घरेलू हिंसा इसके प्रकार, कारण एवं निराकरण

 घरेलू हिंसा  इसके प्रकार, कारण एवं निराकरण 

घरेलू हिंसा – घरेलू हिंसा से तात्पर्य परिवार में महिलाओं पर किये जा रहे अत्याचार से है। भारतीय समाज में पारिवारिक हिंसा अत्यन्त प्राचीन धारणा है न कि नवीन मानव समाज में पहले सतीत्व के नाम पर पति की मृत्यु हो जाने पर उसकी विधवा पत्नी को जिन्दा जला दिया जाता था। इसी प्रकार भारतीय हिन्दू महिलाओं में अत्यधिक असन्तोष पाया जाता रहा है क्योंकि महिलाओं का उत्पीड़न, उनका शोषण, उनके साथ मारपीट करना, गाली या अपशब्द कहना, जला देना, प्रताड़ित करना और हत्या करना आदि पारिवारिक हिंसा के अन्तर्गत आता है। 

घरेलू हिंसाओं में मुख्य रूप से यह देखने को मिलता है कि घरेलू हिंसा का शिकार अधिकांश महिलाएं ही होती है ऐसा क्या? ऐसा इसलिए होता है कि अधिकांश घरेलू दायित्व महिलाओं को ही निर्वाह करने होते हैं और कुछ स्वियों को तो घर के साथ-साथ बाहरी कार्य भी देखने पड़ते हैं। इतना सब कुछ करने के बाद यदि कोई उनसे भूल या गलती हो जाती है तो उन्हें अपमानित किया जाता है. जिसे वे सहन नहीं कर पाती हैं और वे हिंसात्मक रूप धारण कर लेती है। घरेलू हिंसा के अन्तर्गत महिलाओं के साथ किया जाने पाला अत्याचार प्रति मा ची को दी जाने वाली यातनाएँ, यौनि हतोत्साहन, दहेज हत्याएँ आदि को भी शामिल किया जाती है। 

घरेलू हिंसा के स्वरूप अथवा प्रकार –

घरेलू हिंसा के स्वरूप को हम निम्नवत दर्शा सकते है – 

(1) पत्नी को पीटना – ययपि भारतीय हिन्दू समाज में पत्नी को गृहलक्ष्मी माना जाता है। यहाँ तक कि किसी भी धार्मिक कार्य में पत्नी का होना अनिवार्य होता है क्योंकि हिन्दू समाज की ऐसी मान्यता है कि यदि बिना पत्नी के कोई धार्मिक कार्य किया जाता है तो उसका फल नहीं मिलता है। जैसे-रामेश्वरम की स्थापना के समय भगवान राम से रावण ने कहा था कि यदि आपके साथ सीता जी नहीं हैं तो आपके द्वारा यह स्थापना करना व्यर्थ है। ये तो भारतीय समाज में नारी की स्थिति का एक पहलू है जबकि हमारे दूसरे पहलू में पत्नी को पति द्वारा या उसके परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा प्रताडित किया जाता है। कुछ पति स्वभाव से इतने क्रूर होते हैं कि वे शराब पीकर या अन्य कोई नशा करके पतनी के हाथ-पैर भी तोड़ देते हैं और पत्नी बेचारी यह सब सहन करती है। पीटने की घटनाएं शिक्षित महिलाओं की अपेक्षा अशिक्षित महिलाओं में अधिक होती है। पतियों द्वारा अपनी-अपनी पत्नियों को चाकू से गोदा गया, फर्नीचर फेंककर मारा गया, सीढ़ियों से ढकेला गया और कुछ पत्नियों के पैरों कीलें भी ठोकी गई। इस प्रकार परिवार में जो हिंसात्मक कार्य पत्नियों के लिए किए जाते हैं वे घरेलू हिंसा का एक प्रमुख स्वरूप हैं। 

