बेबीलोन की धार्मिक मान्यताएँ

बेबीलोन की धार्मिक मान्यताएँ 

धार्मिक अवस्था

पुरोहितवाद-

बेबीलोनिया की सभ्यता पुरोहितवाद से सर्वाधिक प्रभावित थी। पुरोहितों का प्रभाव राजा पर भी था। कोई भी राजकुमार तब तक राजा नहीं समझा जाता था जब तक कि वह मर्द की प्रतिमा के पीछे-पीछे नगर में प्रमण नहीं करता था। इन उत्सवों में राजा पुरोहित की पोशाक में होता था। स्वयं हम्मूराबी ने अपने कानूनों को देवता से प्राप्त किया था। युद्ध में विजय मिलने पर देव-पूजन और मन्दिर निर्माण देवताओं के नाम पर कर वसूलना तथा मन्दिरों को पर्याप्त भूमि प्रदान करना आदि बातें राज्य और धर्म के संघात्मक रूप को व्यक्त करती है। पुरोहित अनुदान में अन्न, भूमि, स्वर्ण चाँदी आदि बहुमूल्य वस्तुएं पर्याप्त रूप में पाते थे। वे कालान्तर में प्रभूत धन सम्पत्ति के मालिक हो गये मन्दिरों के पास मीलों को भूमि, अपार धन और जनसम्पत्ति आदि होने से पुरोहित भी कालान्तर में राजा के समस्त अधिकारों से युक्त थे। इससे ज्ञात होता है कि बेबिलोन की पुरोहिती प्रथा वैदिक और परवर्ती भारतीय पुरोहिती प्रथा से कम न थी। वे मुकदमों का फैसला भी करते थे। 

देवमण्डल –

बेबीलोनिया के देवों की संख्या अगणित थी। प्रत्येक नगर का एक प्रमुख देवता था। ये देवगण मनुष्य से परे नहीं थे। बहुत से तो उनके अनुसार इस धरती पर ही मन्दिरों में रहते थे। उन्हें भी बुभुक्षा सताती है सदाचारिणी स्त्री को वे पूत्र प्रदान करते थे। बेबीलोन के देवताओं में मरदुक का नाम अग्रणी है। सुमेरियन साम्राज्य के अन्तर्गत यह एक छोटा देवता था और बेबीलोन नगर का प्रधान देव था। किन्तु जब वेबीलोन साम्राज्य की राजधानी बना तो सम्राट की तरह मदुरक भी बेबीलोन साम्राज्य के देवों का सम्राट हो गया। इश्तर पूर्व की भाँति अब भी सर्वोच्च देवी रही। तम्मुज उसका छोटा भाई था जो उसके प्रेमी के रूप में भी चित्रित हैं ऋग्वेद में भी यम-यमी का भाई बहिन के रूप में वर्णन है किन्तु यमी यम को पति मानती है। मिस्र में तो राज कुल में भाई-बहिन का विवाह अनिवार्य प्रथा थी। तम्मुज का जिसकी सुमेरिया के देवताओं में कोई स्थान नहीं रह गया था, अब तीसरा स्थान हो गया। शरद में उसकी मृत्यु हो जाती थी और बसन्त में पुनर्जन्म। इससे इसका प्राकृतिक स्वरूप ज्ञात होता है। इसके अतिरिक्त लारसा का प्रधान देव शमश, निप्पर का एनलिल, उरूक का इश्तर और उर के नानार थे। आकाश से सम्बन्धित देवताओं में अनु (स्थिर आकाश), शमश (सूर्य), नानार (चन्द्र) एवं बैल या बाल (पृथ्वी देवी) की स्तुति की जाती थी तथा प्रायः और सायं दूध और जल आदि चढ़ाया जाता था। भारतीय इतिहास का कोई भी युग ऐसा नहीं है जिसमें उक्त देवों या इस प्रकार के देवों की पूजा न होती हो। ज्योतिष देवों की पूजा वैदिक है। किन्तु बेबीलोन में देवी की पूजा भौतिक सुखों के लिए ही की जाती थी पारलौकिक सुखों के लिए नहीं। देवताओं को प्रायः कन तक ही याद रखा जाता था। किन्तु मरदुक देव मृतकों को भी जीवित करने वाला समझा जाता था। 

धार्मिक कृत्य – 

जीवन में सुख शान्ति की प्राप्ति के लिए मन्दिरों में देवों के सम्मान में उपहार भी चढ़ाये जाते थे। लोगों का विश्वास था कि बहुत से दुखों के कारण भूत और दानव हैं जो इधर-उधर छिपे रहते हैं। उन्हें भगाने के लिए शरीर पर फरात और दजला नदियों का जल छिड़का जाता था और मन पढ़ा जाता था। अभिचार कृत्य से भूत का भी पीछा किया जा सकता था और उसे पशुओं, पक्षियों सूकर आदि पर भेजा जा सकता था।

इस प्रकार इन्द्रजाल से सम्बन्धित बहुत से लेख बेबिलोन में प्राप्त हुए हैं। कुत्ते की चाल को देखकर राजा का भविष्य घोषित कर दिया जाता था।कर्मकाण्ड पुरोहितों के निर्देशन में कराये जाते थे। उनका विश्वास था कि विधिवत कर्म कराने से सभी कार्य अपने आप हो जायेंगे। देवों के प्रति कर्तव्य निभाने के लिए मन्दिरों के पास यज्ञ किये जाते थे जहाँ पुरोहित विधिवत सभी कार्य कराता था और मन्त्री का उच्चारण करता था। वे देवों को खाद्य और पेय दोनों प्रकार के पदार्थ द्रव्य रूप में प्रदान करते थे। भेड़ के बच्चे के बलिदान की प्रथा थी। 

मरणोत्तर जीवन –

मृतक का शव समाधिस्त किया जाता था या जला दिया जाता था। मृतक के शव को श्मशान के लोग भली-भाँति नहला धुला, वेश-भूषा से सजा-संवार कर ठीक से गाड़ते थे जिससे मृतक लोगों को सता न सकें। उनका विश्वास था कि समाधिस्थ न करने पर प्रेतात्मायें भोजन आदि के लिए घूम सकती थीं और पूरे नगर को कष्ट पहुँचा सकती थीं। बेबिलोन निवासी की केवल यही भावना देवों और पुरोहितों की पूजा के लिए पर्याप्त थी। किन्तु उसका परलोक में वि वास नहीं था। वह पृथ्वी के आनन्दों को ही स्वर्ग समझता था। उसका विश्वास था कि मृतथा हाथ-पवि बंधा हुआ गहन अन्धकार में पड़ा रहता है और वहीं उसकी दुखी आत्माएँ अपने कुल वालों से श्राद्ध पाने की प्रतीक्षा करती थी। एक भयानक देवी वहाँ का शासक है जो सब प्रेतात्माओं को बाँध रखी है।

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