भारत में बेरोजगारी के कारण एवं परिणाम

 भारत में बेरोजगारी के कारण एवं परिणाम 

भारत में बेरोजगारी के कारण (Causes of Unemployment in India) – उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत में समस्त वर्गो चाहे शिक्षित हो अथवा अशिक्षित, कृषि अथवा औद्योगिक क्षेत्र, ग्रामीण अथवा नगरीय, में बेरोजगारी की समस्या परिव्याप्त है। जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि के साथ-साथ यह समस्या और भी उग्र होती जा रही है। योजना आयोग के अनुसार भारत में बेकारी की समस्या के लिए प्रमुखतः चार कारक उत्तरदायी रहे हैं – 

(i) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि,

(ii) प्राचीन ग्रामीण उद्योगों का समाप्त हो जाना, 

(ii) गैर कृषि क्षेत्रों का अपर्याप्त विकास, तथा

(iv) देश के विभाजन के कारण जनसंख्या का अधिक मात्रा में विस्थापन। 

भारत में बेरोजगारी के कारण सामान्यतः अग्रलिखित हैं- 

(1) कृषि की अनुन्नत दशा – भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की अधिकांश जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित है परन्तु अन्य देशों के साथ तुलना करने पर स्पष्ट होता है कि हमारे देश की कृषि बहुत अधिक पिछड़ी स्थिति में है। कृषि देश की सम्पूर्ण जनसंख्या को भरपेट भोजन भी प्रदान नहीं कर पाती है। कृषि की यह अनुन्नत स्थिति बेरोजगारी को बढ़ावा देती है। 

(2 ) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि – भारत में बेरोजगारी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण जनसंख्या में तीव्र/गति से वृद्धि होना है देश की जनसंख्या में प्रतिवर्ष काफी व्यक्तियों की वृद्धि हो जाती है। देश में उपलब्ध साधन विद्यमान जनसंख्या को ही रोजगार नहीं दे पाते हैं तो इस प्रतिवर्ष बढ़ने वाली जनसंख्या को रोजगार प्रदान करना तो और भी कठिन कार्य है। 

(3 ) बृहद उद्योगों का अपूर्ण एवं असंगठित विकास – भारत में एक ओर तो ब्रटिश शासनकाल में बड़े उद्योगों के विकास के कारण कुटीर उद्योगों का विनाश हो गया और दूसरी ओर बड़े उद्योगों का भी देश की आवश्यकता के अनुसार विकास नहीं हुआ। अतः लोगों को कृषि पर ही आश्रित रहना पड़ा इससे देश में प्रच्छन्न बेरोजगारी की वृद्धि हुई। 

(4) कुटीर उद्योगों का विनाश – कृषि व्यवसाय की मौसमी प्रकृति एवं वर्षा पर आश्रितता के कारण भारतीय किसान वर्ष में लगभग एक तिहाई समय वेकार रहता है। ब्रिटिश शासनकाल से पहले किसान कुटीर उद्योगों को अपनाकर इस खाली समय का सदुपयोग कर लेता था। उससे, इसकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार होता था। किन्तु ब्रिटिश शासनकाल में बड़े उद्योगों के विकास से इन कुटीर उद्योगों का विनाश हो गया है, उन पर आश्रित लोग बेरोजगारी अथवा अर्द्धबेरोजगारी के शिकार हो गये 

( 5) विदेशों से भारतीयों का आगमन – विगत कुछ वर्षों से कतिपय कारणों से भारत में विदेशों से भारत के मूल निवासियों का बराबर आगमन हो रहा है। इनके आगमन के फलस्वरूप भी बेरोजगारी की समस्या में वृद्धि हुई है। 

(6) दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति -bहमारे देश की शिक्षित वेकारी का सबसे प्रमुख कारण दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति है। इस शिक्षा पद्धति ने देश के नवयुवकों में शारीरिक श्रम के प्रति घृणा के भाव पैदा कर दिए हैं अतः वे शारीरिक श्रम नहीं करना चाहते। सभी शिक्षित युवाओं को दफ्तर का काम प्रदान करने के लिए देश में इतने अवसर नहीं हैं। अतः बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो जाती है। 

(7 ) स्त्रियों द्वारा नौकरी – स्वतंत्रोपरान्त भारत में सभी क्षेत्रों में नौकरी करने वाली स्त्रियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। इसके फलस्वरूप भी पुरुषों की बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। 

