राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक संविदा सिद्धान्त पर विवेचना

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक संविदा सिद्धान्त पर विवेचना

सामाजिक समझौता (संविदा) का सिद्धान्त राज्य की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों में सामाजिक समझौता अथवा संविदा सिद्धान्त सबसे अधिक ख्याति प्राप्त तथा अत्यन्त विवादास्पद है। इस सिद्धान्त ने 17वीं एवं 18वीं शताब्दी अत्यन्त लोकप्रियता प्राप्त की। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य एक दैवीय अथवा ईश्वरीय रचना नहीं है, वह एक मानव द्वारा बनायी गयी संस्था है। वह प्राकृतिक नहीं कृतिम है। राज्य मनुष्यों के मध्य स्वेच्छा से हुए संविदा अथवा समझौता का परिणाम है और लोगों ने समझबूझकर आपस में समझौता करके राज्य की स्थापना की। इस सिद्धान्त के प्रतिपादकों ने मानव इतिहास को दो कालों अथवा अवस्थाओं में वर्गीकृत किया है। प्रथम अवस्था राज्यहीन’ थी तथा द्वितीय ‘राज्य युक्त प्रथम अवस्था को प्राकृतिक अवस्था कहा गया इस अवस्था में न राज्य और न उसके कानून द्वितीय अवस्था व्यक्तियों के पारस्परिक समझौते के बाद की है, जिसमें नागरिक समाज तथा राज्य का जन्म हुआ। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक हॉब्स, लॉक और रूसो हुए हैं। उन्होंने इस सिद्धान्त को सर्वाधिक प्रचारित किया और आज वे तीन नाम सामाजिक समझौते सिद्धान्त के समानार्थक माने जाते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार, मनुष्य के इतिहास को दो अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है। राज्य विहीन तथा राज्य युक्त अध्ययन की दृष्टि से समझौते के सिद्धान्त को तीन भागों में बाँट सकते हैं-

