वैदिक संस्कृति की मूलभूत विशेषताए

वैदिक संस्कृति की मूलभूत विशेषताए  ऋग्वेद या पूर्व वैदिक संस्कृति की विशेषताएं-ऋग्वैदिक काल से आशय उस समाज से है जबकि आर्य पंजाब तथा गंगा घाटी के उत्तरी भाग में फैले थे। ऋग्वेद एक उस समय का ऐसा ग्रन्थ है जिससे पूर्व वैदिक कालीन आर्यों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक स्थिति का विवरण मिलता है। जिस […]

उत्तर वैदिक कालीन का सामाजिक आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन

उत्तर वैदिक कालीन का सामाजिक आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन  उत्तर वैदिक सभ्यता- वैदिक युग के अन्तर्गत उत्तर वैदिक सभ्यता अर्थात् वैदिक काल से हमारा आशय उस काल से है जिसमें तीन वेद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद-ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक तथा उपनिषदों की रचना हुई। इसमें आर्य सभ्यता का विकास एवं विस्तार हुआ। वह पंजाब से आगे शेष […]

भारतीय संस्कृति विभिन्न के स्रोतों पर टिप्पणी

भारतीय संस्कृति के विभिन्न स्रोतों पर टिप्पणी  किसी भी देश के समग्र अध्ययन के लिए उस देश से सम्बन्धित साक्ष्य सामग्री अथवा स्रोत की आवश्यकता होती है। ये स्रोत मूलत: दो प्रकार के होते हैं-प्रथम साहित्यिक स्रोत और द्वितीय पुरातात्त्विक स्रोत। जहाँ तक भारतीय संस्कृति के अध्ययन का प्रश्न है, इसके भी कुछ महत्त्वपूर्ण स्रोत अथवा […]

भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत संस्कृति की परिभाषा

भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत संस्कृति की परिभाषा  संस्कृति का तात्पर्य (अर्थ) संस्कृति का आशय है किसी भी देश अथवा राष्ट्र की वह समस्त गतिविधियाँ जिसके अन्तर्गत उस देश का समग्र मानवीय विकास होता है। संस्कृति शब्द देखने में छोटा लगता है, लेकिन यदि हम इसका विस्तृत अध्ययन करें तो संस्कृति से कोई भी चीज अछूती नहीं […]

अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का सार है

“अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का सार है।”  हमारे देश भारत में सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं ये लोग बहु भाषा-भाषी है। इनकी इन विषमताओं को देखकर कोई भी बाहरी व्यक्ति यह समझ सकता है अथवा ठसे सन्देह हो सकता है कि भारत एक देश न होकर छोटे छोटे खण्डों का विशाल जन […]

माओ के राजनीतिक विचार

माओ के राजनीतिक विचार माओवादी राजनीतिक चिंतन के सन्दर्भ में विद्वानों में दो मत है। प्रथम मत के अनुसार माओवाद में मार्स, लेनिन और स्टालिन के विचारों का मिश्रण हैं जयकि दूसरे मत के अनुसार माओवाद का का अस्तित्त्व एक स्वतंत्र और मौलिक विचारधारा है राष्ट्रीयता का संवेग ठसके व्यक्तित्व अभिन्न अंग बना रहा। उसके […]

साम्राज्यवाद, क्रांति और राज्य के विषय में लेनिन के विचार

साम्राज्यवाद, क्रांति और राज्य के विषय में लेनिन के विचार साम्राज्यवाद सम्बन्धी विचार- मार्क्सवाद पर किये जाने वाले आक्षेपों से मार्क्सवाद की रक्षा करने के लिए लेनिन ने सन् 1916 में “साम्राज्यवाद पूँजीवाद की चरम अवस्था पुस्तक लिखी इस पुस्तक में उसने यह सिद्ध करने का प्रयास किया साम्राज्यवाद पूंजीवाद की उच्चतम व्यवस्था है। लेनिन […]

मार्क्स के प्रमुख सिद्धांतों का विवेचना

मार्क्स के प्रमुख सिद्धांतों का विवेचना  मार्क्स तथा एंजेल्स द्वारा प्रतिपादित मार्क्सवाद अथवा साम्यवाद पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध एक मानवीय संवेदनात्मक विद्रोह है। मार्क्स तथा एजेंल्स की अनेक कृतियों में इस सिद्धान्त का प्रणयन हुआ है। इनमें मार्क्स की ‘दास कैपिटल मार्क्स तथा एंजेल्स  दोनों के द्वारा प्रणीत ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ तथा एंजेल्स कृत ओरिजिन ऑफ […]

हीगल के द्वन्द्वात्मक पद्धति के अर्थ एवं महत्त्व

हीगल के द्वन्द्वात्मक पद्धति के अर्थ एवं महत्त्व प्रसिद्ध दार्शनिक हीगल की द्वंद्वात्मक पद्धति (द्वंद्ववाद) विश्व में होने वाले परिवर्तनों को समझने के लिए एक नया और मौलिक उपकरण है। उसने विकासवादी प्रक्रिया से प्रगति के विचार पर बल देते हुए यह प्रतिपादित किया कि हम किसी वस्तु के यथार्थ रूप को उसी विरोधी रूप […]

हीगल के राज्य तथा स्वतंत्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण

हीगल के राज्य तथा स्वतंत्रता सम्बन्धी दृष्टिकोण  भौति राज्य को एक स्वाभाविक संगठन मानता है और उसका मानना है व्यक्ति का उच्चतम हीगल की राज्य सम्बन्धी अवधारणा यूनानी विचारकों से प्रभावित है। वह अरस्तू की हीगल की राज्य सम्बन्धी अवधारणा (विचार) -विकास राज्य के अन्तर्गत ही संभव है। हीगल राज्य को व्यक्तियों के एक कोरे […]