क्षेत्रीयतावाद की परिभाषा एवं कारण

 क्षेत्रीयतावाद की परिभाषा एवं कारण

क्षेत्रवाद का अर्थ – क्षेत्रवाद से आशय किसी एक क्षेत्र विशेष के व्यक्तियों की उस धारणा से है जिसके अन्तर्गत उनमें विशेष प्रेम तथा पक्षपात् की भावना होती है। क्षेत्रवाद में एक क्षेत्र के लोगों में सामूहिक हितों, की भावना होती है। क्षेत्रवाद में एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र से अपने को श्रेष्ठ समझते हैं तथा वे अपने आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करते हैं। 

परिभाषा—मैकाइवर और पेज के शब्दों में – “यद्यपि अंशों में ही सही नगरों और ग्रामों का पर्यावरण उन समस्त व्यक्तियों के लिए जो उस भू-भाग पर रहते हैं, एक सामान्य क्षेत्र बनता जा रहा। है। वह क्षेत्र जो नगर एवं गाँव के लिए समान घर की भाँति है, क्षेत्र कहा जाता है।” 

लुण्डवर्ग – “क्षेत्रीयतावाद उस अध्ययन से सम्बन्धित है जिसके अन्तर्गत एक भौगोलिक एवं सामाजिक व्यवहारों के मध्य वर्तमान सम्बन्धों पर बल दिया जाता है।” 

जी.डी.एच. कोल – “क्षेत्रीयतावाद ऐसे क्षेत्रों को परिभाषित करने का एक प्रयत्न है जो। कि सामाजिक भावना की इकाइयाँ है, और जहाँ तक सम्भव है वे आर्थिक जीवन के क्षेत्र में भी है और वे प्रशासकीय कार्यों की इकाईयों के रूप में भी उपयुक्त है ।” 

ई०जी० बोगार्ड – “यदि किसी भौगोलिक क्षेत्र का आर्थिक साधन इस भाँति हो जाय कि उनके लिए अपनी विलक्षणता को बनाये रखना सम्भव हो तो वहाँ के लोगों में सामूहिक हितों का विकास और इस प्रकार क्षेत्रीय आदर्शों का विकास हो सकता है।” 

बोगार्ड ने पुनः स्पष्ट किया है, “क्षेत्रीयतावाद का विकास स्थानीय इकाइयों की क्रियाओं के एकीकरण के रूप में और राष्ट्रीय एकता के पक्ष के रूप में भी हो सकता है। क्षेत्रीयतावाद कई स्थानीय इकाइयों के विचार तथा क्रियाओं की सम्मिलित क्रियाशीलता है। यह क्षेत्रीयता अपनी क्रियाशीलता में राष्ट्रीयता की ओर अनुभव रखती है जिसका कि यह एक अंश होती है।” 

क्षेत्रीयतावाद के कारण – 

(1) भौगोलिक कारक – भारत जैसे विशाल देश में भौगोलिक विभिन्नताएँ विद्यमान हैं। नदी, पहाड़, रेगिस्तान, जंगल, मानव समूहों को एक दूसरे से पर्याप्त दूर रखते हैं। अन्य शब्दों में ये प्राकृतिक तथा मानवीय समूहों को विभिन्न क्षेत्रों में बाँटते हैं। इस प्राकृतिक बंटवारे के कारण क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा मिलता है। क्षेत्र विशेष की समस्याएँ एक जैसी होने पर वहां के व्यक्तियों की मानसिकता व विचारधारा में भी समानता उत्पन्न हो जाती है। अतः समस्या समाधान हेतु भी क्षेत्रीयतावाद का विकास होता है। 

(2 ) ऐतिहासिक कारण – भारत में क्षेत्रीयतावाद के विकास में ऐतिहासिक घटनाओं, परम्पराओं तथा राजवंशों का भी हाथ रहा है। यह रीति-रिवाज व परम्परायें आगे चलकर क्षेत्रीय विशेषतायें बन जाती हैं। इसका यह एक उदाहरण बुन्देलखण्ड में हरदौल और सुआटा की पूजा की प्रथा है। 

