शिक्षा के ज्ञानात्मक उद्देश्य

 शिक्षा के ज्ञानात्मक उद्देश्य 

शिक्षा का ज्ञानात्मक उद्देश्य अथवा मानसिक विकास का उद्देश्य (Knowledge Aim of Education)- शिक्षा के ज्ञानात्मक उद्देश्य को कुछ विद्वानों ने मानसिक विकास का उद्देश्य भी कहा है। शिक्षा के ज्ञानात्मक उद्देश्य में विश्वास भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही चला आ रहा है । गुरुकुल में रहने वाले गुरु भी इसी उद्देश्य में विश्वास रखते थे। इस उद्देश्य से है कि बालक को सभी विषयों का ज्ञान कराया जाना चाहिये ओर शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य भी बालक के ज्ञानरूपी चक्षुओं को खोलना होना चाहिए। शिक्षा वह साधन है जो बालक का मानसिक विकास करती है तथा उसके मस्तिष्क को ज्ञान के भण्डार से भरती हैं। ज्ञानार्जन उद्देश्य ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चाहिये, इसके विषय में कुछ विद्वानों का मत इस प्रकार है 

(1) कमेनियस का विचार-“ज्ञान, ज्ञान के लिये हैं अतः स्कूल का कार्य बालक को ज्ञान प्रदान करना है।” 

( 2) प्लेटो के अनुसार-“वास्तविक ज्ञान इन्द्रियजन्य नहीं होता हैं चूँकि हमारी इन्द्रियाँ हमें धोखा दे सकती हैं। वास्तविक ज्ञान विचारों या मानसिक दृष्टि से निहित होता है। ज्ञान विचारों की ही उत्पत्ति है।” 

(3) सुकरात के अनुसार-“ज्ञान ही पवित्रता है।” 

( 4) सोफिस्टों के अनुसार-“ज्ञान ही प्रगति है”। 

(5) अरस्तू के अनुसार-“ज्ञान ही शक्ति है।” 

शिक्षा से बुद्धि, बुद्धि से ज्ञान, ज्ञान से विवेक का विकास होता है। यही कारण है कि ज्ञान को शिक्षाविद् सभी प्रकार से अच्छे व्यवहार की कुंजी मानते है। ज्ञान ही वह शक्ति है जो हमारे मानसिक विकास में सहयोग देता है। ज्ञान ही सत्य की खोज करता हैं तथा मनुष्य को त्रुटियों से बचाता है। इस प्रकार की अवधारणा आदर्शावादी विचारधारा पर आधारित है।चूँकि आदर्शवाद सत्य की खोज पर बल देता है। इसी कारण वह शिक्षा के इस उद्देश्य को महत्वपूर्ण स्थान देता है किन्तु विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि शिक्षा के द्वारा सिर्फ ज्ञान के सैद्धान्तिक पक्ष का विकास नहीं होना चाहिये क्योंकि सैद्धान्तिक ज्ञान अनुपयोगी तथा व्यर्थ होता है। आवश्यकता इस बात की भी है कि शिक्षा के माध्यम से बालक को ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग भी बताया जाये। इसी सन्दर्भ में रूसों ने अपना विचार इस प्रकार व्यक्त किया है कि – 

“मेरा उद्देश्य वालक के मस्तिष्क को ज्ञान से सजाना मात्र नहीं है वरन उसे यह भी सिखाना है कि वह जब भी आवश्यक हो, ज्ञान का प्रयाग कर सके।” – रूसो 

इसी तरह जॉन एडम्स ने इस उद्देश्य का अर्थ बौद्धिक प्रशिक्षण माना है। उसने  बौद्धिक प्रशिक्षण के दो पक्ष बताये हैं। प्रथम-पोषण पक्ष तथा द्वितीय-अनुशासनात्मक पक्ष । 

एडम्स का मानना था कि मानव शरीर को जीवित रखने के लिये जिस प्रकार भोजन की आवश्यकता होती है उसी प्रकार मानव के मस्तिष्क को जीवित रखने के लिये ज्ञान की आवश्यकता होती है। मनुष्य इस ज्ञान को धीरे-धीरे आत्मसात करता है तथा अपने मस्तिष्क का एक अंग बना लेता है। यह ज्ञान मानव मन को प्रशिक्षित करता है तथा उसे सीमावद्ध करता है। अतः इसका अनुशासनात्मक महत्व भी होता है। 

सामान्यतः ज्ञान का संचय मनुष्य को मानसिक दृष्टि से पल्लवित करता है। इसके फलस्वरूप मानव मस्तिष्क एक विशाल ज्ञान का भण्डार हो जाता है। हमारे मस्तिष्क की समस्त शक्तियों, विचार, कल्पना, तर्क तथा समरण आदि भी पूर्ण रूप से विकसित होने लगते हैं। इस तरह मानव बुद्धि को क्रियात्मक रूप देकर, अपने ज्ञान का समुचित प्रयोग कर पाता है | 

वास्तविक ज्ञान केवल तथ्यों को रटना या उनका आदान-प्रदान करना मात्र ही नहीं है। ज्ञान एक क्षमता है; शक्ति है, प्रगति का मार्ग है-जिसके द्वारा हमारे अन्दर उचित कार्य करने की योग्यता उत्पन्न होती है। ज्ञान को प्राप्त करनेके पश्चात् मानव उचित-अनुचित की पहचान करने लगता है। वह उचित मार्ग की ओर उन्मुख होकर सदूचरित्रता को प्राप्त करता हैं। ज्ञान के द्वारा ही हमारे मस्तिष्क का परिमार्जन होता है और हृदय की विशालता बढ़ जाती है। फिर भी बहुत शिक्षा-विद्वान इस उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मानने के पक्ष में नहीं है। 

