विद्यालय का अर्थ तथा समाज में विद्यालय की आवश्यकता एवं महत्व

 विद्यालय का अर्थ  तथा समाज में  इसकी आवश्यकता एवं महत्व 

विद्यालय दो शब्दों से मिलकर बना है- विद्या +आलय = ‘विद्या का घर’। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि विद्यालय वह स्थान है जहाँ विद्या प्रदान की जाती हैं अथवा हम यह भी कह सकते हैं कि विद्यालय का अर्थ उस स्थान अथवा संस्था से हैं जहाँ समाज की नवजात पीढ़ी को उसकी क्षमता एवं बुद्धि के अनुसार निश्चित विधि से सुप्रशिक्षित अध्यापकों द्वारा समाज, विज्ञान, कला, कौशल, धर्म, नैतिकता और दर्शन आदि का ज्ञान कराया जाता है। 

परिभाषा – विद्वानों द्वारा दी गयी विद्यालय की परिभाषा निम्नवत् है – 

रॉस के अनुसार, “विद्यालय वे संस्थाएं है जिनका मानव ने इस उद्देश्य से निर्माण किया है कि वे बालकों को समाज का योग्य एवं समायोजित सदस्य बनाने में सहायक हों।” 

जॉन डीवी का मत है कि “विद्यालय का तात्पर्य एक ऐसे वातावरण से हैं जहाँ जीवन के गुणों और कुछ विशेष प्रकार की क्रियाओं और व्यवसायों की शिक्षा इस उद्देश्य से ही जाती है कि बालक का विकास वांछित दिशा में हो।” 

ओटावे के अनुसार, “विद्यालय युवकों को विशेष प्रकार की शिक्षा देने वाले सामाजिक आविष्कार के रूप में समझे जाते हैं।” 

विद्यालय की आवश्यकता एवं महत्व – 

ऐसी संस्थाएँ जो समाज विकास और समाज सुधार के लिए अत्यन्त आवश्यक होती है उनकी स्थापना मानव द्वारा की जाती रही है। ऐसी मानव स्थापित संस्थाओं और समितियों में विद्यालय का स्थान, महत्व तथा आवश्यकता की दृष्टि से सर्वोपरि है। आज शिक्षा के लिए विद्यालय एक अत्यन्त ही आवश्यक एवं शक्तिशाली साधन है। शिक्षा प्रत्येक स्तर के लिए आवश्यक है। अतः समाज में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। निम्नलिखित तथ्यों से इनकी आवश्यकता एवं महत्व स्पष्ट हो जाता है – 

(1) आधुनिक युग में ज्ञान की विविधता एवं सांस्कृतिक विरासत इतनी बढ़ गयी है कि घर अथवा परिवार द्वारा इनको शिक्षा देना असम्भव हो गया है। अतः यह कार्य विद्यालय के द्वारा ही पूर्ण किया जाता है। संस्कृति को एकत्रित करने तथा उनकों दूसरों तक पहुँचाने का उपयुक्त साधन विद्यालय ही है। विद्यालयं बालक के पारिवारिक जीवन एवं बाह्य जीवन को जोड़ने वाली एक महत्वूपर्ण कड़ी है। दूसरों के सम्पर्क में आने से बालक का दृष्टिकोण विशाल हो जाता है और उसका बाह्य समाज से सम्पर्क स्थापित हो जाता है। 

(2) किसी शिक्षण संस्था अथवा विद्यालय के कुछ पूर्व निश्चित उद्देश्य एवं आदर्श होते हैं। इसका बालक पर प्रभाव पड़ता है और उसके व्यक्तित्व का सामन्जस्यपूर्ण विकास होता है। यद्यपि शिक्षा के अन्य कई साधन भी है, परन्तु वे बालक के व्यक्तित्व के विकास में इतने सहायक नहीं होते हैं, जितने की विद्यालय होते हैं। अतः विद्यालय का अत्यन्त महत्व होता है। 

