आदर्श राज्य के सम्बन्ध में प्लेटो के विचारों का वर्णन

आदर्श राज्य के सम्बन्ध में प्लेटो के विचारों का वर्णन 

 प्लेटो के आदर्श राज्य सम्बन्धी अवधारणा आदर्श राज्य की परिकल्पना के पूर्व किसी आदर्श राज्य की खोज में प्लेटों ने कई वर्षों तक इटली तथा यूनान आदि देशों की यात्रा की। कुछ विद्वानों के अनुसार वह भारत भी आया था, परन्तु अपने कल्पना के अनुरूप उसे कोई आदर्श राज्य नहीं मिला। विभिन्न महत्त्वपूर्ण देशों में अनवरत कई वर्षों तक यात्रा के बाद वह अपने देश वापस आ गया तथा अपने अनुभव के आधार पर उसने अपने प्रसिद्ध राजनीतिक ग्रन्थ ‘रिपब्लिक’ का प्रणयन किया। जिसमें उसे आदर्श राज्य के स्वरूप का सांगोपांग चित्रण किया है। एथेन्स के जन तान्त्रिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अराजकता तथा उस व्यवस्था की विफलता से क्षुब्ध होकर प्लेटो ने एक ऐसे आदर्श राज्य की परिकल्पना की जो जनतंत्र में व्याप्त समग्र बुराइयों से मुक्ति और न्याय पर आधारित हो जिसका संचालन दार्शनिक शासक करता है। उसने अपने आदर्श राज्य को परिकल्पना के अन्तर्गत न्याय सम्बन्धी अवधारणा को स्पष्ट किया और साथ ही दार्शनिक शासक एवं सैनिक वर्ग के लिए साम्यवादी व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत की। उसने राज्य में शिक्षा की कैसी व्यवस्था हो इसका भी चित्रण किया है। आदर्श राज्य का आधार स्तम्भ-आदर्श राज्य क्या है? प्लेटो ने इसका उत्तर आदर्श राज्य के निर्माण तत्त्वों द्वारा प्रदान किया है। आदर्श राज्य न्याय पर आधारित होता है। उसमें प्रत्येक व्यक्ति कार्यों को बिना किसी दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप किये हुए पूरा करते हैं। उनके मस्तिष्क को शिक्षा के द्वारा उत्तर किया जाता है। साम्यवाद द्वारा भौतिक प्रलोभनों से मुक्त शासक और सैनिक राज्य की उन्नति की चेष्टा में संलग्न रहते हैं। शासक विशेष योग्यता युक्त होने के कारण राज्य हितकारी कार्यों को अधिक भली प्रकार करते हैं प्लेटो के आदर्श राज्य के मुख्य आधारस्तम्भ चार हैं। इन चार स्तम्भों के अभाव में उसके भव्य भावना की आधारशिला ढह जायेगी। ये मुख्य आधार स्तम्भ निम्न हैं-(1) न्याय, (2) शिक्षा, (3) साम्यवाद, (4) दार्शनिक शासक प्लेटो के अनुसार न्याय, प्रत्येक व्यक्ति द्वारा समाज के सामने निश्चित स्थान पर रहकर अपने कर्तव्य का पालन करता है। इसलिए न्याय पर आधारित आदर्श राज्य की स्थापना उसने समाज को तीन वर्गों में विभाजित कर लिया। आदर्श राज्य के वर्ग विभाजन – प्लेटो ने आदर्श राज्य में तीन वर्गों की स्थापना की है और उनके कर्तव्यों का विभाजन किया है। उसकी वर्ण व्यवस्था निम्न है:

