जाति की परिभाषा और विशेषता

जाति की परिभाषा और विशेषता

जाति की परिभाषा – “जाति” अंग्रेजी भाषा के कास्ट का हिन्दी अनुवाद हैं। अंग्रेजी के Caste शब्द की उत्पत्ति पुर्तगाली भाषा के शब्द Caste (कास्ट) से हुई है, जिसका अर्थ प्रजाति, नस्ल, या जन्म से है। इस अर्थ के अनुसार, जाति व्यवस्था प्रजाति अथवा जन्म पर आधारित एक व्यवस्था है। जाति व्यवस्था जन्म से ही व्यक्ति को एक विशेष सामाजिक स्थिति प्रदान करती है जिसमें आजीवन कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता। जाति शब्द की उत्पत्ति का पता 1665 ई. में ग्रेसिया डी ओरेटा ने लगाया था। विद्वानों ने जाति की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं – jaati

(1) मजूमदार एक मदान के अनुसार, “जाति एक बन्द वर्ग है।” 

(2) कूले के अनुसार, “जब एक वर्ग पूर्णतः वंशानुक्रमण पर आधारित होता है तो उसे हम। जाति कहते हैं । 

(3) केतकर के अनुसार, “जाति एक सामाजिक समूह है जिसकी दो प्रमुख विशेषताएँ हैं – 

(i) सदस्यता उन्हीं व्यक्तियों तक सीमित रहती है जो सदस्यों से उत्पन्न होते हैं और इस प्रकार उत्पन्न सभी व्यक्ति इसमें शामिल होते हैं।

(ii) समस्त सदस्यों को एक कठोर सामाजिक नियम द्वारा जाति के बाहर विवाह करने पर प्रतिबंध रहता है। 

(4) मैकाइवर एवं पेज़ के अनुसार, “जब स्थिति पूर्व निश्चित हो ताकि व्यक्ति बिना किसी परिवर्तन की आशा के अपना भाग्य लेकर उत्पन्न होते हों, तब वर्ग जाति का रूप ले लेता हैं।” 

(5) इरावती कर्वे के अनुसार, “जाति मूलतः एक विस्तृत नातेदारी समूह हैं।” 

(6) ब्लण्ट के अनुसार, “जाति एक अन्तर्विवाही समूह अथवा अन्तर्विवाही समूहों का संकलन है, जिसका एक सामान्य नाम होता है, जिसकी सदस्यता आनुवांशिक होती हैं, जो सामाजिक सहवास क्षेत्र में अपने सदस्यों पर कुछ प्रतिबन्ध लगाता है। इनके सदस्य या तो एक सामान्य परम्परागत व्यवसाय को करते हैं अथवा किसी सामान्य आधार पर अपनी उत्पत्ति का दावा करते हैं और इस प्रकार एक समरूप समुदाय के रूप में मान्य होते हैं।। 

(7) जे. एच. हट्टन के अनुसार, “जाति एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत एक समाज अनेक आत्मकेन्द्रित एवं एक-दूसरे से पूर्णतः पृथक इकाइयों (जातियों) में विभाजित रहता है। इन इकाइयों के बीच पारस्परिक संबंध ऊँच-नीच के आधार पर सांसारिक रूप से निर्धारित होते हैं।” 

जाति की विशेषताएँ/लक्षण – 

जाति एक जटिल व्यवस्था है जिसे एक परिभाषा में बाँधना कठिन है। यही कारण कि विद्वानों ने जाति की परिभाषा देने के बजाय उसकी विशेषताएँ लिखी हैं। डा० जी एस. धुरिये ने जाति की निम्नलिखित छः विशेषताओं का उल्लेख किया है – 

(1) विवाह संबंधी प्रतिबंध – जाति प्रथा के अन्तर्गत कोई भी सदस्य अपनी जाति के बाहर विवाह संबंध स्थापित नहीं कर सकता। वास्तव में हिन्दू जाति अनेक उप-जातियों में विभाजित है और प्रत्येक उप-जाति अन्तर्विवाही समूह है अर्थात् कोई भी सदस्य उप-जाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता। 

(2) व्यवसाय संबंधी प्रतिबंध – जाति-व्यवस्था में विभिन्न जातियों के व्यवसाय निश्चित होते हैं। जैसे-ब्राह्मण केवल धार्मिक तथा अध्ययन-अध्यापन के कार्य ही कर सकता है। वैश्य व्यापार तथा शूद्र सिर्फ सफाई के ही काम कर सकता है। इस प्रकार जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता है। और कोई भी जाति अपना ही व्यवसाय करती हैं। 

