बेरोजगारी की परिभाषा इसके प्रकार

 बेरोजगारी की परिभाषा इसके प्रकार

बेरोजगारी शब्द से तात्पर्य व्यक्ति की उस स्थिति से हैं जिसमे व्यक्ति को कार्य करने की इच्छा एवं सामर्थ्य रखते हुए भी उचित वेतन दर पर कार्य नहीं मिल पाता है। दूसरे शब्दों में इसका सम्बन्ध केवल उन्हीं व्यक्तियों से है जो कार्य करने की इच्छा रखते हैं तथा जो किसी कार्य को करने के लिए शारीरिक एवं मानसिक शक्ति भी रखते हैं। इसके विपरीत यदि समाज में कुछ व्यक्ति कार्य करने के. योग्य न हों अथवा योग्य होते हुए भी काम करने के इच्छुक न हों तब ऐसे व्यक्तियों को बेरोज़गार नहीं कहा जायेगा क्योंकि इस स्थिति के लिए समाज दोषी नहीं वरन् वे स्वयं दोषी है। इसी आधार पर फ्लोरेन्स (Florence) ने कहा है कि “बेरोजगारी का तात्पर्य उन व्यक्तियों की निष्क्रमणता से है जो कार्य करने को योग्य एवं इच्छुक हों।” 

बेरोजगारी की परिभाषा करते हुए कार्ल प्रिब्राम ने लिखा है कि, “बेरोजगारी श्रम बाजार की वह स्थिति है जिसमें श्रम शक्ति की पूर्ति कार्य करने के स्थानों की संख्या से अधिक होती है।” अर्थात् जब श्रम बाजार में श्रमिकों की माँग की अपेक्षा पूर्ति अधिक हो जाती हैं। गिलिन एवं अन्य (Gillin and others) ने इसकी अधिक विस्तृत परिभाषा प्रस्तुत की है। उनके शब्दों में, बेरोजगारी वह स्थिति है- जिसमें एक व्यक्ति जो कि काम करने के योग्य एवं इच्छुक है तथा जो सामान्यतः अपनी आय पर अपने तथा अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्भर, लाभपूर्ण रोजगार पाने में असमर्थ रहता है।’ 

इन समस्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि बेरोजगारी समाज की वह स्थिति है जिसमें व्यक्तियों को कार्य करने की इच्छा एवं योग्यता रखते हुए तथा कार्य पाने के लिए प्रयत्नशील रहते हुए भी उचित वेतन दरों पर कार्य नहीं मिल पाता जिससे वे अपने और अपने परिवार बालों का उचित जीवन स्तर बनाये रखने में सफल हो सकें। डॉ० राम आहूजा ने समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से बेरोजगारी की स्थिति को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि, ‘यह सामान्य कार्य बल (Working force) के एक सदस्य (यानी 15-59 आयु वर्ग का) को सामान्य कार्यकाल (Working time) में सामान्य वेतन पर और सामान्य परिस्थितियों में जबरदस्ती उसकी इच्छा के विरुद्ध वैतनिक कार्य से अलग रखना है।” इस प्रकार बेरोजगारी की अवधारणा में तीन तत्वों का समावेश होता है – 

(i) व्यक्ति में कार्य करने की क्षमता का होना, 

(ii) व्यक्ति में कार्य करने की इच्छा होना, तथा

(ii) कार्य खोजने के लिए प्रयास करना। 

इस प्रकार शारीरिक तथा मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति, एक धनी व्यक्ति जो कार्य करने को अपमानजनक समझकर कार्य नहीं करता तथा एक स्वस्थ एवं सक्षम भिखारी, जो कार्य खोजने का प्रयास नहीं करता बेरोजगार नहीं कहा जा सकता। 

बेरोजगारी के प्रकार – 

साधारणतया बेरोजगारी को निम्नलिखित दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है 

(अ) प्रातीतिक बेरोजगारी – यह वेरोजगारी का वह रूप है जो स्वयं व्यक्ति के शारीरिक अथवा मानसिक दोषों के कारण उत्पन्न होती है। 

