राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त 

 राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।”

सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवासियों ने किया। महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया है कि राज्य की स्थापना के पूर्व अराजक दशा में मत्स्यन्याय था, जिसे समाप्त करने के लिए राज्य का निर्माण किया गया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र और वाल्मीकि की रामायण में भी इस सिद्धांत की चर्चा मिलती है। बौद्धों के त्रिपिटक से भी इसी तरह की बात मिलती है। जैन विचारकों के अनुसार, अभाव के कारण दु:खी होकर मनुष्यों ने आपस में समझौता करके राज्य की स्थापना का। राज्य का स्थापना के पूर्व मनुष्य की स्थिति अच्छी थी परन्तु वह अविवेकी था। उसमें लोभ, क्रोध, और युद्ध की भावना आई। तब लोगों ने राजा बनाया जिसका महासम्मत रखा गया। पश्चिमी संस्कृति में ओल्ड टेस्टामेंट में भी इस सिद्धान्त का बीज मिलता है। यूनान में भी यह सिद्धान्त सोफिस्टों के बीच प्रचलित था। यही कारण है कि शक्तिशाला निर्बलों को तंग करते थे और इसी दिक्कत को दूर करने के लिए लोगों ने समझौता करके राज्य का निर्माण किया।

आधुनिक युग में भी इस सिद्धान्त के प्रति पादकों की संख्या कम नहीं है। परन्तु इस सिद्धान्त की अत्यधिक ढूंगे विवेचना 17वीं और 18वीं शताब्दी में ब्रिटेन के हाब्स एवं लॉक तथा फ्रांस के रूसो ने की। इन विद्धानों ने इस बात से सहमति प्रकट की है राज्य की उत्पत्ति के पूर्व मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में था। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा, जिन्हें दूर करने के उद्देश्य से लोगों ने समझौता करके राज्य का निर्माण किया। परन्तु राज्य की स्थापना से पूर्व की अवस्था कैसी थी, समझौते की शर्त क्या थी और यह समझौता किन दलों के बीच हुआ आदि के सबंध में तीनों विद्धानों में तीव्र मतभेद है। अब तीनों के सिद्धान्तो पर अलग-अलग विचार किया जाएगा। हॉब्स-के प्राकृतिक अवस्था का बडा ही दयनीय चित्र खींचा है। वह मनुष्य को एक स्वार्थी प्राणी मानता है। उसका कहना है कि मनुष्य अपनी शक्ति बढ़ाने की अतृप्त इच्छा रखता है और अपने हित-संपादन को प्रथम स्थान देता है। वह न केवल अपने व्यक्तिगत पदार्थो पर ही अधिकार बनाए रखना चाहता था, बल्कि दूसरों की संपत्ति को भी हडपना चाहता था। लोग एक दूसरे से भयभीत रहते थे। इस अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे का दुश्मन बना रहता था। उस समय के था, “जिसे मार सको, मारो, जो हड़प सको, उसे हड़प लो।”

जीवन का नियम

इस अवस्था में न्याय के लिए कोई स्थान नहीं था। भय, लूट, मार-काट और निरंतर संघर्ष की इस अवस्था में जीवन की सुरक्षा का नामोनिशान तक नहीं था। इस प्रकार हॉब्स द्वारा चित्रित प्राकृतिक अवस्था का चित्र अंधकारपूर्ण था, जिसमें मनुष्य भूखे भेडिए की तरह एक दूसरे को फाड़ खाने के लिए तैयार थे। हॉब्स के अनुसार, मनुष्य का जीवन एकांकी, निस्सार असहय पाशविक और क्षणिक था। इस अवस्था में मनुष्य के कुछ प्राकृतिक अधिकार और नियम अवश्य थे, परन्तु शक्ति सम्पन्न संस्था के अभाव में नियमों का पालन तथा अधिकारों का उपयोग मनुष्य स्वेच्छा से किया करता था। इसी कारण लोगों ने राज्य-संस्था की कमी महसूस की। उपर्युक्त प्राकृतिक अवस्था अधिक दिनों तक नहीं चल सकी। मनुष्य के जीवन प्रेम ने उसकी सुरक्षा के उपाय ढूँढ़ने के लिए विवश किया। ऐसा उपाय खोजने से ही जीवन की अनिश्चितता तथा निरंतर युद्ध की दशा का अंत किया जा सकता था। लोगों ने राज्य की स्थापना के उद्देश्य से आपस में समझौता किया, जिसमें कहा गया, मैं इस व्यक्ति के समूहों को इस शर्त पर अधिकार देता है और अपने आप को शासित करने के अधिकार को छोड़ता हूँ ताकि आप भी उसे अपना अधिकार दे दें और इसके सब कार्यो को उसी रूप में अधिकृत करें। इस प्रकार जब  सभी लोगों ने समझौता कर लिया तब राज्य संस्था का जन्म हुआ।

हाब्स द्वारा प्रतिपादित सामाजिक समझौते के सिद्धान्त की निम्नलिखित विशेषताएं है

(1) यह समझौता सरकारी न होकर सामाजिक था। इस समझौते में राज सत्ता भागीदार नहीं है।

(2) समझौता द्वारा जिस व्यक्ति या समूह को अधिकार सौंपा गया. वह इस समोर ऊपर था। वह मनुष्य के साथ कोई ऐसा समझौता नहीं करता था कि अपनी शक्ति का प्रयोग मनुष्य के इच्छानुसार करेगा। इस प्रकार वह स्वेच्छाकारी राजा बन जाता था।