(1) प्राकृतिक अवस्था,(2) समझौता, (3) सम्प्रभुता। प्राकृतिक अवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति अपनी इच्छानुसार या प्राकृतिक नियमों के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करता है। कुछ ने प्राकृतिक अवस्थाओं को अत्यन्त कष्टप्रद और असहनीय माना है तो कुछ ने इस बात का प्रतिपादन किया है कि प्राकृतिक अवस्था में मानव जीवन सामान्य: आनन्दपूर्ण था केवल मनुष्यों को इस अवस्था में मामूली असुविधाओं की अनुभूति हुई। प्राकृतिक अवस्था के स्वरूप के संबंध में मतभेद होते हुए भी इस बात पर मतैक्य है कि किसी न किसी कारण से मनुष्य प्राकृतिक अवस्था के त्यागने के लिए विवश हुए और उन्होंने समझौते के द्वारा राजनीतिक समाज की स्थापना की। इसी समझौते के फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति की प्राकृतिक स्वतंत्रता आंशिक या पूर्णरूप से लुप्त हो गयी और इस स्वतंत्रता के बदले में उसे राज्य व कानून की ओर से सुरक्षा प्राप्त हुई। व्यक्तियों को प्राकृतिक अधिकारों के स्थान पर सामाजिक अधिकार प्राप्त हुए “लीकाक” के अनुसार, “राज्य व्यक्ति के स्वार्थों द्वारा चालित एक ऐसे आदान-प्रदान का नाम था जिसमें व्यक्तियों ने उत्तरदायित्त्व के बदले विशेषाधिकार प्राप्त किये। हाब्स ने इस समझौते की व्याख्या निरंकुश राज्यतंत्र का समर्थन करने के लिए की। लॉक ने इसी आधार पर संवैधानिक राजतंत्र का समर्थन किया। वास्तव में सामाजिक समझौता सिद्धान्त कोई नवीन विचारधारा नहीं था वरन् यह राजनीतिक दर्शन की तरह पुराना है। जैसे महाभारत, जैन और बौद्ध साहित्य में भी राज्य संस्था का आधार समझौता माना गया। पश्चिम में सोफिस्ट विचारकों, ईथि क्यूरियन एवं रोमन विचारकों ने भी इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। रिचर्ड हूकर प्रथम अंग्रेज लेखक था जिसने वैज्ञानिक रूप में समझौते की तर्कपूर्ण व्याख्या की किन्तु इसका विस्तृत रूप में प्रतिपादन और वास्तविक रूप में समर्थन हाब्स, लाक और रूसो के द्वारा ही किया गया और इन्हें ही अनुबंधवादी या समझौतावादी कहा जाता है। हाब्स ने अपनी पुस्तक लेवियाथन’ में सामाजिक समझौते के सिद्धान्त के आधार पर निरंकुश राजतंत्र का समर्थन किया। हाब्स के अनुसार, प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य का जीवन संकटमय था उसके अनुसार मानव स्वभाव से स्वार्थी, झगड़ालू तथा अहंकारी प्राणी होता है। हाब्स के शब्दों में, प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य का जीवन एकाकी, निर्धन, गंदा, पाश्विक और लघु था। इस अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शत्रु था। अतः यह अवस्था संघर्ष की अवस्था थी। इस अवस्था में मनुष्य प्राकृतिक अधिकारों व प्राकृतिक नियमों से भी परिचित था। इस संघर्ष से बचने के लिए हाब्स ने समझौते की कल्पना की। इसमें प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कहता है कि “मैं अपने ऊपर शासन करने के समस्त अधिकार इस व्यक्ति या व्यक्ति समूह के हायों में समर्पित करता हूँ। वशर्ते कि तू भी अपने समस्त अधिकार इसे दे दे।” इस तरह समझौते के द्वारा हाब्स के अनुसार राज्य की उत्पत्ति हुई और प्राकृतिक अवस्था का अन्त हुआ। समझौते के साथ ही राज्य और राज्य की सर्वोच्च शक्ति संप्रभु का उदय होता है। जिसका आदेश मानने के लिए सभी लोग बाध्य हैं। अपनी प्रजा की सुरक्षा संप्रभु का मुख्य कर्तव्य है इसी प्रकार लाक ने भी अपने चिन्तन में समझौते के अन्तर्गत दो समझौतों की कल्पना की है।