(1  उत्पादक वर्ग-प्लेटो के अनुसार सामाजिक व्यवस्था में सबसे नीचे उत्पादक वर्ग होता है। इस वर्ग के अन्तर्गत कृषक, जुलाहे, लुहार, बढ़ई, शिल्पकार आदि लोग आते हैं। जिनके कार्यों द्वारा समाज के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति हुई है। इन व्यक्तियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं का क्रय-विक्रय व्यापारियों द्वारा किया जाता है और वह भी उत्पादक वर्ग के अन्तर्गत आ जाते हैं। इस प्रकार प्लेटो के अनुसार उत्पादक वर्ग आदर्श राज्य का प्रथम आधार स्तम्भ है। (ii) सैनिक वर्ग – प्लेटो के अनुसार आवश्यकताओं में वृद्धि के साथ ही साधनों को समस्या भी उत्पन्न होती है। कालान्तर में इन आवश्यकताओं को पूर्ति के लिए राज्य को अपने पड़ोसी राज्यों के साथ संघर्ष करना पड़ता है इस प्रकार युद्धों का प्रारम्भ होता है। युद्ध के कार्य में संगठन व्यक्तियों को एलेटो “सैनिक वर्ग के अन्तर्गत रखता है। इस वर्ग को प्लेटो अपने आदर्श राज्य का दूसरा आधारस्तम्भ मानता है।

2) शासक वर्ग- सामाजिक वर्गीकरण के शीर्ष पर प्लेटो ने शासक वर्ग को रखा है उत्पादक तथा सैनिक वर्गों को एकता तथा व्यवस्था के सूत्र में बांधने के लिए शासक वर्ग सम्मिलित करता है, जिसमें शासन करने की कुशलता हो। उसने आदर्श राज्य के लिए ऐसे शासकों की व्यवस्था की है, जो दार्शनिक है। ऐसे ‘दार्शनिक शासक प्लेटो के आदर्श राज्य की तीसरे आधार स्तम्भ के रूप में कार्य करते हैं। प्लेटो का आदर्श राज्य- राज्य की वर्ण व्यवस्था का आधार आध्यात्मिक है। उसके अनुसार आत्मा की तीन प्रवृत्तियाँ होती हैं: कृष्णा, शौर्य और विवेका उनका वर्गीकरण इन तीनों प्रवृत्तियों का ही प्रतिनिधित्त्व सैनिक वर्ग द्वारा और विवेक का प्रतिनिधित्व, शासक वर्ग द्वारा होता है। उसके अनुसार उत्पादक वर्ग के लिए औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, परन्त सैनिक तथा सैनिक वर्ग के लिए उसने विशेष प्रकार की शिक्षा व्यवस्था की है। उसकी शिक्षा का उद्देश्य ठनमें ऐसे गुणों का विकास करना है, जिनके द्वारा वह कर्तव्यों को कुशलता के साथ सम्पादित कर सके। शासक तथा सैनिक वर्ग की पारिवारिक तथा आर्थिक चिन्ताओं से मुक्त करने के लिए प्लेटो ने सम्पत्ति तया पत्तियों के साम्यवाद की व्यवस्था की है। इसके अनुसार इन दोनों वर्गों की आवश्यकताओं की पूर्ति का उत्तरदायित्त्व राज्य का होगा। इन ब्गों का कोई स्थायी परिवार नहीं होगा। केवल सन्तानोत्पति के लिये होना स्त्रियों से सम्बन्ध रहेगा। इनके द्वारा उत्पन्न सन्तानों के लालन-पालन का दायित्व राज्य का होगा। इस प्रकार सभी चिन्ताओं से मुक्त रहकर शासन तथा सैनिक वर्ग कुशलतापूर्वक कार्य करते हुए आदर्श राज्य की स्थापना में सहयोग देंगे। शिक्षा-व्यवस्था- प्लेटो के अनुसार राज्य को आदर्श रूप शिक्षा के द्वारा ही दिया जा सकता है। इसीलिए उन्होंने शिक्षा पद्धति का अधिक महत्त्व दिया है। हम यह कह चुके हैं कि उसकी शिक्षा व्यवस्था केवल शासक एवं सैनिक वर्ग के लिए ही है, क्योंकि उत्पादक वर्ग के लिए यह शिक्षा को महत्त्वपूर्ण नहीं मानता। उसके अनुसार शिक्षा का ठद्देश्य व्यक्ति का शारीरिक तथा मानसिक दोनों के विकास की ओर ध्यान देना है। प्रारम्भिक शिक्षा के अनुसार 10 वर्ष की आयु तक चलेगी। 18 वर्ष की आयु तक नागरिकों को बौद्धिक तथा व्यायाम आदि की शिक्षा दी जायेगी। 8 वर्ष से 20 वर्ष की आयु तक संगीत तथा आध्यात्मिक शिक्षा दी जाएगी 20 से 30 वर्ष तक माध्यमिक शिक्षा चलती थी। यह शिक्षा नागरिकों के केवल उस वर्ग के लिए थी, जिसे आगे चलकर अभिभावक या शासक बनना से 35 थे। इस अवधि में गणितीय, तर्कशास्त्र, खगोल शास्त्र आदि की शिक्षा दी गयी थी। 31 वर्ष की अवधि की शिक्षा का तीसरा चरण था, जब दार्शनिक शासकों का निर्माण करने के लिए शुद्ध आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती थी। परन्तु इसके पश्चात् भी शिक्षा का अन्त नहीं होता था। प्लेटो के अनुसार अभिभावकों की शिक्षा जीवन-पर्यन्त चला करती थी।

