अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास का साधन शिक्षा है

 अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास का साधन शिक्षा है 

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावनाओं को विकास के लिए रेडियो, समाचार पत्र, भाषण, सिनेमा आदि अनेक साधनों को महत्वपूर्ण बताया जाता है पर इनमें ‘शिक्षा’ को सबसे श्रेष्ठ स्थान दिया जाता है। इस विषय में दार्शनिक, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, शिक्षाशास्त्रों सभी एकमत हैं। इसका एक मात्र कारण यह है कि जिन संस्थाओं में शिक्षा प्रदान की जाती है, वे सर्वोत्तम सांस्कृतिक तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है और निष्पक्षता तथा सत्य के क्षेत्रों में समाज के साधारण स्तर से बहुत ऊंची होती हैं। इस तथ्य की पुष्टि करते हुए ‘यूनेस्को’ द्वारा प्रकाशित टुवर्डस वर्ल्ड अण्डरस्टैंडिंग में लिखा गया है – 

“शिक्षालय आसपास की संस्कृति में निहित सर्वोत्तम तत्वों को व्यक्त कर सकते हैं और साधारणतः करते भी हैं। वे साथ, ईमानदारी और निष्पक्षता में समाज के सामान्य स्तर से ऊँचे होने चाहिए और साधारणतः होते भी हैं वे लोगों के मानदंडों और मूल्यों को काफी ऊँचा उठाने का प्रयास करते हैं।” 

अन्तर्राष्ट्रीय और शैक्षिक कार्यक्रम – प्रत्येक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रचलित शैक्षिक कार्यक्रम में परिवर्तन कराना आवश्यक हो जाता है। इस संबंध में अधोलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं – 

(1) पाठ्यक्रम में परिवर्तन – 1. विश्व के प्रमुख धर्मों और उनके आदर्शों को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाये।

2. सामाजिक अध्ययन नामक विषय को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाये।

3. “अन्तर्राष्ट्रीय भावना” नामक विषय को अनिवार्य बनाया जाये।

4. विश्व इतिहास, विध साहित्य, विश्व कला और विश्व सांस्कृतियों से सम्बन्धित पाठ्यक्रम वस्तु को रखा जाये।

5. विभिन्न देशों में रहने वाले व्यक्तियों के रहन-सहन, समानताओं और असमानताओं को इनसे संबंधित विषयों में महत्व दिया जाये। 

(2) शिक्षण विधि में परिवर्तन – अन्तर्राष्ट्रीय भावना का विकास करने के लिए शिक्षण विधि में परिवर्तन किया जाना आवश्यक है, उदाहरणार्थ – विज्ञान के शिक्षण में उसके सामाजिक पक्ष पर बल दिया जाए। इसका अर्थ यह है कि बालकों को यह बताया जाये कि वैज्ञानिक अविष्कार के द्वारा मानव जीवन को किस प्रकार सुखी और सम्पन्न बनाया जा सकता है। इसी प्रकार, अन्य विषयों के शिक्षण में भी उनके सामाजिक और अन्तर्राष्ट्रीय पक्षों पर बल दिया जाये। सभी विषयों का अध्ययन अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से किया जाये वाद-विवाद, समस्या आदि विधियों का प्रयोग किया जाये। 

(3) विद्यालय के वातावरण में परिवर्तन – आजकल हमारे विद्यालयों का वातावरण अन्तर्राष्ट्रीय भावना के लिए उपयुक्त नहीं है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि पर आधारित विद्यालय इस भावना के विकास में निश्चित रूप से बाधक है। 

अतः यह आवश्यक है कि इन विद्यालयों का कलेवर पूर्णतः बदल दिया जाये और इनमें इस प्रकार के वातावरण का निर्माण किया जाये, जो बालकों में अन्तर्राष्ट्रीय की भावना का विकास करने में सहायता दे। 

(4) अन्य सुझाव – 1. छात्रों को अन्य देशों के छात्रों को ‘पत्र-मित्र’ बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाये। 

2. छात्र को संयुक्त राष्ट्र-संघ के अंतर्गत कार्य करने वाले ‘युनेस्को’, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन, आदि में रुचि करायी जाय, क्योंकि वे संस्था विश्व के दुखी और पिछड़े हुए व्यक्तियों के लिए सराहनीय कार्य कर रही है। 

3. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलकूद प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाये। 

4. रेडियो, समाचार पत्र, सिनेमा, भाषण आदि आविधिक साधनों का प्रयोग किया जाये। 

5. एक देश के छात्रों और शिक्षकों के द्वारा दूसरे देशों में जाकर अध्ययन और अध्यापक का कार्य किया जाये। 

6. विदेशियों से छात्रों के साक्षात्कार कराये जायें। 

7. छात्रों को एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का अध्ययन कराया जाये। 

8. विभिन्न देशों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाये। 

9. संयुक्त राष्ट्र-संघ दिवस, बाल दिवस आदि मनाया जाये। 

10. छात्रों को अन्य देशों के छात्रों से फोटोग्राफ, वेशभूषा, चित्र आदि का आदान – प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

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