(2) दहेज हत्यायें – जब किसी लड़की की शादी होती है और वह अपने साथ दहेज के रूप में कीमती सामान नहीं ले जाती है तो यदि उसके ससुराल वाले लोभी प्रकृति के होते हैं तो उसे अपने घर से दहेज में नकदी व लाने के लिए मजबूर करते हैं। कभी-कभी तो वे बहू को मारते-पीटते भी है इस प्रकार जब बहू परेशान हो जाती है तो या तो वह स्वयं आत्महत्या कर लेती हो या फिर उसके ससुराल के सदस्य उसकी हत्या कुर देते है। इस प्रकार की हत्यायें दहेज हत्या कहलाती हैं जो दहेज हत्या का प्रमुख स्वरूप है। इस समस्या का निदान करने के लिए सरकार ने दहेज निरोधक अधिनियम, 1961 पारित किया। इस अधिनियम के अनुसार दहेज लेना व देना दोनों ही अपराध समझे जाते हैं। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी आज न तो दहेज पर नियन्त्रण हुआ है और न ही दहेज हत्याओं पर। 

(3) कन्या वध तथा भ्रूण हत्या – भारतीय समाज शुरू से ही पुरुष प्रधान रहा है। इस समाज में आज भी लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को अधिक मान्यता दी जाती है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि लड़कों के बिना श्राद्ध व तर्पण नहीं हो सकता तथा उत्तराधिकारी के रूप में भी लड़कों का होना आवश्यक है। यही कारण है कि लड़कों का पैदा होना अधिक प्रसन्नता का विषय माना जाता है। कुछ परिवारों में तो लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता है। आधुनिक युग में तो कन्या की हत्या गर्भ में ही कर दी जाती है वर्तमान समाज में पुत्र व पुत्री वा समान दृष्टि से देखने के बावजूद भी कन्याओं की भ्रूण हत्या कर दी जाती है और उसे पाप नहीं समझा जाता है। यह भी घरेलू हिंसा का एक प्रमुख स्वरूप है। 

(4) विधवाओं के प्रति हिंसा – भारतीय समाज में विधवाओं की स्थिति अल्यन्त दयनीय है। इन्हें समाज में सम्मान नहीं मिलता है बल्कि इनका अपमान व निरादर किया जाता है। इनके परिवार के साथ-साथ समाज भी इनके साथ दुर्व्यवहार एवं अत्याचार करता है। परिवार के ही लोग इनके साथ अनैतिक कार्य करते हैं और धोखे से इनकी सम्पति हड़प लेते हैं। कुछ परिवार के लोग तो विधवाओं को मार-पीट कर घर से भी निकाल देते हैं, जिसके कारण इन्हें भिक्षा अर्जन करके अपनी जीविका चलानी पड़ती है, कभी-कभी इनको अपनी जीविका चलाने के लिए देह शोषण भी करवाना पड़ता है। भारत सरकार ने इन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए विधवा पुणे अधिनियम पारित किया जिसमें विधवाओं को पुनर्विवाह करने की मान्यता प्रदान की गई, किन्तु समाज ने इस बात को नहीं स्वीकारा और विधवा विवाह को हीन दृष्टि से देखा। इस प्रकार विधवाओं के साथ हिररात्मक कार्य भी परलू हिंसा का एक प्रमुख स्वरूप है। 

घरेलू हिंसा के प्रमुख कारण – 

(1) सामाजिक कुप्रथाएँ – भारतीय समाज में विद्यमान दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा, विधवा-विवाह एवं बाल-विवाह आदि कुप्रथाओं के परिणामस्वरूप महिलाओं के प्रति अत्यधिक हिंसाएँ होती हैं। 

(2) पारिवारिक तनाव – मादक पदार्थों का सेवन, कम आय सन्तान का न होना एवं अन्य कारण आदि। किसी भी कारण से पारिवारिक तनाव होने की स्थिति में मेलू हिंसा बढ़ती है। इस प्रकार पारिवारिक तनाव घरेलू हिंसा का एक प्रमुख कारण है। 

(3) पुरुष प्रधानता –  भारतीय समाज पुरुष प्रधान है, जिसके कारण पर की सम्पूर्ण सत्ता उसी के हाथ में होती है। अपनी इस शक्ति का वह दुरूपयोग करता है और परिवार के सदस्यों पर अत्याचार करता है विशेषकर वह पत्नी पर अत्याचार करता है जिसके कारण घरेलू हिंसा उत्पन्न होने लगती है। 

(4) अशिक्षा – भारतीय समाज में शिक्षा का अभाव पाया जाता है। इस अशिक्षा के कारण घरेलु आवश्यकताओं की पूर्ति और हितों की रक्षा सुचारु रूप से नहीं चल पाती है, जिसके कारण परेलू हिंसा को प्रोत्साहन मिलता है। 

