मानव अधिकार की अवधारणा के विकास

 मानव अधिकार की अवधारणा के विकास 

मानव अधिकारों के संरक्षण के प्रमाण प्राचीन काल की बेबीलोनिया विधि, असीरिया विधि, हित्ती विधि तथा भारत में वैदिकालीन धर्म में पाए जा सकते हैं। विश्व के सभी प्रमुख धर्मों का आधार मानवतावादी है जो अन्तर्वस्तु में भेद होने के बावजूद मानव अधिकारों का समर्थन करते हैं। मानव अधिकारों की जड़ें प्राचीन विचार तथा “नैसर्गिक विधि” और “प्राकृतिक अधिकारों की दार्शनिक अवधारणाओं में पायी जाती हैं। कुछ यूनानी तथा रोमन दार्शनिकों ने प्राकृतिक अधिकारों के विचार को मान्यता प्रदान की थी। प्लेटो (427-348 बी.सी.) उन सर्वप्रथम लेखकों में से एक थे जिन्होंने नैतिक आचरण के सार्वभौमिक मानक की वकालत की थी। इसका अभिप्राय यह था कि विदेशियों से उसी प्रकार संव्यवहार किए जाने की अपेक्षा की जाती है जिस प्रकार से कोई राज्य अपने देशवासियों से संव्यवहार करता है। इसमें सभ्य ढंग से युद्धों के संचालन की भी विवक्षा होती थी। रिपब्लिक (सी. 400 बी.सी.) ने सार्वभौमिक सत्यों के विचार का प्रस्ताव रखा जिसे सभी को मान्यता देनी चाहिए। व्यक्तियों को सार्वभौतिक कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए। अरिस्टाटेल (384-322 बी.सी.) ने राजनीति में लिखा कि न्याय, सद्गुण (अपतजनतम) तथा अधिकार भिन्न प्रकार के संविधानों तथा परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। सिसरो (106-43 बी.सी.), जो एक रोमन राजनेता थे, ने अपनी कृति-दि लॉज (52 बी.सी.) में प्राकृतिक विधि तथा मानव अधिकारों की नींव रखी। सिसरो का यह विश्वास था कि ऐसी सार्वभौमिक मानव अधिकार विधियाँ होनी चाहिए जो रूढ़िगत तथा सिविल विधियों से श्रेष्ठ हों । सोफोक्लेज (495-406 बी.सी.) राज्य के विरुद्ध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विचार का प्रवर्तन करने वाले अग्रणी व्यक्तियों में से एक थे। 

इंग्लैण्ड के सम्राट जॉन द्वारा 15 जून, 1215 को इंग्लिश सामन्तों को प्रदान किया गया मैग्ना कर्टा (मैग्ना कार्टा के नाम से भी विदित) तृतीय धर्मयुद्ध (Cruisade) द्वारा सृजित भारी कराधान के भार तथा श्रद्धेय सम्राट, हेनरी, षष्ठम द्वारा बन्दी बनाए गए रिचर्ड, प्रथम की फिरौती के उत्तर में था। इंग्लिश सामन्तों ने भारी करों का विरोध किया था तथा वे अपने अधिकारों में बिना किसी रियायत के सम्राट जॉन को पुनः शासन चलाने देने के इच्छुक नहीं थे। मैग्ना कार्टा का अतिसाधनकारी (over reaching) विषय सम्राट के निरंकुश कृत्य के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करना था। भूमि तथा सम्पत्ति का अब और कोई अभिग्रहण नहीं किया जा सकेगा। न्यायाधीशों को विधियों की जानकारी रखनी आवश्यक थी तथा उन्हें विधियों का सम्मान एवं पालन करना पड़ेगा। कोई भी कारावास दण्डादिष्ट नहीं किया जा सकेगा। व्यापारियों को इंग्लैण्ड के भीतर तथा बाहर स्वतंत्रतापूर्वक यात्रा करने का अधिकार प्राप्त होता रहेगा। मैग्ना कार्टा ने भी खण्ड 39 में जूरी विचारण की अवधारणा को प्रारम्भ किया जिमें मनमानापूर्ण ढंग से की गई गिरफ्तारी तथा कारावास के विरुद्ध संरक्षण प्रदान किया गया। 