(3) विद्यालय एक स्वच्छ,सरल, शुद्ध एवं सन्तुलित वातावरण देते हैं जिसका बालक की प्रगति एवं विकास पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। इसी वातावरण में बालक का शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक विकास सम्भव होता है और पर बालक को अपने यह भविष्य के लिए रोटी-रोजी कमाने की शिक्षा मिलती है। 

(4) विद्यालय में शिक्षा देने का कार्यक्रम एक निश्चित पाठ्यक्रम के अनुसार चलता है। इसलिए बालकों की शक्ति का अपव्यय नही होता है और समय की बचत होती है। यह पर बालकों में उचित आदतों, रूचियों एवं दृष्टिकोण का विकास होता है। यहाँ पर अनेक परिवारों के बालक एक साथ रहकर सामाजिक शिष्टाचार, सहानुभूति, निष्पक्षता, सहयोग आदि का गुण ग्रहण करते हैं। 

(5) विद्यार्थियों के वातावरण तथा समाज के साथ अनुकूलीकरण करने में विद्यालय विशेष रूप से सहायता करते हैं, इनके सहयोग तथा मार्गदर्शन से अनुकूलीकरण सरलता एंव सुगमता से हो जाता है। अतः विद्यालय का महत्व एवं आवश्यकता मानव, समाज में अनिवार्य बन गयी है। 

विद्यालयों को प्रभावशाली बनाने का सुझाव विद्यालय को शिक्षा का प्रभावशाली साधन बनाने के सुझाव निम्नवत है – 

(1) परिवार या घर से सहयोग – विद्यालयों को शिक्षा का प्रभावशाली साधन बनाने के लिए उनका विद्यार्थियों के परिवार या घर से सहयोग तथा सम्पर्क किया जाना चाहिए। बालक के शारीरिक विकास में गृह एवं पाठशाला का सहयोग होना चाहिए। अध्यापकों को बालकों के स्वास्थ्य के विषय में अभिभावकों को परिचित कराते रहना चाहिए। समय-समय पर अध्यापकों तथा अध्यापिकाओं को विद्यार्थियों के घर जाना चाहिए और उनके माता-पिता से विद्यार्थी के कार्यों आदि के विषय में बातचीत करना चाहिए। प्रत्येक विद्यालय में माह में एक दिन अभिभावक दिवस का आयोजन किया जाना चाहिए जिसमें बालकों के अभिभावकों को आमंत्रित किया जाना चाहिए। अभिभावक संघ की स्थापना भी अत्यन्त आवश्यक है। विद्यालय की प्रबन्ध समिति में अभिभावकों का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए। बालकों के शारीरिक, मानसिक नैतिक तथा सामाजिक विकास की रिपोर्ट अभिभावकों को अवश्य भेजी जानी चाहिए। अभिभावकों को इस रिपोर्टों का सार भी अवश्य देना चाहिए। समय-समय पर अध्यापकों, अभिभावकों एवं शिक्षा विभाग के कर्मचारियों का सम्मेलन आयोजित किया जाना चाहिए। इन कार्यों से विद्यालयों और परिवार में अवश्य ही सहयोग स्थापित होगा और विद्यालय शिक्षा के प्रभावशाली साधन बनेंगे। 

(2) विद्यालयों का सामाजिक जीवन से सम्बन्ध स्थापित करना – सामान्यतया यह होता है कि जो विद्यालय प्रचालन में है उसका सम्बन्ध समाज से बिल्कुल ही नही होता है जिसके परिणाम स्वरूप हमारे देश के बालक जब शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वास्तविक जीवन में प्रवेश करते हैं तो उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। विद्यालयों की शिक्षा को प्रभावशाली साधन बनाने के लिए यह आवश्यक है कि विद्यालयों का सामाजिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया जाये। 

जान डीवी के शब्दों में – “विद्यालयों को समाज का प्रतिनिधि होना चाहिए।” 

इसके लिए सामाजिक विषयों यथा नगारिकशास्त्र, इतिहास, शिक्षाशास्त्र और अर्थशास्त्र आदि के अध्ययन पर बल दिया जाना चाहिए जिससे विद्यालयी शिक्षा प्रभावशाली बनेगी और वालक का सम्बन्ध समाज से बनना प्रारम्भ होगा।

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