( 5) महिलाओं के प्रति विद्वेष – भारतीय समाज में पुरुष वर्ग सदैव ही नारी से विद्वेष रखता है और उसे अपने से निम्न समझता है। इस प्रकार पुरुष, नारी की अपने समान नहीं समझता है। जिसके कारण घरेलू तनाव बढ़ता है और घरेलू हिंसा प्रोत्साहित होती है। 

घरेलू हिंसा रोकने के उपाय (सुझाव) – 

(1) रोजगार की व्यवस्था – जब किसी परिवार में भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था नहीं होती है तो खाने-पीने एवं पहनने को लेकर रोजगार की व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे कि उनकी आर्थिक समस्याओं का निदान हो सके इस प्रकार घरेलू तनाप कम होगा फलस्वरूप घरेलू हिंसा भी कम होगी। 

(2) शिक्षा की समुचित व्यवस्था – घरेलू हिंसा पर नियंत्रण लगाने के लिए समाज के सभी लोगों को शिक्षित किया जाना आवश्यक है जिससे परिवार के सम्बन्धों का समुचित ज्ञान परिवार के सभी सदस्यों को हो सके और उनके मन में कभी-भी हिंसात्मक कार्यवाही की बात उत्पन्न न हो सके। 

(3) आवास की व्यवस्था – जब परिवार के सदस्यों के पास आवास की व्यवस्था नहीं होती है तब भी घरेलू हिंसाएँ होती है। भारतीय समाज में सरकार एवं स्वयं सेवी संगठनों द्वारा महिलाओं के आश्रम की व्यवस्था की जा रही है जिससे ससुराल से निकाली गई महिलायें, निराश्रित महिलायें एवं समाज द्वारा प्रताड़ित महिलाओं को आश्रय प्रदान किया जा सके। इससे भी महिला हिंसा में कमी आयेगी। 

(4) महिला संगठनों की स्थापना – भारतीय समाज में अधिक से अधिक महिला संगठनों की स्थापना की जानी चाहिए। इन संगठनों द्वारा परिवार और अपने पतियों से पीड़ित महिलाओं को अत्याचार से मुक्ति दिलाने, उन्हें आवश्यकतानुसार सहयोग देने तथा नैतिक आत्मबल प्रदान करने और उनके. आत्मविश्वास के विकास करने के लिए अक्क प्रयास किए जाने चाहिए। 

(5) महिला न्यायालयों की स्थापना – महिलाओं के लिए पृथक रूप से महिला न्यायालयों की स्थापना की जानी चाहिए जिसमें परिवार द्वारा सताई गई महिलाओं के साथ पूर्ण न्याय किया जाना चाहिए। इस प्रकार प्रताड़ित महिला के परिवार के अन्य सदस्य कमी भी महिला के विरुद्ध हिंसा नहीं करेंगे। इत्यादि। 

(6) वैचारिक परिवर्तन – महिलाओं के विरुद्ध हिसा एवं अपराधों को रोकने के लिए लहकियों के माता-पिता के विचारों में भी परिवर्तन लाना होगा। वे लडकियों को बचपन से ही इस प्रकार का समाजीकरण करते जिसमें उन्हें पति परमेश्वर की धारणा सिखाया जाती है, उन्हें कहा जाता है पति के घर डोली जाती है और अर्थी भी वहीं से उठती है. खी को सहिष्णु होना चाहिए, आदि। ऐसे संस्कारों के कारण ही स्वी सब कुछ बर्दाशत करती रहती हैं और प्रतिरोध नहीं करती। इस विचार का बदलाव आवश्यक है। 

(7) दण्ड की व्यवस्था – जो लोग अपनी पत्नियों को परेशान करते हैं उनकी सामाजिक निन्दा की जाए, और उन्हें सार्वजनिक रूप से दण्डित किया जाए, जिससे कि अन्य लोगों को भी संबक मिले और वे ऐसा करने के लिए प्रेरित न हों। 

(8) कानूनी सहायता एवं परामर्श – पीड़ित महिलाओं को कानूनी सहायता प्रदान करने एवं उनके विवादों को निपटाने के लिए स्वयंसेवी संगठनों के आगे आना होगा और वे मुफ्त में ऐसी पीड़ित महिलाओं की मदद करें एवं उन्हें उचित सलाह देकर उनका मार्गदर्शन करें ताकि वे पुनः सुखी जीवन व्यतीत कर सकें।

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