कैल्डियन सभ्यता की आर्थिक स्थिति

कैल्डियन सभ्यता की आर्थिक स्थिति 

प्राचीन गौरव के संरक्षक कैलिडियन शासकों ने जिए धार्मिक उत्साह का वातावरण बनाया उसमें देवस्थानों का पुनर्निर्माण हुआ और सदियों पुराने अनुष्ठानों का विधिवत आयोजन किया गया। समारोह पूर्वक धार्मिक त्यौहारों और उत्सवों को मनाया गया जिसमें शासकों ने समय, शक्ति और धन का व्यय किया। इसमें सर्वाधिक महजवपूर्ण ‘नववर्षोत्सव’ था जिसमें अनेक देवी-देवता, देवाधिदेव मर्दुक के जुलूस और मन्दिर में भाग लेने आते थे (लाये जाते थे)। इस धर्मनिष्ठा के फलस्वरूप एस० सी० इंस्टन शब्दों में ‘रूढ़िवाद का पुनरागमन हुआ और इसस ‘रूप’ का पुनर्जीवन हुआ जिसमें जीवन्त-चेतना का अभाव था।’ 

धार्मिक पुनर्वृत्यामकता ने पलायनवाद को मार्ग दिया और गहन निराशा के वातावरण में भाग्यवाद का सितारा चमक उठा। कैल्डियन धर्म नैतिकता विहीन था – अब ईश्वर द्वारा निर्धारित आचरण में असफलता पाप थी जिसका लौकिक व्यवहार से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया था। मेसोपोटामिया की विश्वदृष्टि में ज्योतिष का आदरणीय स्थान सुरक्षित हो चुका था। इस परिस्थिति में ईश्वर के लौकिक प्रतिनिधियों की इच्छाओं के सामने नतमस्तक होने के अलावा सामान्य जनता के पास कोई सार्थक विकल्प नहीं रह गया था। 

नियति और भाग्य की अवधारणाओं को नई शक्ति मिली तथा पुरोहितों के लाभों और भ्रष्टाचार को नवजीवन मिला। भाग्यवान सितारों से प्रसन्न लोग ‘सितारों के गर्दिश में होने पर सशंकित हो जाते थे। बेबीलोन के जिगूरत की ऊपरी मंजिल पर मर्दुक देवता का शयनकक्ष था जिसका भोग स्वार्थ बेबीलोन की सबसुन्दरी पुजारिन का इच्छादास था । हेरोडोटस ने बेबीलोन की कामदेवी मिलिता के मन्दिर के आँगन के धार्मिक आचार का विवरण देते हुए बताया है कि धनी और साधारण घरों की औरतें श्रृंगार करके बैठती थीं, कोई विवाहिता नारी तब तक सही पत्नी नहीं मानी जाती थी जब तक कि यह अजनबी से धन लेकर वह उसके साथ कुछ घण्टे न बिता ले मूलतः इस घृणित आयोजन में कामतत्व की प्रधानता नहीं मानी जाती थी बल्कि इसे देवार्चन का प्रतीक समझा जाता था। 

कैल्डियन समाज का आर्थिक स्तर ‘पुनर्जागरण की मान्यता के अनुकूल नहीं था। युद्धबन्दी और अन्य बहुसंख्यक दास विविध वर्गों की सेवा में अपना योगदान कर रहे थे और शोषित रहने की क्षमता को झेल रहे थे । शासनातंत्र और मंदिरों के प्रशासन से प्रत्यक्षतः जुड़े लोगों द्वारा आयोजित निर्माण कार्यों और खेतों में उनका व्यादा उपयोग होता था। मीडिया और पर्सिया के राजनीतिक एकीकरण से बेबीलोन के विदेशी व्यापार को गहरा धक्का लगा और अचानक मुद्रास्फीति से लगभग दुगुनी मूल्यद्धि हुई। 

अब विदेशी व्यापार में भी मौखिक अनुबन्ध ज्यादा होने लगे थे ई-अन्ना के प्रमाणों से ज्ञात होता है कि मंदिरों के पास अपार भूसम्पत्ति थी और व्यापार में भी मन्दिरों की सक्रिय भागीदारी थी। इस यथार्थ ने मंदिरों को, केन्द्रीय सरकार से स्वतंत्र आर्थिक गतिविधियों का नियामक बना डाला था। मंदिरों के आर्थिक कार्यकलापों का संचालन प्रशासक (शतम्मु), निरीक्षक (किपु) और पुजारी लिपिकों की मदद से किया जाता था। मंदिरों में कुछ स्वतंत्र नागरिक (मारबनुती) भी नौकरी करते थे तथा मजदूरों और बासो मे अतिरिक्त अदावश अपनी सेवायें अर्पित करने वाले कर्मकार (शिरकू) भी लगे हुये थे। उपजाउळ जमीन, व्यापार, लगान, धार्मिक कर और दान पुण्य से प्राप्त वस्तुओं और धनराशि का केन्द्रीकरण मन्दिरों में हो रहा था साहकारी का चन्धा भी काफी बढ़ गया था। मंदिरों से राज्य, अपने अधिकारी के माध्यम से राजस्व का एक हिस्सा लेता था अतः जनता पर प्रायः दोहरी मार पड़ती थी। 

नेवोनिडस ने मंदिरों को राजकीय प्रशासन के अंतर्गत लाने का प्रयास किया लेकिन ईश्वर के भक्तों को यह दखलन्दाजी बर्दाश्त नहीं हुई और परसीक मित्र साइरस के विश्वासघात में राष्ट्रीय सहयोग देकर पुरोहितों ने प्रतिशोध लिया। इतिहास के विद्यार्थी को धर्म और अर्थ के इस समीकरण को निश्चय ही महत्वपूर्ण मानकर उसकी गवेषणा में तत्पर रहना चाहिए। जार्ज रोक्स लिखते हैं. आर्थिक दबाव ने मेसोपोटामिया के पतन में अपना योगदान किया लेकिन मंदिर उसके बाद भी छ: शताब्दियों तक जीवित रहें। जन्म की तरह इस सभ्यता की मृत्यु भी ईश्वर के पंखों के नीचे हुई।’ सभ्यता की मृत्यु की अवधारणा से असहमति के बावजूद विद्वान लेखक की उपर्युक्त मान्यता को समर्थन देना अपरिहार्य प्रतीत होता है। कैल्डियन सभ्यता के अध्ययन से स्पष्ट है कि ‘वास्तव में बेबीलोन प्राचीन परम्पराओं का एक संग्रहालय होकर रह गया था जिसमें प्राचीन ज्ञान का संग्रह, अध्ययन और संरक्षण ही प्रधान कर्तव्य’ समझा जाता था।

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