प्लेटो के आदर्श राज्य की आलोचना – प्लेटो ने जिस आदर्श राज्य की कल्पना की, अनेक विद्वानों ने उसकी आलोचना भी की है जो इस प्रकार है

1. उसके चिन्तन में राज्य और व्यक्ति का अन्तर स्पष्ट नहीं होता।

2.प्लेटो का आदर्श राज्य भौतिक जगत् में प्राप्य नहीं हो सकता यह एक कोरी कल्पना है।

3. आदर्श राज्य में व्यक्ति का सर्वांगीण विकास सम्भव नहीं है, व्यक्ति स्वतन्त्रता का इस व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है।

4. प्लेटो के आदर्श राज्य में उत्पादक वर्ग जो समाज का सबसे बड़ा अंग है, उसकी उपेक्षा की गई है। इस वर्ग के लिये शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। उसकी शिक्षा व्यवस्था केवल दो वर्ग के लिये ही है।

5. प्लेटो ने दास-प्रथा पर कोई प्रकाश नहीं डाला है।

6. की साम्यवादी व्यवस्था मानव समाज के मूल-तत्वों से विल्कुल भिन्न तथा व्यावहारिक है।

7.प्लेटो ने समस्त शक्तियाँ दार्शनिक शासक के अन्तर्गत करके एक प्रकार के अधिनायकवाद का समर्शन किया है।

8. प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में प्रजातंत्र को स्थान नहीं दिया है। आदर्श शासन में किसी न किसी प्रकार जनता का प्रतिनिधित्त्व आवश्यक है।

9. प्लेटो राज्य की आवश्यकता जैसे-अधिकारियों की नियुक्ति, अपराधियों को दण्डित करना, न्यायालय की स्थापना पर मौन रहा है। वस्तु प्लेटो एक ऐसे आदर्श राज्य का निर्माण करना चाहता था, जिसमें दार्शनिक शासक का राज्य हो। वह चाहता था कि आदर्श राज्य के नागरिक स्वस्थ बद्धिमान ज्ञान-पिपासु हों तथा उनमें कर्तव्य पालन की भावना हो। उसके आदर्श नागरिकों के लिये सम्पत्ति तथा परिवार के साम्यवाद की व्यवस्था घी, जिससे शासक व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिए कार्य कर सकें। परन्तु अनेक दोषों के साथ प्लेटो के आदर्श राज्य में व्यावहारिकता की कमी थी। वह आदर्श राज्य की स्थापना की कल्पना में इतना खो गया और व्यावहारिक तत्त्व को भूल गया। उसने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में एक स्थान पर स्वीकार किया है, कि “आदर्श राज्य की स्थापना स्वर्ग में भले ही हो जाय, पृथ्वी पर सम्भव नहीं है।” यह आव्यावहारिक दृष्टिकोण ही प्लेटो के आदर्श राज्य की सबसे बड़ी कला थी।

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