(8) यंत्रीकरण में वृद्धि – विकासशील भारत दिनों दिन यंत्रीकरण की दिशा में तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। एक ओर कृषि के क्षेत्र में यंत्रीकरण में वृद्धि हो रही है दूसरी ओर औद्योगिक क्षेत्र में स्वाचलित मशीनें लगाई जा रही हैं। फलस्वरूप मशीनों की सहायता से वही कार्य जो अधिक लोग करते थे, अब कम लोगों से कराया जा सकता है। इससे बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है। 

बेरोजगारी के परिणाम – 

बेरोजगारी व्यक्तिगत और सामाजिक विघटन का सबसे हानिकारक स्वरूप है। यह ऐसी समस्या है जो व्यक्ति और समाज दोनों के जीवन को खोखला बना देती है। इसके कारण समाज में अन्य अनेकानेक समस्याओं का जन्म होता है। बेरोजगारी के प्रमुख दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं – 

1) पारिवारिक विघटन – बेरोजगारी का दूसरा प्रभाव व्यक्ति के परिवार पर पड़ता हैं। बेरोजगारी के कारण जब परिवार के सदस्यों की निम्नतम आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पाती तो उनके जीवन में शान्ति कैसे हो सकती है। बेरोजगारी की स्थिति में बच्चों का पालन पोषण, शिक्षा-दीक्षा एवं व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो पाता उन्हें माता-पिता का अशांत जीवन प्यार नहीं दे पाता. उन पर उचित नियंत्रण नहीं रहता। अतः वे बच्चे अनेकों बुराइयों के शिकार हो जाते हैं। इन सब स्थितियों के फलस्वरूप परिवार के सदस्यों की बीच सम्बन्ध ढीले पड़ जाते हैं तथा पारिवारिक नियंत्रण भंग हो जाता है यही पारिवारिक विघटन की स्थिति है। 

2 ) व्यक्तिगत विघटन – वेकारी का सर्वाधिक दुष्प्रभाव स्वयं व्यक्ति पर पड़ता है। इसके कारण व्यक्ति निर्धनता के साम्राज्य में पहच जाता है जहाँ उसकी और उसके परिवार की वे आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पातीं जो उनके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आलश्यक हैं। फलतः वह अनैतिकता की ओर अग्रसर हो जाता है। वह गैरकानूनी तरीकों से धन प्राप्त करने का प्रयास करता है, अपराध करता है और कभी-कभी तो आत्महत्या तक करने को तैयार हो जाता है। इस प्रकार एक व्यक्ति में वैयक्तिक विघटन के सभी लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। 

3) निम्न स्वास्थ्य स्तर – व्यक्ति का प्रत्येक प्रकार का विकास उसके उत्तम स्वास्थ्य, पर निर्भर होता है और उसका उत्तम स्वास्थ्य उसको प्राप्त होने वाले उत्तम, भोजन, वस्त्र, मकान आदि पर निर्भर करता है। किन्तु बेरोजगारी के कारण व्यक्ति को उत्तम भोजने तो क्या भर पेट भोजन भी नहीं मिल पाता और साथ ही उसे अनेक चिन्ताएं घेरे रहती हैं तो उसके अच्छे स्वास्थ्य की आशा कैसे की जा सकती है। 

4) सामाजिक प्रगति में बाधा – समाज की प्रगति समाज के किसी एक अथवा कुछ वर्गों के द्वारा संभव नहीं है जब तक कि समाज के सभी वर्गों की इसमें भागीदारी न हो, लेकिन जब समाज का एक विशाल वर्ग अर्थात् बेरोजगार लोग सामाजिक प्रगति में हाथ नहीं बंटा पाते तो सामाजिक प्रगति में बाधा पड़ती है। 

5) नैतिक पतन – बेरोजगारी की स्थिति में जब व्यक्ति स्वयं तथा परिवार के अन्य सदस्यों की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाता है और जब उसकी यह स्थिति असहनीय हो जाती है तब वह समस्त नैतिकता को अलग रखकर जैसे भी हो धन कमाने का प्रयास करता है। इस प्रकार बेरोजगारी की स्थिति व्यक्ति को अनैतिक कार्य करने को बाध्य करती है। 

