वैयक्तिक विघटन की परिभाषा, कारण

 वैयक्तिक विघटन की परिभाषा, कारण

व्यक्तिक विघटन – वैयक्तिक विघटन सामाजिक रूप से स्वीकृत आदर्श नियमों स्ते व्यक्ति द्वारा विलग होने की दशा को वैयक्तिक विघटन कहते हैं।

परिभाषा – 

(1) लेमर्ट -“वैयक्तिक विघटन एक दशा या प्रक्रिया है जिसमें कि व्यक्ति प्रमुख भूमिका के प्रति अपने व्यवहार को स्थिर नहीं रख पाया है। उसकी भूमिका का चुनाव उलझन एवं विरोधपूर्ण है। ऐसा विघटन अस्थायी हो सकता है और निरन्तर भी।” 

(2) इलियट और मेरिल -“विघटित व्यक्ति अपना कार्य दूसरों के साथ भलीभांति नहीं कर पाता है। और सामाजिक विघटन की प्रक्रिया को प्रतिपादित करता है।”

(3) जेन्सन -“इस प्रकार विचलित (विघटित) व्यक्तियों के आचरण या मनोवृत्तियों में समूह द्वारा स्वीकृत आदर्शों तथा मापदण्डों का स्खलन देखा जा सकता है।” 

(4) फेयरचाइल्ड -“वैयक्तिक विघटन किसी व्यक्ति की समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार प्रणाली के पालन की अयोग्यता या अनिच्छा की ओर संकेत करते हैं, जो व्यक्ति के दोषपूर्ण सामाजिक असमायोजन को जन्म देती है। सामान्य रूप से वैयक्तिक विघटन व्यक्ति के दृष्टिकोण और व्यवहार तथा सामूहिक (या सामाजिक) मूल्यों के बीच संघर्ष का परिणाम हैं।” इस प्रकार “वैयक्तिक विघटन उस स्थिति का नाम है, जिसमें व्यक्ति सामाजिक मूल्यों और आदर्शों को मान्यता नहीं देता है साथ ही अपने लिए ऐसे व्यवहार प्रतिमानों को जन्म देता है, जो समाज स्वीकृत नहीं होते हैं ।” 

वैयक्तिक विघटन के कारण – वैयक्तिक विघटन के निम्नलिखित कारण हैं – 

1. वैयक्तिक मनोवृत्ति और सामाजिक मूल्य – किसी विशेष स्थिति में ऐसे विशेष ढंग से कार्य करने की प्रवृत्ति को मनोवृत्ति कहते हैं। मूल्य वे अर्थपूर्ण उद्देश्य हैं जो इस व्यवहार के पीछे छिपे हैं। अपने अतीत के अनुभवों से हर व्यक्ति कुछ मनोवृत्तियाँ अथवा दृष्टिकोण तथा उनके मूल्यों के प्रति एक विशिष्ट प्रकार की प्रतिक्रिया अर्जित करता है। किसी भी व्यक्ति के बाही व्यवहार को सही अर्थों में समझने के लिए हमें उसके आन्तरिक अनुभवों एवं मनोवृत्तियों को समझना आवश्यक है। इस आन्तरिक अध्ययन के अभाव में बाहा व्यवहार, जो वैयक्तिक विघटन से सम्बन्धित हो सकता है, का समझ पाना असम्भव हो जाता है। व्यक्ति अपनी मनोवृत्ति तथा दृष्टिकोण के आधार पर सामाजिक मूल्यों की व्याख्या करता है तथा उन पर अमल करता है। प्रत्येक व्यक्ति के भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं और उसके भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण भी होते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक मूल्यों की व्यवस्था भी भिन्न होती है। 

2. सामाजिक संरचना और वैयक्तिक विघटन – इसको निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है – 

(क) पद की असुरक्षा की भावना – बालक या वयस्क, हरेक सुरक्षा की भावना को प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है। बालक की अपने परिवार में स्थिति, उसका स्कूल से सामंजस्य, उसका विषम लिंगियों के सम्पर्क में विकास तथा उसका विवाह, इन सभी विभिन्न समूहों में वह इच्छित पद प्राप्त करने की इच्छा करता है। अपने प्रारम्भिक काल में उसमें आत्मसुरक्षा की भावना इस बात से उचित होती है कि वह अपने माता-पिता की सन्तान है और हर प्रकार से उन्हीं का है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके पद उसके व्यक्तिगत गुणों से निश्चित होने लगते हैं और वह अपने व्यवहार अपने सौन्दर्य अथवा अपनी बुद्धिमत्ता के कारण प्रतिष्ठा अथवा तिरस्कार प्राप्त करता है। फलस्वरूप वैयक्तिक विघटन के अवसर खड़े हो जाते हैं।

(ख) पदों और भूमिकाओं की विविधता – आधुनिक जटिल समाज में पदों एवं भूमिकाओं की बहुलता एक बड़ी हद तक वैयक्तिक विघटन को जन्म देती हैं। वातावरण में एकता, जो जीवन-संगठन के लिए आवश्यक है, समाप्त हो जाती है और इसका स्थान विविधता ले लेती है। संगठन की एकता के अभाव में व्यक्ति यह निश्चित नहीं कर पाता कि समाज उससे किस भूमिका की आशा कर रहा है। एक भावुक व्यक्ति इस प्रकार अपने पद और भूमिका पर अविश्वास कर सकता है और वैयक्तिक संगठन को समाप्त कर सकता है। ऐसी दशा में व्यक्ति सुख-प्राप्ति ही अपना लक्ष्य बना सकता है और भौतिक सुख को जीवन का लक्ष्य बनाकर चलने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से विघटन के लिए अनेक अवसर दे सकता है। 

