प्राचीन मिस्त्र की सभ्यता में नील नदी के योगदान

प्राचीन मिस्त्र की सभ्यता में नील नदी के योगदान 

 मिस्र नील-नदी का वरदान-मिस्री सभ्यता का मूलाधार नील नदी है। सहारा के विस्तृत मैदान में उसको उर्वर बनाने का श्रेय नील नदी को ही है। वह उसे सदा हरा-भरा रखती है। नील नदी यूथोपिया के अबीसीनिया झील से निकल कर, सूडान की पर्वत मालाओं में कल-कल ध्वनि करती हुई टेढ़े-मेढ़े मार्ग को चीरती हुई भूमध्य सागर में गिरती है। नील पाटी में प्रथम प्रपात (झरने) से ऊपर का भाग ऊपरी मिस और निचली घाटी जो समुद्र को छूती है निचना मिस कहा जाता है। नील नदी की भौगोलिक स्थिति के करण मिल अन्य देशों से पृथक रहा। नीलपाटी एक ट्यूब के समान थी जो बाहरी प्रभाव से वंचित थी।”Nile valley ws a tube, loosely sealed against important outside contact” इसके पूर्व और पश्चिम में दुर्गम मरूस्थल है जिसमें छोटे छोटे काफिले ही आ जा सकते थे। किसी सैनिक अभियान के लिए ये दुर्गम थे। उत्तर की ओर सिनाई मरूस्थल एशिया के सम्बन्ध विच्छेद करता था जबकि लीबियन तट अवश्य ही चरवाहों और घुमक्कड़ लोगों के लिये खुला था। पूर्व और पश्चिम प्रदेशों में पहुँचते पहुँचते एक काफिले को पाँच से आठ दिन तक लग जाते थे। प्रागैतिहासिक काल में नार्व-यातायात के अनुभव न होने से भूमध्य सागर की यात्रा कठिन थी। मिस्त्रियों से सबसे पहले समुद्र के मध्य में रहने वाले क्रीटवासियों ने सम्पर्क स्थापित किया। दक्षिण मिस्र में सुगमता से गमनागमन नही हो सकता था। प्रथम प्रपात (cataract) को आसानी से पार किया जा सकता था किन्तु उसके दक्षिण का प्रदेश मरू-भूमि की पट्टियों के कारण सुरक्षित और अनुकूल नहीं था। प्रथम और तृतीय प्रपात तक कोई सभ्यता नहीं पनपी। द्वितीय और तृतीय प्रपात तथा न्यूवियन मरूस्थल उत्तर और दक्षिण के गमनागमन में बाधक थे। लीबिया और सिन्ाई आदि प्रदेशों से दुश्मनों के आने की सदा आशंका रहती थी। किन्तु आरम्भ में मिल बाढ्माक्रमणों से सदा सुरक्षित रहा। 

कृषि के लिए उपयोगी -नील मिस के कृषकों के लिए सर्वाधिक वरदान है। प्रारम्भ में मिस्र के थोड़े से ही हिस्से में खेती की जाती थी। उस समय इसकी पाटी अधिकांशतः दलदलों से भरी थी जिसमें जहाँ-तहाँ ही खेती हो पाती थी। इसके साथ ही नदी के भयानक और तेज धार के कारण भी कृषि की कम सम्भावना रही । यद्यपि कि नदी के मुहाने की स्थिति ठीक थी जहां नदी कई स्रोतों में बँटकर धीरे-धीरे बहती थी जिससे कृषि कर्म वहाँ सम्मव वा। प्रति चर्ष बाढ़ आती थी और यदि पानी को रोकने का इन्तजाम न किया जाता तो जमीन की उपजाऊ शक्ति कुछ ही समय में विनष्ट हो जाती। मिस के किसान ने बाद के महत्व को परख लिया था। बाढ़ के समय नदी के किनारे के गड्ढे भर जाते थे। इनमें लट्ठों में बाल्टियां बांधकर मील का जल निकालने का यह काम उतना ही प्राचीन है जितना कि पिरामिड। 

