मिस्त्र की पिरामिड कला

 मिस्त्र की पिरामिड कला 

प्राचीन मिस्र की सभ्यता का सर्वोच्च तत्व कला है। इतिहास के प्रवेश द्वार पर ही हमें एक ऐसी महान् और परिपक्व कला की प्राप्ति होती हैं जो किसी भी वर्तमान देश की कला से श्रेष्ठ है और केवल यूनानी कला से ही तुलनीय हैं। स्वेन के अनुसार बेबीलोन की सभ्यता की सपळलता का राज है जहाँ का मन्दिर और मिस की महत्ता के कारण है पिरामिड और राजकीय समाधियाँ मिरासी महान् निर्माता थे। मिल की सांस्कृतिक प्रसिद्धि के कारण उसके प्राचीन समाट नहीं अपितु उसके कलाकार हैं। कहा जाता है कि मिली कलाकार संसार के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकार थे। उन्होंने ईटों और पत्थरों के ऐसे भवन, मन्दिर एवं समाधियाँ निर्मित किया जो संसार में अद्वितीय थे। वैसी इंजीनियरिंग तो ईसा के पश्चात् अठारहवीं शती ई. तक यूरोप में भी नहीं दृष्टिगत होती। उनकी लम्बी नहरे, विशाल बाँध और बड़े बड़े सरोवर उसकी कला-कुशलता के परिचायक हैं। इतना ही नहीं उन्होंने जिन पिरामिडों का निर्माण किया वे संसार के वस्तुओं को चुनौती देते हैं तथा काल की करालता का मजाक उड़ाते हैं। इतना होते हुए भी मिसी कला का भावार्थ समझने के लिये कोई भी एक व्यवस्था सही नहीं होगी। इसके अभिप्राय विभिन्न थे और जिन आदर्शों से प्रेरित थे वे राजनीतिक और सामाजिक इतिहास के बदलने के साथ परिवर्तित होते रहे। सामान्य रूप से वे राष्ट्रीय भावनाओं की समग्रता को व्यक्त करते थे। यह कला मात्र कला के लिये  नहीं और न तो व्यक्ति की निजी समस्याओं को व्यक्त करने का माध्यम थी। किन्तु समय के बदलाव के साथ कलाकार ने रूढ़िवादिता का त्याग कर दिया ठसने कला की प्राकृतिक सौन्दर्य से जोड़ दिया। स्तम्भों को ताड़ के तने का आकार दिया तथा उनके सिर की चौकी खिले हुए कमल के सदृशा बनाई जाने लगी। मिली कला की एक और विशेषता उनकी अनश्वरता है। सभी कला कृतियाँ पत्थरों की होने के कारण स्थायी हैं। 

पिरामिड कला -प्राचीन काल की मिस की प्रधान कला कृतियाँ पिरामिड है इसलिए इस युग का ही नाम पिरामिड युग रखा गया है । इस काल में लगभग 70 पिरामिड निर्मित किये गये। सबसे विशालकाय पिरामिड गीजा के 13 एकड़ के मैदान में खूफू का है। इसमें 32 लाख पत्थर लगे हैं जिनमें डेढ़ सौ पत्थर ढाई टन वजन के भी हैं। इसकी ऊंचाई 480 फीट से अधिक है तथा प्रत्येक ओर 755 फीट लम्बा है। गीजा के पिरामिड पर 160 फीट लम्बी एक पत्थर की प्रतिमा है जिसका सिर सतीस फीट लम्बा और मुख की चौड़ाई 13 फीट 8 इंच है। हेरोडोटस के मत से इस पिरामिड के निर्माण में एक लाख आदमी बीस वर्ष तक लगे रहे। भारी-भारी पत्थरों को सुदूर स्थानों से लाकर इतनी ऊँचाई पर बढ़ा ले जाना आश्चर्य है। इसी कारण पिरामिड संसार की आश्चर्यजनक कृति माने जाते हैं। इतिहास के विद्वान ब्रेस्टेड महोदय का कथन है कि इस तथ्य में विश्वास नहीं होता कि पिरामिड उन्हीं मानवों द्वारा निर्मित हैं जिनके पूर्वज कुछ पीढ़ी पहले मरूस्थल में गड्ढे बनाकर समाधिस्थ किये जाते थे। 

पिरामिड निर्माण के उद्देश्य – पिरामिड के निर्माण के विभिन्न उद्देश्य बताये जाते हैं। (1) एक सामान्य मत के अनुसार फेराओं द्वारा आर्थिक संकट काल में जनता की जीविका निर्वाह के लिए निर्मित ये निरर्थक कृतियाँ हैं परन्तु उपर्युक्त मत तो केवल इसी आधार पर तर्कहीन हो जाता है कि पिरामिडों का निर्माण मिरुतर की उन्नत अवस्था में हुआ था (2) उक्त मत के विपरीत ट्रेवर महोदय (हि. आफ. ए. सि. पृ. 47) का मत है कि मिल की कला अधिकांशतः धर्म से अनुप्राणित है। धर्म ने ही उसका उद्देश्य निर्धारित किया, उसका स्वरूप निश्चित किया और उसे प्रतीकात्मक महत्व प्रदान किया। (3) प्रो. वर्नस के अनुसार पिरामिडों का प्रमुख महत्व धार्मिक और राजनीतिक था ये धार्मिक कृतियाँ हैं और साथ ही सम्राटों की महत्वाकांक्षा की प्रतिमूर्तियाँ भी है जिनमें राज्य का स्थायित्व प्रकाशित है (4) इसके साथ ही मिसवासी सूर्यपूजक था अतः उसने उक्त पिरामिडों का निर्माण सूर्य की प्रथम किरणों के स्वागतार्थ किया। (5) परन्तु वास्तविक बात तो यह है कि ये पिरामिड मृत सम्राटों की समाधियाँ हैं। मिस्त्री लोगों का ऐसा विश्वास था कि यदि मृतक के स्थूल शरीर को सुरक्षित रखा जाय तो उसी के साथ उसका सूक्ष्म शरीर भी रहकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति चाहता है। उनके अनुसार आत्मा अमर है और मृत शरीर में पुनः प्रवेश करना है। इसलिए दीर्घ काल तक शव की सुरक्षा के लिए इन विशाल और चिरस्थायी पिरामिडों का निर्माण हुआ। इस प्रकार इन विशाल समाधियों का निर्माण कर फेराओं ने प्रजा में आत्मा को अमरता और एकता का सन्देश दिया।

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