इस प्रकार, चार्टर में यह सिद्धान्त पेश किया गया कि सम्राट की शक्ति अत्यंतिक नहीं होती है। यद्यपि चार्टर विशेषाधिकार प्राप्त उच्चवर्गीय लोगों के लिए लागू होता था, शनैः शनैः इस अवधारणा का विस्तार हुआ तथा वर्ष 1689 में बिल ऑफ राईट्स में समस्त इंग्लिश व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया और अन्ततः सभी नागरिक इसकी परिधि में आ गए। वर्ष 1216-17 में, जॉन के पुत्र, हेनरी तृतीय के शासनकाल के दौरान, मैग्ना कार्टा की संसद द्वारा पुष्टि की गयी, और वर्ष 1297 में एडवर्ड, प्रथम ने इसकी उपान्तरित रूप में पुष्टि की। वर्ष 1628 में पेटिशन ऑफ राईट्स द्वारा तथा वर्ष 1689 में बिल ऑफ राईट्स द्वारा इसे और अधिक सुदृढ़ किया गया जिससे कि सम्राट पर संसदीय सर्वोच्चता प्रदान करने तथा इंग्लैण्ड में विधियों के नियम हेतु दस्तावेजी प्रमाण देने के लिए मंच तैयार किया जा सके। उपरोक्त, सेंट थॉमस एक्वीनास तथा ग्रोसियस के लेखों में भी इस विचार की झलक मिलती है कि मानव जाति को कतिपय व्यापक तथा असंक्राम्य (inalilenable) अधिकार प्राप्त है। 

“मनुष्य मूल अधिकारों” की अभिव्यक्ति कई राज्यों की घोषणाओं और संवैधानिक लिखलों में पाई जाती है। उदाहरण के लिए, 1776 में 13वें संयुक्त राज्य अमेरिका के स्वतंत्रता की घोषणा, वर्जिनिया बिल ऑफ राईट्स 1776, संयुक्त राज्य के 1787 के संविधान में तथा उसके पश्चात् 1789, 1865, 1869 और 1919 के सविधान संशोधनों में पुरुषों के अधिकारों को शामिल किया गया है। मनुष्य के अधिकारों की 1789 में फ्रांसीसी घोषणा ने अन्य यूरोपीय देशों को मानव अधिकार के संरक्षण के लिए विधियों में प्रावधान शामिल करने के लिए उत्प्रेरित किया। 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही अधिकतर राज्यों द्वारा यह मान्यता दी गई कि मानव कतिपय अधिकार धारण करते हैं। अतः मानव व्यक्तित्व की तथा उसके संरक्षण की आवश्यकता कई विकसित राज्यों द्वारा महसूस की जाने लगी और मानव को अधिकार प्रदान किया जाने लगा। 1809 में स्वीडन, 1812 में स्पेन, 1814 में नार्वे, 1813 में बेल्जियम, 1849 में डेनमार्क, 1850 में प्रसा और 1874 में 

स्विट्जरलैण्ड में मनुष्य के मूल अधिकारों के लिए प्रावधान बनाए गए। अतः यह कहा जा सकता है कि कई राज्यों ने उन्नीसवीं सदी तक अपने अपने संविधानों में मानव के अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रावधान बना लिए थे किन्तु उन अधिकारों को मानव अधिकार नहीं कहा जाता था। मानव अधिकार शब्द सर्वप्रथम थामस पेन द्वारा इस्तेमान किया गया जो फ्रांसीसी घोषणा में पुरुषों के अधिकारों का अंग्रेजी अनुवाद है। मानव अधिकार शब्द पुरूषों के अधिकार शब्द से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है क्योंकि पुरूषों के अधिकार में महिलाओं के अधिकार शामिल होने का आभास नहीं होता।

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