मरुदनार ने की थी। इसमें पाण्ड्य शासक तलैयालंगानम् नेडुंजेलियन की प्रशस्ति के साथ-साथ पाण्ड्य तथा चोल शासक का वर्णन है। (vii) सिरुपानात्रुप्पदै-इसकी रचना नत्थनार ने की थी। इसमें चेर शासक कुट्टचन द्वारा हिमालय पर झण्डा गाड़ते हुए दिखाया गया है। 

(viii) मुल्लैप्पातु-इसकी रचना नपुथ्यनार ने की थीं। इसमें तलैयालगानम की प्रशंसा में गीत लिखे गए हैं। (ix) कुरुन्जिप्यातु-इसकी रचना कपिलार ने की थी। इसमें किसी पर्वतीय सरदार एवं ग्राम बाला की प्रेमकथा का वर्णन है।

(x) मलैपदुकदाम-इसकी रचना कौशिकनार ने की थी इसमें तमिल भू-भागों की सभ्यता एवं संस्कृति का वर्णन किया गया है।

(4) पदिनेकिल्लकणक्कु-यह तृतीय संगम का नीसरा संग्रह ग्रंथ है। इसमें सदाचारपरक 18 गीत है।

(i) नलदियर-इसमें श्रेष्ठ आचार सम्बन्धी कविताएँ हैं। इसमें उल्लिखित है कि – 

“मुखों की मित्रता की अपेक्षा उनकी घृणा अच्छी है।” 

“दीर्घकाल तक के रोग की अपेक्षा मृत्यु श्रेष्ठ है।”

“अधिक प्रशंसा से मृत्यु श्रेयस्कर है।”

“बरगद तथा नीम के वृक्ष दांत के लिए उपयोगी होते हैं।”

(ii) नन्मणिक्कदैके-इसकी रचना नागनार ने की है। इस ग्रंथ में धन-वैभव विशिष्टता पर जोर दिया गया है।

“सुख प्रेयसी की वाणी में तथा सदाचार उदार हृदय में मिलता है।”

(iii) कारनार पथु -इसमें वैदिक यज्ञों का उल्लेख मिलता है।

(iv) कल्लिवल्लिनारपथु -इसमें चेर शासक “क्णैक्कालइरुम्पोर्र” तथा सो शासक शेनगणान’ के मध्य हुए संघर्ष तथा चोल शासक की विजय तथा चेर शासक के बन्दी बनाए जाने का उल्लेख है।

(v) इनियवैनारपथु-इसमें 124 ऐसी वस्तुओं का उल्लेख है जिसे पाने के लिए मनुष्य लालायित रहता है।

(vi) इननारपधु-इसमें निषेधात्मक उपदेश हैं।

(vii) ऐतीनएम्बुद

(viii) तीनैमोलिएम्बुंदइन-ग्रन्थों को सामूहिक रूप से ‘ऐन्थिन कहा जाता है। इसमें भी प्रेम गीत संकलित हैं।

(ix) ऐन्तीनइलुपाद

(x) तीनैमालिनूरम्बुद-

(xi) कुरल-इस अष्टादश लघु उपदेश गीत का ग्यारहवाँ गीत का ग्यारहवाँ संग्रह कुरल है। इसके प्रणेता कवि तिरुवल्लुवर हैं। इसमें उनकी तथा उनकी पत्नी अै की अनेक कहानियाँ मिलती है। तिरुवल्लुवर ने अपने ग्रंथ की रचना श्रीलंका के नृपति इलल जो इनका मित्र था अथवा उसके पुत्र को शिक्षित करने के लिये किया था ।

कुरल को तमिल साहित्य का आधार ग्रंथ माना जाता है। इसकी गणना साहित्यिक त्रिवर्ग में की गई है क्योंकि इसमें धर्म, अर्थ तथा काम (अरम, पोरूल, तथा इनबम) का उल्लेख किया गया है। इसमें राजनीति एवं कला का भी वर्णन मिलता है। इसे तमिल साहित्य का बाइबिल अथवा पंचमवेद भी माना जाता है।

(xii) एलादि -इसमें चारों वेदों का सार मिलता है। 

(xiii) शीरूपंचक्लम -यह ग्रंथ औषधियों से सम्बन्धित है।

(xiv) तीरिकदुकम -यह ग्रंथ भी औषधियों से सम्बन्धित है। 

(xv) पलपोलि -इसमें प्राचीन आख्यान या पुरातन कथा

तथा नलदियर के बाद तीसरा स्थान प्राप्त है यह भी सूक्त ग्रंथ है।

(xvi) मुदमोलिककांचि -इसमें धर्मसूत्रों पर आधारित नीतियों की व्याख्या की गई |

(xvii) आचारकोवै -इसमें भगवान शिव की आराधना की गई है।

(xviii) इनिलै -इसका प्रकाशन नहीं हुआ है।

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