पारिवारिक विघटन के कारण

पारिवारिक विघटन के कारण

पारिवारिक विघटन का तात्पर्य है आपसी मतैक्य तथा निष्ठा का भंग होना। सामान्यतः पूर्व के सम्बन्धों का टूट जाना या पारिवारिक चेतना का खात्मा होना पारिवारिक विघटन कहलाता है। पारिवारिक विघटन उस स्थिति में भी होता है जब तलाक के कारण परिवार छिन्न-भिन्न हो गया हो अथवा परिवार के स्वामी के कारण समाप्त हो चुका हो। यद्यपि परिवार के शेष सदस्य फिर भी एक ‘गृह’ बनाये रखते हैं, परन्तु इसे विघटित परिवार या घर ही कहते हैं। मांवरर ने पारिवारिक विघटन को स्पष्ट करते हुए कहा है, “पारिवारिक विघटन का अभिप्राय पारिवारिक सम्बन्धों में बाधा डालना है। यह संघर्षों के क्रम का बह चरम रूप होता है, जिसने पारिवारिक एकता के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया है। यह संघर्ष किसी भी तरह का हो सकता है। संघर्ष के इसी क्रम को उपयुक्त रूप में पारिवारिक विघटन कह सकते हैं। 

पारिवारिक विघटन के कारण –

पारिवारिक विघटन की प्रक्रिया भिन्न-भिन्न समाज में अलग-अलग प्रकार की होती हैं। भारतीय परिवार यद्यपि परिवर्तन के मध्य अवश्य हैं, किन्तु पारिवारिक विधटन की प्रक्रिया उतनी तीव्र और घातक नहीं हैं, जितनी पाश्चात्य समाजों में। भारत में जो भी थोड़ा बहुत पारिवारिक परिवर्तन दिखायी देता है, उसका मूल कारण विदेशी संस्कृति का प्रभाव ही है। यहाँ पर विभिन्न कारणों/कारकों के संयुक्त प्रभाव के फलस्वरूप पारिवारिक विघटन हो रहा है। भारत में पारिवारिक विघटन के लिए निम्नलिखित कारण विशेष रूप से उत्तरदायी हैं। 

1. पाश्चात्य संस्कृति और शिक्षा – पश्चिम की उदारवादी विचारधारा ने भारत में स्त्री-पुरुष की समानता की धारणा को विकसित तथा स्वतन्त्र, स्वाभाविक एवं वैयक्तिक प्रेम की धारणा को भी प्रोत्साहित किया। इसके अन्तर्गत यौन सन्तुष्टि को एक स्वभाविक या सहज आवश्यकता बताया गया तथा विवाह को स्वाभाविक प्रेम पर आधारित एक समझौता माना गया। परिणाम यह हुआ कि समाज में प्रेम विवाह तथा ‘सिविल मैरिज की धारणा विकसित हुई। इन वैचारिक परिवर्तनों का स्त्री-पुरुषों के परम्परागत सम्बन्धों पर गहरा प्रभाव पड़ा है, जिससे परिवार विघटित हुए हैं। रोमसि पर आधारित विवाहों में भोग-बिलास तथा विषय-सुख की भावना की प्रधानता होने से विवाह का आधार मजबूत नहीं होता। विवाह की सफलता तथा पारिवारिक जीवन की सुख शान्ति हेतु पारिवारिक सहयोग, त्याग, विश्वास, मैत्री एवं स्नेह भाव अत्यावश्यक है। विवाह को रोमान्सवादी आदर्श जो भोग-विलास तथा विषयसुख की कामना पर अपने आपको आधारित करता है, परिवार को विघटित करने के परवश होता है। 

2. धार्मिक प्रभाव में ह्वास – भारत में ईश्वर तथा धर्म के प्रभाव के घटने तथा नास्तिकता एवं धर्मनिरपेक्षता बढ़ने से भी परिवार का नियन्त्रण शिथिल हुआ है। समकालीन समाज में भौतिकता और वैज्ञानिकता में धर्म के प्रभाव को कम कर दिया है। पहले धर्म का सामाजिक नियन्त्रण के एक साधन के रूप में इतना महत्व था कि व्यक्ति धर्मच्युत होने का विचार नहीं लाता था। 