 (1) सामाजिक समझौता, (2) राजनैतिक समझौता। पहले समझौते के द्वारा प्राकृतिक अवस्था का अन्त करके समाज की स्थापना की गयी। इस सिद्धान्त के बाद पहले समझौते की शर्तों को कार्यरूप में परिणित करने के लिए सरकार की स्थापना की गयी। रूसो का समझौता इन दोनों विचारों से भिन्न है। रूसो का मनुष्य सज्जन वनचारी था। उसकी इच्छाएं सीमित थीं वह पूर्णतः स्वतंत्र व संतुष्ट था किन्तु वाद में सम्पत्ति की भावना का उदय हुआ जिसके साथ ही समाज में तेरे-मेरे की भावना फैल गयी और पहले की शान्ति नष्ट हो गयी। रूसो का समझौता हाब्स तथा लाक दोनों से भित्र है। उन्होंने अपने समस्त अधिकारों को सारे समाज के लिए समर्पित किया। इसके फलस्वरूप एक सामान्य इच्छा का उदय होता है। जिसके फलस्वरूप सामूहिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति इस समूह के अविभाज्य अंग के रूप में अपने व्यक्तित्व तथा अपनी पूर्ण शक्ति को प्राप्त कर लेता है।आलोचना-शनैः-शनैः समझौता सिद्धान्त का पतन होने लगा। इसका खण्डन करते हुए दार्शनिकों ने कहा कि “मनुष्य सदैव से ही एक सामाजिक प्राणी रहा है और राज्य विकास का परिणाम है।” यहाँ तक कहा जाता है कि यह सिद्धान्त काल्पनिक, ऐतिहासिक एवं अवैज्ञानिक है। श्याम ने कहा है कि “शासक और शासितों के सम्बन्धों के आधार के रूप में समझौता असंगत है तथा इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है।” ब्लंटशली इस सिद्धान्त को ‘अत्यधिक भयंकर ग्रीन ने ‘कपोल कल्पना बूल जे ने ‘सरासर झूठा’ बतलाया। ऐतिहासिक आधार पर भी इसकी आलोचना करते हुए कहा गया कि इतिहास में इस बात का कहीं भी उदाहरण नहीं मिलता कि आदि मानव ने पारस्परिक समझौते के आधार पर राज्य की स्थापना की हो। डाक्टर गार्नर ने ठीक ही लिखा है कि, “इतिहास में कोई ऐसा प्रामाणिक उदाहरण नहीं मिलता जिसके अनुसार ऐसे व्यक्तियों द्वारा जिन्हें पहले से राज्य का पता नहीं था आपसी समझौते से राज्य की स्थापना की गयी हो।” राज्य विकास का परिणाम है समझौते का नहीं। दार्शनिक आधार पर इस सिद्धान्त की आलोचना करते हुए कहा गया है कि राज्य की सदस्यता ऐच्छिक नहीं होती वरन् अनिवार्य होती है यह राज्य और व्यक्तियों के सम्बन्धों की अनुचित व्याख्या करना है। वान हालर ने इस संबंध में ठीक ही लिखा है कि, “यह कहना कि व्यक्ति और राज्य में समझौता हुआ इतना ही युक्तिसंगत है जितना कि यह कहना कि व्यक्ति और सूर्य में इस प्रकार का समझौता हुआ कि सूर्य व्यक्ति को गर्मी दिया करे” यह सिद्धान्त विद्रोह का पोषक है।” लाइबर के अनुसार, “इस सिद्धान्त के अपनाने से अराजकता फैलने का
डर है।”

इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि प्राकृतिक अवस्था में अधिकारों का अस्तित्व सम्मान ही नहीं है। ग्रीन के अनुसार, “प्राकृतिक अवस्था में जो कि एक असामाजिक स्थिति होती है। अधिकारों की कल्पना स्वयं ही एक विरोधाभास है।”

वैज्ञानिक आधार पर ही सामाजिक समझौता सिद्धान्त की आलोचना करते हुए कहा गया है कि कानून के भाव में किसी वैधानिक कार्य को कार्यान्वित नहीं किया जा सकता। वैधानिक दृष्टिकोण से ऐसे समझौते को महत्त्व नहीं दिया जा सकता और न ही यह मान्य है। समझौता सिद्धान्त की उपयोगिता एवं महत्त्व आलोचनाओं के उपरान्त भी सामाजिक समझौता सिद्धान्त का अपना विशिष्ट महत्त्व है। इस सिद्धान्त के द्वारा ही राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धान्त का खण्डन किया गया जिसके फलस्वरूप जनतंत्र को बल मिला और शासक की शक्तियों सीमित हो गयी जैसा कि गिलक्राइस्ट ने लिखा है कि, “दैवीय सिद्धान्त का मुख्य शत्रु अनन्या सिद्धान्त के कारण प्रभुसत्ता की •आधुनिक विचारधारा का विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ तथा नागरिक के अधिकारों को बल मिला। गेटिल ने ठीक ही लिखा है कि, “इस सिद्धान्त ने व्यक्ति के महत्त्व को स्थापित किया तथा तथ्य पर जोर दिया कि राजनीतिक संस्थाओं में मनुष्य के प्रत्यक्ष प्रयत्नों के द्वारा परिवर्तन किया जा सकता है और अंतिम राजनीतिक सत्ता जनता में निहित है।”

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