(3) समझौते अनन्त थे, और प्रत्येक व्यक्ति उसका पालन करने के लिए विवश था।

(4) सामाजिक समझौते के अनुसार मनुष्य शक्ति तथा स्वतंत्रता को सदा के लिए, पूर्णतया त्याग देते थे। राजा के आततायी होने पर भी वे उसके विरूद्ध विद्रोह नहीं कर सकते थे। राजा के जघन्य कार्यों को भी अन्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता था। लॉक- राज्य की स्थापना में पूर्व प्राकृतिक अवस्था का जो चित्रण लॉक ने किया वह हाब्स के चित्रण से भिन्न है। हाब्स की तरह वह मनुष्य की प्राकृतिक अवस्था के जीवन को जंगली, घृणित एवं क्षणिक नहीं मानता। लॉक के अनुसार, प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य का जीवन शांत और आदर्श था। मनुष्य का प्रत्येक कार्य उचित, अनुचित, अधर्म, पुण्य, पाप की स्वाभाविक भावना का आधृत था। मनुष्य के कुछ प्राकृतिक अधिकार भी थे। परन्तु सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि प्राकृतिक नियमों की व्यवस्था करने वाला कोई नहीं था कि उचित क्या है और अनुचित क्या है। किसी भी बात में मतभेद होने पर सर्वमान्य निर्णय करनेवाला कोई नहीं था। अत: लोगों को राज्य संस्था की स्थापना की आवश्यकता महसूस हुई । इस प्रकार, प्राकृतिक अवस्थाओं की कठिनाइयों को दूर करने के उद्देश्य से लोगों ने एक समझाता किया, जो सभी लोगों का सभी के साथ हुआ। इस समझौते द्वारा प्राकृतिक अवस्था का अन्तकर दिया गया था। और एक सभ्य समाज की स्थापना की गई थी। जहाँ हाब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था के मनुष्य ने अपने सभी अधिकारों का समर्पण कर दिया वहाँ लॉक का कहना है कि मनुष्य ने संपूर्ण समाज को कुछ ही अधिकार सौंपे जिससे उनकी असुविधाओं का अंत हो सके शेष अधिकार अपने पास रखे। समाज के निर्माण के बाद किसी एक व्यक्ति को शासक बनाया गया जिसे समाज के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन स्वतंत्रता एवं संपत्ति की रक्षा करने की शपथ लेनी पड़ी। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि लॉक के अनुसार मनुष्य ने दो समझौते किए। एक समझौता आपस में किया, जिससे समाज की उत्पत्ति हुई। दूसरा समझौता शासक के साथ किया, जिससे राज्य संस्था की उत्पत्ति हुई। लॉक ने सीमित तथा वैज्ञानिक राजतंत्र का समर्थन किया, किन्तु हाब्स ने निरंकुश राजतंत्र में अपना विश्वास प्रकट किया। रूसो-प्राकृतिक अवस्था के मनुष्य का जो चित्रण रूसो ने किया हैं वह हॉब्स और लॉक दोनों से भिन्न है। रूसो के अनुसार प्राकृतिक अवस्था के मनुष्य सादगी एवं स्वच्छता से जीवन व्यतीत करते थे। वे भोले-भाले वन्य पुरूष थे जो पवन की तरह जहाँ चाहते थे और जो इच्छा होती थी वही करते थे। मनुष्य के जीवन की आवश्यकता बहुत कम थी, जिनको वे आसानी से पूरा कर लेते थे वे सरल प्रकृतिक के व्यक्ति थे जिन्हें अच्छे-बुरे उचित-अनुचित तक का ज्ञान नहीं था। लोग पूर्ण स्वतंत्रता तथा समानता का उपयोग करते हुए सहज आनन्द का अनुभव करते थे।

परन्तु मनुष्य की यह स्वर्गीक स्थिति अधिक समय तक नहीं बनी रहसकी। जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ उपभोग की सामाग्री की कमी होने लगी। व्यक्तिगत सम्पत्ति की भावना जागृत हुई। तेरे मेरे का प्रश्न पैदा हो गया, जिसके परिणामस्वरूप ईर्ष्या-द्वेष और संघर्ष का जन्म हुआ । मनुष्य की स्वतंत्रता और समानता का अंत हो गया और मार-काट की स्थिति उत्पन्न हो गई। अतः इस दुःखपूर्ण अवस्था का अंत करने के लिए राज्य-संस्था की आवश्यकता का अनुभव किया गया। सभी लोगों ने यह सोचना प्रारंभ कर दिया कि एक ऐसे समाज की स्थापना हो, जो अपनी सामूहिक शक्ति से प्रत्येक सदस्य- मनुष्य की जान-माल की रक्षा कर सके। इस समाज में रहता हुआ भी मनुष्य अपनी स्वतंत्रता को पूर्ववत अक्षुण्ण बनाए रहा। मनुष्यों ने आपस मे समझौता किया, प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वतंत्रता, अधिकार और शक्ति समाज को अर्पित कर दे: क्योंकि समाज व्यक्तियों की समाप्ति है और समाज का निर्माण व्यक्तियों की सहमति से हुआ है। रूसो के अनुसार भी समझौता दो पक्षों में हुआ एक पक्ष में व्यक्ति व्यक्तिगत रूप में रहता है और दूसरे पक्ष में व्यक्ति सामूहिक रूप में रहता है। इस प्रकार रूसो शासन संचालन की शक्ति सम्पूर्ण जनता का अर्पित करते हुए प्रजातंत्र की स्थापना करता है। वह समाज की सामान्य इच्छा को ही सर्वोच्च स्थान प्रदान करता है।

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