(3) जातियों में व्यवसाय सुनिश्चित – जाति-व्यवस्था में व्यक्ति का धन्धा भी पैतृक परम्परा से आता है। जैसे सुनार का लड़का सुनारी का और लुहार का लड़का लुहारी का काम करता है। 

( 4 ) जाति का परिणाम छुआछूत – जाति-व्यवस्था के आधार पर मनुष्य का मनुष्य के साथ भेद-भाव है। मैं इस समूह का हूँ, उस समूह का नहीं हैं, उस भावना से जाति व्यवस्था की हर बात की शुरुआत होती है। इस प्रकार अनेक असुविधाएँ निम्न जातियों के सदस्यों के लिए होती है। 

( 5) खान-पान तथा सामाजिक सहवासों पर रोक – यह जाति प्रथा का निषेधात्मक पक्ष है। जाति-व्यवस्था अपने सदस्यों पर खाने पीने तथा सामाजिक सहवासों पर अनेक प्रतिबन्ध लगाती हैं। हिन्दुओं में प्रत्येक जाति को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरी जाति के हाथ का बना भोजन कर ले, लेकिन ब्राह्मणों के हाथ का बना भोजन अन्य सभी जातियाँ खा लेती हैं। इसी प्रकार जल-ग्रहण करने तथा कच्चे पक्के भोजन के संबंध. में भी छुआछूत बरती जाती हैं। ब्राह्मणों में छुआ-छूत सबसे अधिक बरती जाती है। कुछ कान्यकुब्ज ब्राह्मण तो केवल स्वयं के हाथ का पका हुआ भोजन ही खाते हैं। 

(6) सामाजिक और धार्मिक विशेषाधिकार – हिन्दू जातीय सोपानक्रम में सबसे अधिक सामाजिक और धार्मिक अधिकार ब्राह्मणों को प्राप्त है और सबसे कम अधिकार अछूतों (शूद्रों) को प्राप्त है। दक्षिण भारत में शूद्रों को निम्न स्थिति का एक समय में चरम रूप देखने को मिलता था, इस जाति-प्रथा में कुछ लोगों को जन्म से ही सभी अधिकार प्राप्त हैं और कुछ लोगों को सभी सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक अधिकारों से वंचित रखा गया हैं | 

(7) समाज का खण्डात्मक विभाजन – जाति-प्रथा द्वारा भारतीय समाज का खण्डात्मक विभाजन हुआ है। प्रत्येक खण्ड के सदस्य के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपने पद तथा जाति के नियमों के अनुसार कार्य करें। परन्तु यदि कोई सदस्य अपनी जाति के नियमों का उल्लंघन करता है तो उसे या तो दण्ड दिया जाता है या जाति से निकाल दिया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक खण्ड के सदस्यों में सामुदायिक भावना का भी जन्म होता है। 

(8) सोपानतंत्र या संस्तरण – भारतीय हिन्दू सामाजिक स्तरीकरण मुख्यतः जाति प्रथा पर ही आधारित है। हिन्दू जाति के विभिन्न खण्डों में ऊँच-नीच का एक संस्तरण या उतार-चढ़ाव होता है। इस संस्तरण या सोपानक्रम में सर्वोच्च स्थिति ब्राह्मणों की, दूसरी क्षत्रियों की, तीसरी वैश्यों की तथा चौथी या सबसे निम्न स्थिति शृश्वें की होती है। इस प्रकार हिन्दू जाति व्यवस्था में ऊँच-नीच पर आधारित एक सीढ़ी सी दिखाई पड़ती हैं। 

(9) जन्मजात सदस्यता – जाति की सदस्यता जन्मजात होती है। एक व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, मृत्युपर्यन्त उसी में बना रहता है। शिक्षा, धर्म, व्यवसाय एवं गुणों में वृद्धि करने से जाति बदली नहीं जा सकती। 

( 10) जाति का राजनीतिक रूप – डॉ० सक्सेना का मत है कि जाति एक राजनीतिक इकाई भी है क्योंकि प्रत्येक जाति व्यावहारिक आदर्श के नियम प्रतिपादित करती है और अपने सदस्यों पर उनको लागू करती है। जाति-पंचायत , उसके कार्य और संगठन जाति के राजनीतिक पक्ष के ही प्रतीक हैं। 

(11) अपनी ही जाति में विवाह – जाति के लोग अपनी ही जाति में विवाह करते हैं इसे अन्तर्विवाही कहते हैं। अगर कोई व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह करता है, तो उसे कठोर दण्ड देने की प्रथा प्राचीन समय में थी। उस समय उसे प्रायः जाति से निष्कासित कर दिया जाता था।

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