भारत में सामाजिक विघटन

भारत में सामाजिक विघटन

 क्या भारतीय समाज आज विघटन की स्थिति में हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देना कठिन है। अधिकांश विद्वानों का यह मत है कि आज भारत सामाजिक विघटन के सभी लक्षण देखे जा सकते हैं। भारतीय समाज में मतैक्य का अभाव पाया जाता है। राष्ट्रीय महत्त्व के प्रमुख मुद्दों पर सरकार एवं विरोधी दलों में स्पष्ट मतभेद हैं तथा समाज के संस्थागत आधारों एवं मूल संस्थाओं में नैतिक पतन के कारण काफी डास हुआ है। सार्वजनिक जीवन में अष्टाचार का बोलबाला है तथा साम्प्रदायिकता अशिक्षा, अपोषण, अपराध बे बालापराच, अन्धविश्वास,वेरोजगारी, निर्धनता, जातिवाद, मद्यपान व मादक इला व्यसन वेश्यावृत्ति, भिक्षावृत्ति, आत्महत्या, अस्पृश्यता तथा अनेक अन्य समस्याओं में निरन्तर वृद्धि आदि समाज में विघटन के स्पष्ट लक्षण हैं। जाति व्यवस्था जातिवाद का रूप धारण कर चुकी है तथा आज भी अनेक राज्यों में जातीय आधार पर दंगों के उदाहरण मिलते हैं। सरकारी प्रयासों के बावजूद निम्न जातियों का तथा जनजातियों का शोषण आज भी हो रहा हैं। संयुक्त परिवार पर परिवर्तन की प्रक्रियाओं का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है जिसके कारण यह एकाकी परिवारों का रूप ग्रहण करता जा रहा है, परिवार के प्रति लगाव कम होता जा रहा तथा परिवार टूटने लगे हैं जोकि बच्चों पर प्रभाव की दृष्टि से उचित नहीं है। टूटे तका भगन परिवार विविध प्रकार की समस्याओं को पैदा करके विघटन की प्रक्रिया को प्रोत्साहन देते हैं। 

परिवर्तन की सभी प्रमुख प्रक्रियाओं – संस्कृतिकरण (Sanskritization), नगरीकरण व औद्योगीकरण (Urbanization and Industrialization), पश्चिमीकरण व आधुनिकीकरण (Westernization and Modernization), सार्वभौमिकरण व स्थानीयकरण (Universalization and Parochialization), तथा लौकिकीकरण (Secularization)-ने परम्परागत तथा आधुनिक मूल्यों में संघर्ष की स्थिति पैदा कर दी है जिससे समाज के परम्परागत मूल आधारों को आघात पहुंचा है। व्यक्तियों में असामंजस्य की वृद्धि हुई है तथा विविध प्रकार की समस्याएं पैदा हुई है एम. एन. श्रीनिवास, मैकिम मैरियट, एस. सी. दुबे, बजराज चौहान, एम० एस. ए. राव, योगेन्द्र सिंह, आन्द्रे बेतेई, कैथलीन गफ, ए, आर. देसाई, आई. पी. देसाई, एम. एम. गोरे तथा अनेक अन्य विद्वानों ने जो अध्ययन किए हैं उनसे हमें ग्रामीण एवं नगरीय समाज में होने वाले परिवर्तनों तथा परम्परा व आधुनिकता में संघर्ष की स्थिति के बारे में पता चलता है। डॉ. राधाकमल मुकर्जी ने औद्योगीकरण को सामाजिक विघटन का प्रमुख कारण बताया है क्योंकि एक ओर औद्योगीकरण जाति व्यवस्था एवं संयुक्त परिवारों में परिवर्तन द्वारा असामंजस्य की स्थिति पैदा कर रहा है ओर औद्योगीकरण का असन्तुलित विकास स्वयं में विघटन उत्पन्न करने वाला है। प्रो॰ केवल मोटवानी ने जनसंख्या को विस्फोट साम्प्रदायिक तनाव, राजनीतिक व क्षेत्रीय तनाव, औद्योगीकरण आदि के संयुक्त प्रभावों को सामाजिक विघटन लाने के लिए उत्तरदायी माना है। इन्होंने तो भारत की आत्मा के बन्दी होने तथा निकट भविष्य में इसके नष्ट होने के खतरे के प्रति सभी को सचेत भी किया है। 

कुछ विद्वानों का कहना है कि भारत में सामाजिक समस्याओं में वृद्धि, परम्परागत तथा आधुनिक मूल्यों में द्वैतता व संघर्ष, समाज के परम्परागत आधारों में परिवर्तन वस्तुतः विघटन न होकर परिवर्तनशील समाज में होने वाले स्वाभाविक परिवर्तन हैं। जैसे-जैसे हमारे समाज ने नवीन मूल्यों को अपनाया है- नवीन मिश्रित अर्थव्यवस्था का विकास हुआ है,प्रजातान्व्रिक प्रणाली को स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् अपनाया गया है तथा भारतीय संविधान द्वारा भारत को धर्मनिरपेक्ष (लौकिक) राज्य घोषित किया गया है, सब को बिना किसी लिंग, जाति, प्रजाति, रंग, सम्प्रदाय के भेद के समान अधिकार दिए गए हैं – वैसे-वैसे कुछ मूलभूत परम्परागत संस्थाओं की प्रकृति में परिवर्तन हुए हैं ये परिवर्तन इन सभी प्रक्रियाओं के स्वाभाविक परिणामी के रूप में हुए हैं, न किं संगठन से विघटन की ओर। यह तो वह कीमत है जो प्रत्येक प्रगतिशील समाज देता है और फिर भला भारतीय समाज इसमें अपवाद कैसे हो सकता है। आज भारतीय समाज के तीनी स्तम्भ-गांव, जाति व्यवस्था तथा संयुक्त परिवार प्रणाली-अपना महत्त्व बनाए हुए हैं। 

कुछ भी हो, यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि आज भारतीय समाज में विघटित समाज के लगभग सभी लक्षण विद्यमान हैं। अगर इन्हें रोकने तथा बनी हुई समस्याओं पर काबू पाने का कोई प्रभावशाली प्रयास नहीं किया गया नो निश्चित रूप से हमें विघटन के परिणामों को भुगतना होगा।

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