6) मानसिक रोग – बेरोजगारी की स्थिति में जब व्यक्ति देखता है कि वह अपनी एवं परिवार की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन नहीं जुटा पा रहा है, उसके बच्चों को पेट भरने को भोजन और तन ढकने को वस्त्र प्राप्त नहीं हो रहे हैं, संतान स्कूल के स्थान पर सड़कों पर घूम रही है तो उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और वह मानसिक रोगों का शिकार हो जाता है। 

7) विद्यार्थियों में असंतोष – बेरोजगारी की समस्या अप्रत्यक्ष रूप से छात्र असंतोष को भी जन्म देती है। देश की वर्तमान शिक्षा पद्धति रोजगारपरक न होने के कारण बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि करती है। इससे छात्रों में शिक्षा पद्धति के प्रति असंतोष की भावना जागृत हो जाती है, आज शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश के नियमों, पाठ्यक्रम, उपस्थिति, नकल, परीक्षा, बोनस अंक, छात्र संघ के चुनाव, आरक्षण आदि को लेकर आए दिन हड़तालों एवं हिंसात्मक कार्यवाहियों का होना इसी असंतोष की अभिव्यक्ति है। 

8) अपराधों में वृद्धि – बेरोजगारी की स्थिति में एक तो व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। दूसरे उसे किसी भी प्रकार से धन कमाने की चिन्ता रहती है। ये दोनों स्थितियां अपराधों को बढ़ावा देती हैं। मानसिक असंतुलन की स्थिति में व्यक्ति उचित- अनुचित का विचार नहीं कर पाता और इस स्थिति में उसकी धन प्राप्त करने की इच्छा उसे चोरी, डकैती, जालसाजी, भिक्षावृत्ति आदि के लिए प्रेरित करती है। 

9 ) मानव शक्ति का व्यर्थ जाना – बेरोजगारी के परिणामस्वरूप देश की सम्पूर्ण मानवीय शक्ति का सदुपयोग नहीं हो पाता है फलतः पर्याप्त मानव शक्ति व्यर्थ चली जाती है। यदि देश इस शक्ति का सदुपयोग कर सके तो देश की समृद्धि में अधिक वृद्धि हो सकती है। 

10) राजनीतिक अशान्ति – बेरोजगारी का प्रभाव केवल व्यक्ति पर ही नहीं अपितु समाज एवं सरकार पर भी पड़ता है। सामाजिक समस्याओं का समाधान करना सरकार का उत्तरदायित्व है लेकिन बेरोजगारी एक ऐसी जटिल समस्या है जो अन्य अनेकों सामाजिक समस्याओं को जन्म देती है। इस कारण सरकार का उत्तरदायित्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता हैं। जब राज्य अपने उत्तरदायित्वों को पूरा नहीं कर पाता तो समाज के उस वर्ग में, जो कार्य करने के योग्य और इच्छुक हैं। (बेरोजगार वर्ग), राज्य के प्रति विद्रोह की भावना जागृत हो जाती है। अतः ऐसे लोग राज्य विरोधी कार्य करने लगते हैं जिससे राजनीतिक अशान्ति उत्पन्न होती है। 

11) बौद्धिक वर्ग का देश से पलायन – वेरोजगारी की समस्या के परिणामस्वरूप आज भारत के बौद्धिक वर्ग में एक नवीन प्रवृत्ति दिखाई दे रही है-देश के विद्वान लोग विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसे (Brain Drain ) के नाम से संबोधित किया जाता है। यह प्रवृत्ति हमारे समाज के विकास के लिए अत्यधिक हानिकारक है। इससे सामाजिक विकास के कार्यक्रमों में देश उन विद्वानों एवं वैज्ञानिकों के योगदान से वंचित रह जाना है और देश के विकास की गति प्रभावित होती है। 

12 ) सामाजिक समस्याओं में वृद्धि – वेरोजगारी के फलस्वरूप देश में चोरी, डकैती, अपराध, बाल-अपराध, आवारागर्दी, निर्धनता, ऋणग्रस्तता, अष्टाचार, वेश्यावृत्ति, नशाखोरी, जुआ, विवाह-विच्छेद, गृहत्याग, आत्महत्या आदि-सामाजिक समस्याओं में तीव्र गति से वृद्धि हो जाती हैं जिससे समाज की शांति व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो जाता है।

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