(3) राजनैतिक कारण – विभिन्न राजनैतिक दलों ने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु क्षेत्रीयतावावं को बढ़ावा दिया है। क्षेत्रीय नेता अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए सामान्य जनता की भावनाओं को क्षेत्र, भाषा, संस्कृति के नाम पर शोषण करते हैं। असम तथा आन्ध्र प्रदेश में इसका नवीनतम उदाहरण देखा जा सकता है। 

(4) आर्थिक कारण – क्षेत्र विशेष की आर्थिक स्थिति भी क्षेत्रीयतावाद के विकास के लिए जिम्मेदार है। प्रायः गरीब क्षेत्र या अविकसित क्षेत्र में लोग अपनी माँगों की प्राप्ति हेतु आन्दोलन (जो राजनैतिक दल का रूप ग्रहण कर सकता है) चलाते हैं और क्षेत्रीयतावाद का जन्म होता है। प्रायः सरकार की दोषपूर्ण आर्थिक नीति व आर्थिक द्वैधता से क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा मिलता है। 

(5) भाषावाद – भाषावाद क्षेत्रीयतावाद के लिए कार्य और कारण दोनों ही है। क्षेत्रीयतावाद से भाषावाद और भाषावाद से क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा मिलता हैं। एक भाषा बोलने वाले व्यक्ति अपने आपको, अन्य भाषा भाषी की तुलना में करीब पाते हैं। सामान्य समस्याओं के निराकरण में एक दूसरे की मदद पाते हैं। डॉ० ब्रिजमोहन ने लिखा है कि- भारत जैसे देश में जहाँ लगभग 16 मान्यता प्राप्त भाषायें तथा साथ ही लगभग 820 भारतीय तथा 63 विदेशी भाषायें बोली जाती हैं, जनतन्त्र प्रणाली के विशेष सन्दर्भ में भाषायी तथा क्षेत्रीय तनाव उत्पन्न एवं विकसित होना पूर्ण स्वाभाविक है।’ 

6) सामाजिक सांस्कृतिक कारण – भारतीय समाज की विशिष्ट सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था भी क्षेत्रीयतावाद के जन्म का एक कारण है। समाज विभिन्न जातियों और प्रजातियों में बंटा हुआ है। प्रत्येक जाति एक दूसरे से सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टिकोण से पर्याप्त भिन्नता रखती है। क्षेत्र विशेष में विशिष्ट जाति समूहों के संघ को देखा जा सकता है जिनमें क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा मिलता है। मुसलमानों, मराठे, सिख, राजपूत भिन्न भिन्न क्षेत्रों में राज्य स्थापित किये थे ये सभी तत्व क्षेत्रीयतावाद के विकास में सहायक हैं। 

क्षेत्रीयतावाद का उद्देश्य – 

क्षेत्रीयतावाद एक सीखा हुआ मानवीय व्यवहार हैं जो देश व काल के अनुसार गतिशील। प्रकृति को व्यक्त करता है। इसका जन्म निश्चित उद्देश्यों के साथ हुआ माना जा सकता है। इनमें कुछ उद्देश्य इस प्रकार है – 

(1) सर्वप्रथम क्षेत्रीयतावाद का उद्देश्य आर्थिक सम्पन्नता को बताया जाता है, प्रायः यही वास्तविकता भी होती है।

(2) क्षेत्रीयतावाद राजनैतिक चेतना तथा स्वाशासन का भी उद्देश्य रखता है। 

(3) क्षेत्रीय संस्कृति को सुदृढ़ बनाने हेतु भी क्षेत्रीयतावाद का जन्म होता है।

(4) इसका एक उद्देश्य क्षेत्रीय भावनाओं का प्रचार-प्रसार तथा उनका राष्ट्रीय संस्थाओं से सुरक्षा प्रदान करना भी होता है। 

(5) संस्थाओं व संगठनों का निर्माण तथा पुनर्निर्माण भी इनका उद्देश्य होता है। 

(6) प्रायः क्षेत्रीयतावाद का उद्देश्य केन्द्रीय सरकार के तानाशाही प्रवृत्ति व पक्षपातपूर्ण रवैये को बदलने के लिए किया जाता है।

(7) सामाजिक आर्थिक परिवर्तन, सर्वांगीण विकास तथा संगठित एवं आधुनिकता की प्राप्ति इसके प्रमुख उद्देश्य में है। यह ऐसा विकास एवं प्रगति चाहता है जिसमें सामुदायिक एकता सुनिश्चित हो सके।

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