एशिया के आंतरिक अपवाह क्षेत्र

एशिया के आंतरिक अपवाह क्षेत्र 

.अपवाह तंत्र (Drainage System) – एशिया के मध्यवर्ती भाग पर उच्च पर्वत श्रेणियाँ तथा उच्च पठार स्थित हैं। अधिक नदियाँ इन्हीं उच्च भूमियों से निकलकर ढाल के अनुरूप बहती हुई महासागरों में गिरती हैं। आन्ता भागों में कुछ नदियाँ, झीलों तथा सागरों में गिरती हैं। शुष्क प्रदेशों में अनेक अस्थाई नदियों का जात सूख जाता है तथा वे मरुस्थल में विलुप्त हो जाती हैं। एशिया के अपवाह को पाँच क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है – 1. आर्कटिक महासागरी, 2. प्रशान्त महासागरीय, 3. हिन्द महासागरीय, 4. भूमध्य सागरीय तथा 5. आन्तरिक। आर्कटिक महासागर अपवाह – यह अपवाह एशिया महाद्वीप के लगभग एक-तिहाई क्षेत्र पर उत्तरी भाग में विस्तृत है इस
अपवाह क्षेत्र की नदियों का उदगम मध्य एशिया के पर्वतों, उच्च भूमियों तथा झीलों से होता है। ये नदियों उत्तर की ओर बहते हुए आर्कटिक सागर में गिरती है। इसके अन्तर्गत तीन प्रमुख नदी क्रम ओब, यनीसी था लीना हैं, जिनकी गणना विश्व की बड़ी नदियों में की जाती है। इनमें लीना नदी सबसे लम्बी (4220किमी0) है। लीना के पूर्व में इण्डिगिरिका, कोलिमा तथा याना छोटी नदियाँ हैं, जो उत्तर की ओर बहती हैं। आर्कटिक सागर वर्ष के अधिकांश समय हिमाच्छादित रहता है, जिससे नदियों का जल मुहाने तक पहुँचाने के पहले ही जम जाता है। परिणामतः नदियों का जल मैदानी भाग में फैल जाता है तथा विस्तृत दलदल बन जाते हैं। शीतकाल में नौगम्य न होने तथा मुहानों पर कोई पतन स्थित न होने के कारण इन नदियों का कोई व्यापारिक महत्व नहीं है।

प्रशान्त महासागरीय अपवाह यह अपवाह क्षेत्र पूर्वी एशिया तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया पर विस्तृत है। इसकी नदियाँ मध्य एशिया की पर्वत श्रेणियों तथा उच्च भूमियों से निकलकर पूर्व की ओर बहती हुई प्रशान्त महासागर में गिरता हा इन नदियों में आमूर, लियाओं, हांग हो, यांग्त्सीक्यांग, मेकांग, मीना आदि उल्लेखनीय हैं। आमूर की सहायक नदियों में- उसुरी, अर्गुन, शिल्पा तथा सुंगारी प्रमुख हैं। चीन की हांग हो नदी बाढ़ों के कारण ‘चीन का शोक’ (Sorrow of China) कहलाती है। यांग्त्सी (चीन की सबसे लम्बी नदी-5120 मी०) का उर्वर डेल्टा घना आबाद प्रदेश है। मेकांग तथा मीनाग डेल्टा भी घने आबाद हैं। हिन्द महासागरीय अपवाह इस अपवाह क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ – दक्षिण-पश्चिमी एशिया में दजला एवं फरात, दक्षिण एशिया में-सिन्धु, गंगा,ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा,कावेरी, नर्मदा, तापी तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया में-इरावदी, सालवीन, चिन्दविन आदि हैं। सिन्धु तथा ब्रह्मपुत्र अपवाह (antecedent drainage) का उदाहरण हैं। हांग हो नदी आयताकार (rectangular)अपवाह प्रस्तुत करती है। हांग हो की प्रमुख सहायक वीहो तथा फेन हो हैं।
यांग्त्सी की सहायक नदियों में हान, मिन, कान, चार्ली तथा सियांग महत्वपूर्ण हैं। इन नदियों ने वृक्षाकार (dentic) तथा आयताकार (rectangular) अपवाह विकसित किया है। दजला एवं फरात नदियाँ अरारात पर्वत से निकलकर दक्षिण को ओर फारस की खाड़ी में प्रवाहित होती हैं। खाड़ी में गिरने से पूर्व इनकी संयुक्त धारा ‘शत्तल अरब’ कहलाती हैं। सिन्धु नदी तिब्बत के पठार से निकलकर हिमालय श्रेणियों को पार करके दक्षिण की ओर अरब सागर में विसर्जित होती है। इसकी पाँच प्रमुख सहायक (सतलज, रावी, व्यास, झेलम, चिनाव) है। गंगा हिमालय से निकल कर पहले दक्षिण, फिर पूर्व को ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसकी प्रमुख सहायक यमुना है। ब्रह्मपुत्र नदी भी तिब्बत के पठार से निकलकर पूर्व की ओर बहते हुए फिर दक्षिण में मुड़कर गंगा के साथ डेल्टा बनाती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। उल्लेखनीय है कि हिमालय के अपवाह में नदी हरण (river capture)के उदाहरण मिलते हैं। दक्षिण भारत में महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी भी पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिम भाग में नर्मदा तथा तापी नदियाँ भ्रंश घाटी में बहते हुए अरब सागर में गिरती है। इरावदी नदी म्यांमार में उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। भूमध्य सागरीय अपवाह वह एक लघु अपवाह है, जिसमें छोटी नदियों के संकरे बेसिन सम्मिलित है। टर्की में मनीसा तथा मेन्डेरिस एवं सीरिया में ओरेन्ट नदियाँ उल्लेखनीय हैं। आन्तरिक अपवाह इस अपवाह का विस्तार पश्चिम में अनातोलिया के पठार से लेकर पूर्व में मंचूरिया तक, लगभग 80 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर है। जिन नदियों में वर्षा या हिम पिघलने से पर्याप्त जल प्राप्त होता है, वे झीलों या आन्तरिक सागरों में गिरती है, किन्तु अनेक अस्थाई नदियाँ शुष्क मरूस्थल में ही विलीन हो जाती है। प्रमुख नदियों में सर तथा आमू दरिया (जो अरल सागर में गिरती है), इली नदी (जो बालखश झील में गिरती है), तथा तारिम, खोतान, चू आदि सम्मिलित हैं।

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