नदी और उससे सम्बन्धित नहरों से जल निकालने के लिए मिसियों ने एक चीं का निर्माण किया जिससे बाल्टियों के सहारे गहरे कुयें से जल निकाला जाता था। अभी भी बसन्त के दिनों में चरमराती उनकी संगीतमय ध्वनि कर्ण कुहर में प्रवेश कर मंत्र-मुग्ध करती है। ये कृषक दिन भर पानी निकालते और दूर-दूर के खेतों को सींचते थे यदि वे ऐसा न करते तो वर्ष भर में एक ही फसल होती और मिस एक गरीब देश होता। किन्तु यहाँ साल में तीन-तीन फसलें काटी जाती थी। 

वाणिज्य और व्यापार के लिए उपयोगी – नील से मिस्र का वाणिज्य और व्यापार विकसित हुआ। देश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पत्थर, लकड़ी आदि सामग्रियां लाई जाती थीं। बाहरी व्यापार यहां का उतना विकसित नहीं था जितना मेसोपोटामिया का किन्त ऐसा माना जाता है कि कुछ वस्तुओं का आयात-निर्यात नील द्वारा किया जाता था। कालान्तर में इसका विशेष विकास हुआ। सिकन्दरिया की स्थापना के बाद तो यह तत्कालीन विश्व का महान् व्यापारिक केन्द्र हो गया। यहाँ का प्रकाश-स्तम्भ विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता था। विलडूरेन्ट के शब्दों में नील के मुहाने पर राजनीतिज्ञ युवक सिकन्दर ने विश्वविख्यात सिकन्दरिया नामक उस महानगर की स्थापना की जो कालान्तर में मिल, फिलिस्तीन और यूनान की संस्कृति का उत्तराधिकारी हुआ है। इसी के समीप के बन्दरगाह में सीजर ने पाम्पी के सिर की भेंट को स्वीकार किया था। यहाँ तत्कालीन विश्व के प्रमुख व्यापारी आते थे। यह आयात-निर्यात का सुन्दर केन्द्र था। नीत नदी समृद्र तट से पीछे 500 मील तक नाव-व्यापार के उपयुक्त है। 

कला विषयक देन -नील नदी का मिस्त्री कला पर भी कम प्रभाव नहीं है। उसके पिरामिड और मंदिर पत्थरों की कृतियाँ हैं। स्मरणीय है कि मिस्र में जहाँ पिरामिड पत्थर उपलब्ध नहीं होते। ये पत्थर दूर स्थानों से नील के माध्यम से नावों द्वारा लाये चित्रकला में नाव का चित्रण भी किया गया है जो नील का द्योतक है। महारानी हातशेपसुत के समय के एक चित्र में नील की यात्रा का संस्मरण मिलता है। हवा के कारण यात्रा अनुकूल दृष्टिगत होती हैं। नावों का इतना महत्व बढ़ा के ये हाइरोग्लिफिक लिपि के चित्रों में प्रयुक्त होने लगी। कई समाधिचित्रों में सूर्य के नाव का चित्रण हैं। सेटेख समाधि के चित्र में सूर्य की नाव प्रदर्शित है। अन्यत्र भी जलयान के चित्र मिलते हैं। लक्जोर के मन्दिर में सूर्य देवता की यात्रा हेतु एक नाव रखी रहती थी। 

धार्मिक देन -नील मित्र की धार्मिक भावनाओं के विकास में सहायक सिद्ध हुई। ओसिरिस देव की पूजा का श्रेय नील को ही दिया जाता है। यह देव नील का जीवनदाता तथा हरी वनस्पतियों की आत्मा समझा जाता था। उसका पुर्नजन्म नील के शरदकालीन बाढ़ का और मृत्यु बसन्त का प्रतीक माना जाता था। इस विचारधारा से मिस्त्र में शाश्वत जीवन की धारणा का विकास हुआ। वर्षा के उपरान्त नील का पानी घटना शुरू हो जाता था। यदि पानी अधिक नीचे चला जाता था तो सूखा पड़ने का भय हो जाता था। वसन्त काल में नील का जल घट कर उसके पेट में चला जाता था। किन्तु वर्षा काल में नील में बाढ़ आ जाने से आस-पास के खेत उपजाऊ मिट्टी से भर जाते और मैदान फसलों से हरा-भरा हो उठता था। इस क्रमिक घटना से मिल में शाश्वत जीवन के प्रति विश्वास दृढ़ हुआ।

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