यहाँ पर शिक्षा के ज्ञानात्मक उद्देश्य के पक्ष तथा विपक्ष में कुछ तर्क निम्नलिखित है – 

पक्ष और विपक्ष में तर्क –

ज्ञानात्मक उद्देश्य के पक्ष में तर्क – 

सुकरात के अनुसार – (1) “जिस व्यक्ति को सच्चा ज्ञान है, वह सद्गुणी के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता है।” 

(2) यह मनुष्य को पशुओं से भिन्न करता है चूंकि पशुओं के पास ज्ञान नहीं है और मानव के पास ज्ञान होता है। 

(3) मनुष्य सही-गलत, उचित-अनुचित, सुन्दर एवं कुरूप के मध्य अन्तर करना सीख जाता है। 

(4) ज्ञान संस्कृति व सभ्यता के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ज्ञान के आधार पर ही मनुष्य भौतिक तत्य भौतिक संस्कृति को सीखता है। 

(5) इसका उपयोगितावादी और आभूषणात्मक दोनों ही दृष्टि से महत्व होता है। 

शेक्सपियर का कथन है-“ज्ञान वह पंख है जिसकी सहायता से हम स्वर्ग की प्राप्ति कर सकते हैं।” तथा 

(i) इसके अर्जन द्वारा मनुष्य अवकाश के समय का सदुयोग करना सीख जाता है और वह अपना समय व्यर्थ की क्रियाओं व्यतीत नहीं करता है। 

(ii) इसके द्वारा मनुष्य का मानसिक विकास होता है।

(iii) इसके द्वारा बालक की तर्क, विचार एवं निर्णय करने की शक्ति का विकास होता है।

(iv) विज्ञान की सम्पूर्ण खोज ज्ञान का ही परिणाम है। इसी के द्वारा मनुष्य तकनीकी तथा प्रकृति को अपने नियन्त्रण में कर लेता है। 

हुमायूँ कबीर का कथन है -“शिक्षा का उद्देश्य भौतिक संसार तथा समाज के विचारों तथा आदर्शों का ज्ञान प्राप्त करना है। इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करना निजी उन्नति तथा समाज सेवा हेतु आवश्यक है।” तथा 

(i) यह बालक को समाज से समायोजन करना सिखाता है। 

(ii) यह मानव की प्रगति का मजबूत आधार है।

(iii) ज्ञान सुख व शान्ति की कुन्जी है। कुछ विद्वान इसे सुख और शक्ति का आधार भी मानते हैं। 

जब व्यक्ति ज्ञानार्जन अपने निजी ‘स्व’ को सन्तुष्ट करने हेतु करता है तो उसे उससे खुशी (प्रसन्नता), शान्ति व शक्ति मिलती और यह ज्ञानार्जन उसे आत्म नियन्त्रण के योग्य भी बनाता है। जब ज्ञानार्जन के माध्यम से व्यक्ति कुछ प्राप्त करना चाहता है तो वह संसार में अपनी प्रभुसत्ता व प्रतिष्ठा स्थापित करता है। समाज के प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक स्तर पर उसका सम्मान होता है। प्रत्येक नव की दृष्टि में ज्ञानी व्यक्ति-ज्ञानी लगता है, ध्यानी लगता है तथा निराभिमानी लगता है। यह स्थिति परमब्रह्म को प्राप्त करने के लिये आवश्यक मानी जाती हैं। 

ज्ञानात्मक उद्देश्य के विपक्ष में तर्क –

इसके विपक्ष में निम्न तर्क दिये गये हैं –

(1) यह विशाल जनसमूह के लिये उपयोगी नहीं है क्योंकि प्रत्येक बालक के सीखने व ज्ञानार्जन करने की क्षमता मृग-अलग होती है। इसी कारण से इसे कुछ शिक्षाशास्त्रियों ने अमनोवैज्ञानिक भी कहा है।

(2) इसका आभूषणात्मक महत्व अधिक है, उपयोगिता का स्थान कम। 

(3) यह उद्देश्य क्रिया या करके सीखने पर बहुत कम महत्व देता है तथा इसमें स्मृति पर अधिक महत्व दिया जाता है।

(4) केवल मस्तिष्क के विकास पर बल देने के कारण यह एक पक्षीय हो जाता है, जबकि यह तथ्य प्रसिद्ध है कि “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ्य मस्तिष्क का निवास होता है।

(5) यह परम्परागत व आदर्शवादी विचारधारा पर आधारित है। 

फैरार के अनुसार-“ज्ञान समझदारी के साथ विवेक है। व्यवस्था के साथ शक्ति है।दया के साथ भलाई है। धर्म के साथ सद्गुण है तथा जीवन और शान्ति है।” 

ह्वाइटहैड के अनुसार-“केवल ज्ञानी व्यक्ति परमात्मा की पृथ्वी पर सबसे व्यर्थ का अभद्र मनुष्य होता है।” 

(6) इसमें ज्ञान प्रदान करने के साधन के रूप में अध्यापक का महत्व अधिक हो जाता है व छात्र का महत्व गौण हो जाता है। 

इस प्रकार शिक्षा के ज्ञानात्मक उददेश्य के सन्दर्भ में विद्वान एकमत नहीं है और उनके विचारों में पर्याप्त मतभेद हैं।

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