(ग) मानसिक एवं शारीरिक दोष – व्यक्ति की कुछ अपनी शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता भी समाज में उसकी भूमिका को असन्तुष्ट बना सकती है। ऐसा विशेष रूप से व्यवहार की सामाजिक परिभाषाओं पर ही निर्भर है। एक व्यक्ति जो अन्धा है अथवा मानसिक दुर्बलता से ग्रसित है, या अन्य शारीरिक विकारों का शिकार है, यह सामाजिक संरचना में अर्जित पद प्राप्त करने में पिछड़ जाता है। केवल इतना ही नहीं, बत्वि सामाजिक परिभाषाएँ उसे अन्य अनेक ढंगों से भी अपनी भूमिका को सफलतापूर्वक अदा करने में असमर्थ बना देती हैं जो उसमें हीनता की भावना (Inferiority Complex) को जन्म देकर उसके व्यक्तित्व को विघटित कर सकती है। 

(घ) पदों और भूमिकाओं में असंगति – आज व्यक्ति को नई और बिल्कुल भिन्न परिस्थितियों का सामना करना होता है जिनके लिए समाज में स्वीकृत कार्यों का अभाव होता हैं। उदाहरण के लिए पूँजीवादी का एक पद है। अब अपने स्वार्थ को ध्यान में रखते हुए हुए तो वह गरीब मजदूरों का शोषण करने को उचित समझ सकता है, किन्तु नैतिक एवं धार्मिक स्थितियां तथा प्रतिमान उसे वैसा करने के लिए निषेध करते हैं। इस प्रकार वह समझ नहीं पाता कि उसकी वास्तव में भूमिका क्या है क्लिंटन ने इसे इस प्रकार कहा है-“व्यक्ति अपने को बहुधा ऐसी स्थितियों के समक्ष पाता है जिनमें कि वह दोनों के ही पद और कार्यों के विषय में अनिश्चित है – अपने और साथ ही दूसरों के भी”। 

3. संकट और वैयक्तिक विघटन – वैयक्तिक संकट को भी सामाजिक संकट की भाँति दो रूपों में देखा जा सकता है – 

(क) आकस्मिक संकट, और (ख) संचयी -संकट 

(क) आकस्मिक संकट ( Precipitate Crisis ) – आकस्मिक संकट को कई रूपों में समझा जा सकता है- 

(i) परिवार के किसी स्नेही सदस्य को मृत्यु अन्य पारिवारिक जनों के प्रति एक आकस्मिक वैयक्तिक संकट की स्थिति लाकर खड़ी कर देती है। परिवार के सदस्यों को उसकी उपस्थिति में बनी हुई आदत में परिवर्तन करना पड़ता है जो वैयक्तिक विघटन को जन्म दे सकता है। 

(ii) समस्या उस समय और भी जटिल एवं भयंकर बन जाती है जबकि परिवार में कमाने वाले सदस्य की ही मृत्यु हो जाए। ऐसी स्थिति में माँ उद्योग में काम करने के लिए बाध्य हो जाती है और साथ ही को बच्चों गलियों में अखवार बेचने पड़ते हैं और सभी सदस्यों का जीवन-व्यस्त हो जाता है। 

(iii) यदि किसी लखपति के यहाँ डाका पड़ जाए और उसके घर में खाने तक को कुछ न कुछ रह जाए तो नि:संदेह यह वैयक्तिक संकट का उदाहरण होगा जो उसके विघटन की संभावना पैदा कर देता है। इसी प्रकार अनेक प्रकार के आकस्मिक संकट आ सकते हैं जो व्यक्ति को विघटित कर सकते हैं। 

(ख) संचयी संकट (Cumulative Crisis ) – संचयी संकट वह है जो धीरे धीरे बढ़ते-बढ़ते व्यापक रूप धारण कर व्यक्ति की आदतों में परिवर्तन उत्पन्न कर देने की क्षमता रखता है। इसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा समझाया जा सकता है। 

(1) प्रेम अथवा वैवाहिक सम्बन्धों में असन्तोष किसी के व्यक्तित्व को विघटित कर सकता है। उदाहरण के लिए पति-पत्नी का मनमुटाव जो समय के साथ-साथ बढ़ता जाता है एक स्थिति में जाकर तलाक (Divorce), पृथक्करण (Separation) या परित्याग (Desertion) की नौबत ला देता है जो वैयक्तिक विघटन का आधार होता है। 

(2) सम्पत्ति का नाश भी किसी के व्यक्तित्व पर बुरा प्रभाव डालता है क्योंकि इससे पद् (Status) की हानि होती है और व्यक्ति अपने को असुरक्षित समझता है। इसी प्रकार की अनेक पटनाएं व्यक्ति के जीवन प्रबाह में बाधा उत्पन्न करती हैं, जो सामाजिक विघटन को गति देती हैं।

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