3. आर्थिक कारण – भारत में हाए औद्योगीकरण के कारण यहाँ स्वियों पुरुषों की व्यावसायिक तथा भौगोलिक गतिशीलता में काफी वृद्धि हुई है। परम्परागत उद्योग लगभग नष्टप्राय हैं। सापेक्षिक दृष्टि से वियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता में पर्याप्त वृद्धि हुई है। इसके अतिरिक्त वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए एक बड़े परिवार के सभी सदस्यों का एक ही स्थान पर संयुक्त रूप से निवास करते रहना भी सम्भव नहीं रहा है। स्त्रियों का बाहरी लोगों के साथ सम्पर्क बढ़ा है। अतः बहुत सी स्त्रियाँ अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभा पाती हैं। फलतः उनके पति, सास-ससुर असन्तुष्ट रहते हैं। यह स्थिति आगे चलकर पहले पारिवारिक तनाव, फिर विघटन में परिवर्तित हो जाती है। 

4. संयुक्त परिवार का ह्वस – वर्तमान समय में परिवार उत्पादन के केन्द्र के स्थान पर उपभोग का केन्द्र रह गया है। आज परिवार के अनेक कार्य विशेषीकृत् समितियों करने लगी हैं। व्यक्ति यह अनुभव करने लगा है कि संयुक्त परिवार से पृथक होकर भी वह अपने जीवन में आगे बढ़ सकता है, अपनी उन्नति एवं प्रगति अपेक्षाकृत अधिक अच्छे ढंग से कर सकता है। स्पष्ट है कि परिवार के परम्परागत कार्यों की घटना भी पारिवारिक विघटन का एक कारण है। 

5. प्रतिकूल परिस्थिति – नौकरी छूट जाना बेरोजगारी, व्यापार में घाटा, आर्थिक दशा का बिगड़ जाना, लम्बी बीमारी, आदि व्यक्ति की मानसिक शक्ति भंग करती है। इन परिस्थितियों में व्यक्ति अपने परिवार का भरण-पोषण ठीक ढंग से नहीं कर पाता। वह आर्थिक समस्याओं में इतना उलझा हुआ होता है कि अपने परिवार के प्रति पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाता है। इस दिशा में परिवार के सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध बिगड़ते हैं, जिससे पारिवारिक विघटन होता है। 

6. नगरीकरण – पाश्चात्य वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी औद्योगीकरण तथा संचार और यातायात साधनों के विकास ने भारत में नगरीकरण प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया है। देश के करोड़ों ग्रामीण रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की खोज में, नगरों में रहने लगे हैं। नगरी में उनके परिवार नाभिक या एकाकी होते हैं। नगरवासी बहुधा एकान्तप्रिय होते हैं। नगरों में व्यक्तिवादी भावना की प्रधानता होती है आधुनिकता की ओर झुकाव होता है। यहाँ पर माता-पिता एवं युवाओं के आदर्शों, विचारों, सामाजिक मूल्यों और जीवन शैली सम्बन्धी भिन्नता के कारण तनाव पाया जाता है। स्पष्ट है कि नंगरीय परिस्थिति संयुक्त परिवार में परिवर्तन और एकाकी परिवार की रचना को प्रेरणा देती है। 

7. सामाजिक मूल्यों में मत विभिन्नता – बच्चीं और माता-पिता के आदर्शों मूल्यों एवं विचारों में मतैक्य नहीं हो पा रहा है, जबकि पारिवारिक एकता हेतु मतैक्य का होना आवश्यक है। मतैक्य के अभाव में परिवार में तनाव पैदा होता है। बच्चे नवीन मूल्यों एवं विचारों को प्राथमिकता देते है तो माता-पिता परम्परागत मूल्यों को फलतः बच्चे परिवार से दूर भागते हैं। कभी-कभी मूल्यों एवं विचारों की भिन्नता के कारण पति-पत्नी में भी तनाव हो। जाता है। इस तनाव का अन्त पारिवारिक विघटन के रूप में होता है। 

8. वैधानिक अधिनियम – समय-समय पर सरकार द्वारा पारित कानूनों के कारण भी पारिवारिक विघटन को बल मिला है। वैधानिक दृष्टि से विवाह को सामाजिक समझौता’ के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है। अब अन्य कारणों के अतिरिक्त पति-पत्नी आपसी सहमति के आधार पर भी विवाह विच्छेद कर सकते हैं। आज व्यक्ति परिवार को सामाजिक जीवन की दृष्टि से उतनी महत्त्वपूर्ण इकाई नहीं मानते, जितनी कि पहले मानते थे।

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