संगम युगीन आर्थिक जीवन

संगम युगीन आर्थिक जीवन 

आर्थिक जीवन-संगम साहित्य से पता चलता है कि दक्षिण भारत की भूमि बहुत उपजाऊ थी। भूमि की उर्वरा शक्ति के सम्बन्ध में काबेरी डेल्टा के बारे में कहावत थी कि जितनी भूमि एक हाथी बैठने में घेरता है, उतने में 7 व्यक्तियों के लिए अत्र पैदा होता है। कृषि से प्राप्त राजस्व, राज्य की आय का मूल स्रोत था। चेर राज्य भैस, कटहल, काली मिर्च तथा हल्दी के लिए विख्यात था। संगम कविताओं में रागी और गने के उत्पादन, गर्भ से शक्कर बनाने, फसल काटने, खाद्यान्नों के सुखाने का बड़ा सजीव वर्णन मिलता है। कृषि कार्य मुख्य रूप से महिलाएं करती थी। भूमि के पाँच मुख्य प्रकार मिलते हैं – 

1. मरूदम -यह उपजाऊ कृषि भूभाग था। यहाँ धान, बज्जि, कज्जि, कुवत आदि 

2. कुरिचि -इस तरह की भूमि में ज्वार, धान, बाँस, चीड़ और आम उगाए जाते थे।ज्यादातर कृषक इसी प्रकार के क्षेत्र में रहते थे।

3. मुल्लै -यहां पशुपालक ज्यादा रहते थे। इसमें रागी, कोटरे आदि उपज होती थी । 

4. नेथल-यह समुद्रवर्ती क्षेत्र था। यहाँ का मुख्य उत्पादन नमक एवं मछली था। यहाँ मछुआरे और नमक बनाने वाले रहते थे। 

5. पाले-यह रेगिस्तानी भाग था। इस कारण यहाँ उत्पादन नाममात्र का होता था। यहाँ के निवासी लूट-पाट एवं चोरी पर निर्भर थे। 

उद्योग एवं व्यवसाय -संगम काल में विभिन्न व्यवसाय भी प्रचलित थे। वस्त्र उद्योग सर्वाधिक प्रचलित था। सूती, रेशमी, ऊनी सभी प्रकार के बस्ती का निर्माण होता था। उरियूर एवं मदुरा वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र थे। अन्य प्रमुख उद्योग निम्नलिखित थे – 

धातु उद्योग -सोना तथा लोहा। चमड़ा उद्योग-चमड़े से जूते, बाजे इत्यादि बनाए जाते थे।

मद्य उद्योग -गन्ने और चावल से शराब बनाई जाती थी।

तेल उद्योग -अदरक और तिल से तेल का निर्माण किया जाता था।

नमक उद्योग -तटवर्ती नगरों में प्राप्त होता था। हाथी दाँत उद्योग -विदेशी व्यापार के लिए प्रसिद्ध।

मसाला उद्योग – विदेशी व्यापार के लिए निर्यात की प्रमुख वस्तु।

व्यापार -संगम युग की महत्वपूर्ण विशेषता इसका आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार था। इस समय यूरोप के साथ व्यापार अत्यन्त उन्नत अवस्था में था। यूरोप में सर्वाधिक व्यापार रोम के साथ होता था जिसका विस्तृत विवरण प्लिनी ने अपनी पुस्तक नेचुरल हिस्टोरिका में किया है। रोम के शासकों में सर्वाधिक व्यापार आगस्टस के समय में होने के प्रमाण है, क्योंकि इसी समय के सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के भारत में पाए गये हैं। आगस्टस के बाद टाइवेरियस एवं नीरी के समय व्यापार में क्रमश: गिरावट आती गई। आगस्टम का एक मन्दिर मुजिरिस (क्रांगेनोर) में बनवाया गया था। रोमन लोगों ने यहाँ रक्षा के लिए सेना की दो टुकड़ियाँ भी स्थापित की थीं। कावेरी पत्तनम में एक यवन बस्ती थी। स्वतंत्रता के बाद अरिकमेडु (पाण्डिचेरी) की खुदाई में रोमन बर्तन, दीप के टुकड़े आदि प्राप्त हुए हैं रोम के अतिरिक्त यूनान, मिस, चीन और श्रीलंका के साथ भी व्यापार उन्नत अवस्था में था। 

एक अनाम प्रीक नाविक द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक पेरिष्लस आफ द ‘एरीब्रियन सी’ में विभिन्न बन्दरगाहों की सूची मिलती है। इस अर्थ में नौरा (कन्नीर), तोण्डी (आधूनिक पोन्नानी), मुशिरी और नेल्सिंहा (कोट्टयम के निकट) पश्चिमी तट के प्रमुख बन्दरगाह बताए गए है। पाण्डयों के बन्दरगाह शालियूर तथा कोरकई थे। कोरकई को पेरिप्लस में कॉल्ची भी कहा गया है। यह समुद्री मोतियों के लिए विख्यात था। यहाँ से अपराधियों द्वारा मोती निकाले जाने और उन्हें मदुरा के बाजार में बेचे जाने का उल्लेख पेरिप्लस एवं प्लिनी दोनों ने किया है। पाकजलडमरूमध्य से निकाली गई मोती पुहार (कावेरीपत्तनम्) और उरैयूर के बाजारों में बिकती थी। चेरों के बन्दरगाह तोण्डी, मुशिरी या मुजिरिस, करौरा, वाजि तथा । बन्दर थे जबकि चोलों के बन्दरगाह पुहार, अरिकमेटु तथा उरैयूर थे। उरैयूर कपास के लिए विख्यात था। पेरिप्लस में अरिकमेडु का नाम पेडोक मिलता है।

निर्यातित वस्तुओं में गरम मसाले, हाथी दाँत की बनी वस्तुएं, रेशमी बस्त्र, मोती, बहुमूल्य रत्न, नीलम, कर्पर (Tortoise Shell), वैदूर्य, तोता, मयूर, बन्दर आदि प्रमुख थे, जबकि आयातित वस्तुओं में घोड़ा, मदिरा, सीसा, सोना और चाँदी प्रमुख थे।

पाण्ड्य राज्य का एक व्यापारिक मण्डल भड़ौच बन्दरगाह से लगभग 21 ई.पू. में आगस्टस के दरबार में पहुंचा। विदेशी व्यापार की प्रमुख विशेषता थी कि व्यापार बिचौलियों द्वारा किया जाता था। विचौलिया का कार्य करने वाले मुख्य रूप से सिकन्दरिया के यहूदी एवं यवन थे। संगम युग में आन्तरिक व्यापार भी उन्नत अवस्था में था। यह वस्तु-विनियम पर आधारित था। इस समय के नमक के व्यापारियों का विशेष उल्लेख है।

संगम युग का वैदेशिक व्यापार भारतीय पक्ष में था। प्लिनी अपनी पुस्तक में इस बात के लिए आँसू बहाता है कि “उसके यहाँ का सारा सोना विलासिता की सामग्री खरीदने में भारत चला जाता है तथा प्रतिवर्ष 60 करोड़ सेस्टर्स की हानि उसके देश को होती है।”

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