(ब) वैषयिक बेरोजगारी – थह बेरोजगारी का वह प्रकार है जो उन कारणों से उत्पन्न होती है जो स्वयं मनुष्य के नियंत्रण के बाहर है। वैषयिक बेरोजगारी के निम्नलिखित अनेक प्रकार देखे जा सकते हैं – 

(1) मौसमी बेरोजगारी – बेरोजगारी का वह रूप जो किन्हीं उद्योगों की मौसमी प्रकृति के कारण उत्पन्न होता है उसे मौसमी बेरोजगारी कहते हैं जैसे बर्फ, चीनी आदि के कारखाने वर्ष में एक निश्चित मौसम (समय) के बाद बन्द हो जाते हैं, अतः उनमें काम करने वाले श्रमिक बेरोजगार हो जाते हैं । 

(2 ) चक्रवत् बेरोजगारी — यह बेरोजगारी व्यापार चक्र अर्थात् भावों में उतार-चढ़ाव तथा व्यापार में लाभ-हानि के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होती है क्योंकि व्यापार में उतार एवं हानि की स्थिति आ जाने के कारण अनेक व्यक्ति काम से अलग कर दिए जाते हैं। 

(3) संरचनात्मक बेरोजगारी – इस प्रकार की बेरोजगारी किसी समाज की आर्थिक संरचना के दोषों के कारण उत्पन्न होती है। ऐसा उस स्थिति में होता है जब देश में पूंजी के साधन सीमित होते हैं और रोजगार की इच्छा वाले लोगों की संख्या अधिक होती है तो कुछ लोग रोजगार के विना ही रह जाते हैं। 

(4 ) प्राविधिक बेरोजगारी – वर्तमान प्रौद्योगिक समाज में उत्पादन के साधनों में सुधार, यंत्रीकरण में वृद्धि एव स्वचालित मशीनों के विकास के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाने वाला कार्य मशीनों की सहायता से बहुत कम व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है। फलतः अनेक श्रेमिक वेकार हो जाते हैं। इसे प्राविधिक बेरोजगारी कहते हैं। 

(5) अपूर्ण रोजगारी – अपूर्ण रोजगार का तात्पर्य व्यक्ति कि उस स्थिति से है जब उसे पूरे समय कार्य नहीं मिल पाता हो अथवा जो कार्य वह कर रहा है उसमें वह अपनी क्षमताओं को पूर्ण उपयोग नहीं कर पाता हो। उसे अपूर्ण अथवा अल्प रोजगार कहते हैं। 

( 6) दृश्य बेरोजगार – यह व्यक्ति की वह स्थिति है जब वह आंशिक अथवा अपूर्ण रोजगार प्राप्त करने में भी असमर्थ रहता है। इसे दृश्य अथवा प्रकट वेरोजगारी कहते हैं। 

(7) प्रच्छन्न बेरोजगारी – यह बेरोजगारी का वह रूप है। जिसमें बेरोजगारी प्रत्यक्ष अथवा प्रकट रूप में दिखाई नहीं देती अपितु अप्रकट अथवा छिपी हुई रहती है। भारत में कृषि के क्षेत्र में इस प्रकार की बेरोजगारी बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है। कुछ विद्वानों का विचार है कि भारत के कृषि क्षेत्र में लगी सम्पूर्ण श्रम शक्ति का लगभग छठा भाग प्रच्छन्न बेरोजगारी के अन्तर्गत आता है। यहाँ कृषि में आवश्यकता से अधिक लोग लगे रहते हैं अर्थात् यदि इनमें से कुछ व्यक्तियों को कृषि कार्य से पृथक् कर दिया जाय तो भी उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। कृषि क्षेत्र में ऐसे अतिरिक्त कार्यरत लोग प्रच्छन्न बेरोजगारी के अन्तर्गत आते हैं। 

(8) साधारण बेरोजगारी (Normal Unemployment) – यह बेरोजगारी का वह रूप है। जो प्रत्येक समाज में पाया जाता है अर्थात् थोड़ी बहुत मात्रा में प्रत्येक श्रम बाजार में श्रमिक बेकार रहते हैं। इस स्थिति को साधारण बेरोजगारी कॅहते हैं।

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